Saturday, November 2, 2013

उपन्यास



मित्रो, ‘आफिया सद्दीकी का जिहाद’ मेरा नवीनतम उपन्यास है जो पंजाबी में इसी वर्ष यानी 2013 में प्रकाशित हुआ है। इससे पूर्व मेरे दो उपन्यास ‘बलि’ और ‘होनी’ भी पंजाबी में प्रकाशित हुए। ‘बलि’ उपन्यास का हिंदी अनुवाद आप मेरे इस ब्लॉग में धारावाहिक रूप में पढ़ ही चुके हैं और अब वह किताब रूप में भी इसी वर्ष हिंदी के पाठकों के सम्मुख होगा। ‘बलि’ का हिंदी अनुवाद मेरे लेखक मित्र सुभाष नीरव ने किया था, उन्हीं ने ‘आफिया सद्दीकी का जिहाद’ भी आपको हिंदी में उपलब्ध करवाया है। धारावाहिक रूप से छप रहा यह उपन्यास आज दीपावली के दिन समाप्त हो रहा है। आप सब को इस ज्योतिपर्व दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं। दीप की तरह अपने अपने किंचित प्रकाश से इस दुनिया के तम को दूर करने की हम सभी को कोशिश करनी चाहिए, तभी हम इस दुनिया को और बेहतर और खुशहाल बना सकेंगे।
-हरमहिंदर चहल



आफिया सद्दीकी का जिहाद
हरमहिंदर चह



18(दूसरा भाग)

मि. वकील, अपनी क्लाइंट को बोलने से रोको। क्योंकि तुमने इसको कोर्ट में चुप रहने का स्टेट्स प्राप्त किया हुआ है।जज ने प्रतिवादी वकील की ओर देखते हुए अपना गुस्सा प्रकट किया।
      नहीं, मुझे बोलना है।आफिया फिर से बोली तो जज के माथे पर बल पड़ गए। प्रतिवादी वकीलों ने आफिया को चुप रहने का संकेत किया, पर उसने किसी की परवाह नहीं की और अपनी बात पर अड़ी रही। आखि़र जज उससे सम्बोधित हुआ -
      मिस आफिया, क्या तुम समझ रही हो कि तुम क्या करने जा रही हो ?“
      हाँ, मैं सब समझती हूँ।
      मिस आफिया, मैं एकबार फिर तुम्हें समझाना चाहूँगा कि इस प्रकार तुम्हारे केस का नुकसान हो सकता है। तुम्हें अपने वकीलों की बात माननी चाहिए।जज ने कुछ रूखे स्वर से कहा।
      मुझे किसी की परवाह नहीं है। मुझे अपनी स्टेटमेंट देनी है।
      वह तो तुम जब चाहो दे सकती हो। वैसे भी केस अभी अधबीच में ही है। कोर्ट तुझे मौके के अनुसार स्टेटमेंट देने की अनुमति देगी।जज ने अन्तिम बार आफिया को बोलने से रोकने की कोशिश की।
      नहीं, मुझे अभी इसी वक्त स्टेटमेंट देनी है। यह मेरा अधिकार है।
      ओ.के. गो अहैड। जो तुम्हारी इच्छा।आखि़र जज ने उसको बोलने की अनुमति देते हुए उसका विटनेस बॉक्स में जाने के लिए कहा। आफिया विटनेस बॉक्स में जाकर खड़ी हुई तो प्रतिवादी वकील ने सोचा कि चलो, इसी तरह ही सही। पर उसने इस पैदा हुई नई स्थिति को भी अपने हक़ में रखने की कोशिश करते हुए स्वयं ही आफिया का क्रॉस अगज़ामिनेशन शुरू कर दिया ताकि केस को अपने ढंग से मोड़ दिया जा सके। उसने आफिया से कहा कि वह अपनी सारी कहानी कोर्ट को सुनाए। आफिया बोलने लगी, “मैं अमेरिका से बहुत प्यार करती हूँ। मेरा न्यूयॉर्क और बाॅस्टन शहर से बड़ा लगाव है। मैं इन शहरों को नुकसान पहुँचाने के बारे में सोच भी नहीं सकती। मैं बहुत इंटैलीजेंट स्टूडेंट रही हूँ। मुझे अच्छी पढ़ाई करने के कारण अनेक बार इनाम मिले। इसके अलावा, समाज सेवा के लिए मुझे मेरी यूनिवर्सिटी ने कईबार सम्मानिक किया...।
      मिस आफिया, तुझ पर जो इल्ज़ाम लगाया गया है कि तुमने स्पेशल फोर्स पर गोली चलाई, क्या तुम उसके बारे में बताओगी कि तुमने गोली चलाई थी या नहीं ?“ वकील ने उसको बीच में टोका।
      वकील की बात सुनकर पहले आफिया ने हँसते हुए कोर्ट में बैठे लोगों की ओर देखा और फिर बोली, “यह तो एक हास्यास्पद-सा आरोप है। मैं मन ही मन सोचती हूँ कि इल्ज़ाम भी लगाया तो कितना हल्का-सा। जिसकी कोई तुक ही नहीं बनती।
      मिस आफिया, मेरे सवाल का उत्तर दो प्लीज़।
      वही दे रही हूँ न। ज़रा सोचकर देखो कि पाँच साल अफगान पुलिस के अधिकारी बैठे हैं। उनके पास पाँच-सात ही अमेरिकी हट्टे-कट्टे फौजी आ बैठते हैं। क्या यह संभव है कि मेरे जैसी दुबली-पतली लड़की जो कि उस समय पुलिस की निगारानी के अधीर है, वह पीछे से आती है और सभी के बीच पहुँचकर एक अफसर की गन उठाती है। इसके बाद वह सभी पर गोलियाँ चलाने लगती है। ऐसा कुछ किसी फिल्मी सीन में तो हो सकता है, पर असली जीवन में बिल्कुल संभव नहीं है।
      मिस आफिया, तुम हाँ या ना में उत्तर दो कि तुमने इन पर गोली चलाई थी कि नहीं?“
      मैंने न ही कोई गन उठाई और न ही किसी पर गोली चलाई।
      फिर तुम कोर्ट को बताओ कि उस दिन क्या हुआ ?“
      उस दिन जब इतने सारे आदमी वहाँ थे तो मैं पर्दे के पीछे बैठी हुई थी। बैठी भी नहीं बल्कि लेटी हुई थी क्योंकि सारी रात थाने वाले मुझे मारते-पीटते रहे थे और मेरा शरीर चोटों से तोड़ रखा था। उस समय मेरे कानों में इकट्ठे हुए लोगों का शोर भी गूंज रहा था जो गुस्से में चीख-चिल्ला रहे थे। वहाँ यह अफवाह फैली हुई थी कि अफगानी पुलिस वाले किसी निर्दोष औरत को अमेरिकियों को सौंप रहे हैं। फिर जब अमेरिकी स्पेशल फोर्स वाले अंदर आए तो मैंने यह देखने के लिए पर्दा उठाकर बाहर की ओर झांका कि देखूँ तो सही कि यहाँ आखि़र हो क्या रहा है। मैंने देखा कि अमेरिकी फौजी अंदर आते हुए बहुत डरे और घबराये हुए थे और उन्होंने अपनी बंदूकें उठा रखी थीं। फिर जैसे ही एक फौजी की मेरी तरफ दृष्टि उठी तो वह शायद मुझे झांकते देखकर और अधिक डर गया और उसने जल्दी से अपनी पिस्तौल में से गोली चला दी जो कि मेरे पेट में आ लगी। इसके बाद वहाँ अफरा-तफरी मच गई। यह शायद अपने बचाव के लिए मुझ घायल को उठाकर साथ ही ले गए। तब तो शायद इन्हें यह भी नहीं पता था कि मैं कौन हूँ। बाद में जब इन्हें मेरी असलियत का पता चला तो सरकार ने मेरे पर यह केस बना दिया जो कि सरकार को ठीक बैठता है।
      फिर प्रतिवादी वकील ने आफिया से कहा कि वह खुलकर बताए कि उसकी गिरफ्तारी से पहले वह कहाँ गायब रही। प्रतिवादी वकील को पूरा विश्वास था कि वह वही बात बताएगी जो कि वह हमेशा कहती है कि उसको एफ.बी.आई. ने कहीं गुप्त जेल में क़ैद में रखा और उस पर जुल्म किया। पर आफिया ने यह सवाल ही टाल दिया और बात को किसी दूसरी तरफ ले गई। उसकी इस हरकत पर प्रतिवादी वकील भी खीझ उठा। वह सोच रहा था कि यदि यह खुलकर बता दे कि कैसे इसको एजेंसियों की ओर से इतने वर्ष टॉर्चर किया गया तो ज्यूरी की इससे हमदर्दी बढ़ जाएगी। पर आफिया ने ऐसा कुछ नहीं कहा। आखि़र माथापच्ची करते हुए प्रतिवादी वकील बैठ गया और सरकारी वकील की बारी आ गई। वह विटनेस बॉक्स के सामने आ खड़ी हुई। ध्यान से आफिया की ओर देखते हुए बोली, “मिस आफिया, तुम इतने साल कहाँ रहीं ?“
      मुझे एफ.बी.आई. ने अफगानिस्तान की किसी गुप्त जेल में रखा हुआ था जहाँ उन्होंने मेरे पर घोर जुल्म किया।जिस बात को वह प्रतिवादी वकील अर्थात अपने ही वकील के सम्मुख टाल गई थी, उसका उसने तुरंत ही उत्तर दे दिया। इससे प्रतिवादी वकील को थोड़ी राहत मिली कि चलो, इसने जो कुछ मेरे कहने पर नहीं बताया, वह अब बता रही है।
      पर तेरी गिरफ्तारी के अगले दिन ही तुमने एफ.बी.आई की एक महिला अफ़सर से कहा था कि तुम अपनी इच्छा से अंडरग्राउंड रही थी।
      वह तो मैं इसलिए डरते हुए कही थी कि अब ये मुझे पर अत्याचार न करें।
      तेरी गिरफ्तारी के समय तेरे बैग में से जो कागज मिले थे, क्या वे तेरे थे ?“
      नहीं, वो तो मुझे आई.एस.आई. ने दिए थे।आफिया का यह उत्तर सुनते ही सरकारी वकील ने बड़े बंडल में से एक पेपर निकालकर बोर्ड पर टांग दिया। इस कागज पर डर्टी बम बनाने के तरीके लिखे हुए थे।
      मिस आफिया, यह हस्तलिखित कागज हैं। और ये तेरे ही हाथ की लिखावट है। इस बारे में तुम क्या कहना चाहती हो ?“
      ओह ये ! ये तो मुझसे जबरन लिखवाये गए थे। मुझे एक पत्रिका दी गई थी। यह सारी जानकारी उसमें थी। मैंने तो सिर्फ़ कॉपी ही की थी।
      फिर तुमने कॉपी क्यों की ?“
      अगर मैं ऐसा न करती तो वे मेरे बच्चों पर जु़ल्म ढाने का भय दिखाते थे। साथ ही, यह कोई एकआध दिन की बात नहीं है। पूरे चार साल मैंने ऐसे लोगों की कै़द में बिताए हैं जिनका हर रोज़ काम ही मुझे पर अत्याचार करना था। यह सबकुछ मुझे बाद में ब्लैकमेल करने के लिए करवाया गया था। यह बात सच भी है। अब आप उन कागजों को ही मेरे खिलाफ़ इस्तेमाल कर रहे हैं।
      मिस आफिया, क्या तुम्हें बंदूक या पिस्तौल चलाने की कोई जानकारी है ?“
      नहीं।आफिया ने में सिर हिलाकर उत्तर दिया।
      तुमने 1993 में बंदूक पिस्तौल चलाना सीखने के लिए एक क्लब ज्वाइन किया था।
      नहीं, मैंने कोई क्लब ज्वाइन नहीं किया था।
      उसके इतना कहते ही सरकारी वकील ने उसी समय किसी क्लब के इंस्ट्रक्टर को अदालत में पेश कर दिया जिसने बताया कि उसे अच्छी तरह याद है कि उसने इस औरत को असला चलाने की शिक्षा दी थी। इस प्रकार यह कार्रवाई कई दिन चलती रही। आखि़र गवाहियाँ खत्म हो गईं और जज ने दोनों पक्षों को क्लोज़ स्टेटमेंट देने के लिए कहा। सरकारी वकील ने अपनी क्लोज स्टेटमेंट में कहा कि मिस आफिया लगातार झूठ बोलती रही है। इसने किसी भी प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं दिया। कभी यह दिमागी तौर पर बीमार होने का पाखंड करती है और कभी कहती है कि यह अपनी इच्छा से अंडरग्राउंड रही और कभी सरकार पर इल्ज़ाम लगाती है। इस कारण इसकी कोई भी बात विश्वास करने के काबिल नहीं है। जो केस इस पर चलाया गया है, वह पूरी तरह साबित हो चुका है।
      डिफेंस टीम ने कहा, “एक मासूम और तीन बच्चों की माँ को सरकारी एंजेसियों ने लगातार कई साल बिना किसी दोष के कै़द किए रखा और उस पर घोर अत्याचार किए। आखि़र, ड्रामे के रूप में उसकी गिरफ्तारी दिखाई गई। पर कितने अफ़सोस की बात है कि जिन दोषों के कारण उसको कै़द किए रखा और उस पर घोर अत्याचार किए गए, उन दोषों की बाबत उस पर केस चलाया ही नहीं गया। उस पर एक मनगढंत दोष लगा दिया गया। इस केस में भी कोई ठोस सबूत उसके खिलाफ़ नहीं मिला। हम माननीय ज्यूरी को बताना चाहेंगे कि यह केस झूठा है और बेबुनियाद है।
      फिर जज ने दिशानिर्देश दिए और ज्यूरी बैठ गई। तीन दिनों के बाद ज्यूरी ने अपना फैसला सुनाते हुए आफिया को दोषी घोषित कर दिया। अदालत में बैठे आफिया के भाई ने सिर पकड़ लिया। वह आफिया को यह समझाने के लिए सारा ज़ोर लगा चुका था कि पाकिस्तान सरकार ने दो मिलियन डॉलर की मदद देते हुए उसके लिए दुनिया के उच्चे कोटि के वकील चुने हैं। वह और कुछ नहीं कर सकती तो कम से चुप ही रहे। पर अब वह सोच रहा था कि इस मूर्ख लड़की ने सबकुछ चौपट करके रख दिया। पर बॉक्स में खड़ी आफिया पर कोई असर नहीं था। उसने ऊँचे स्वर में बोलते हुए इतना ही कहा, “मुझे ज्यूरी का यह फैसला सुनकर कोई हैरानी नहीं हुई। क्योंकि मुझे पता है कि यह फैसला पहले से ही ज्यूरी मेंबरों के मन में तयशुदा था। मैंने यह उम्मीद भी नहीं की थी कि अमेरिका की किसी अदालत में मुझे इन्साफ़ मिलेगा। इस कारण मैं इसके लिए पहले से ही तैयार थी। ज़रा सोचो...।
      मिस आफिया, तुम्हें इस अवसर पर बोलने की इजाज़त नहीं है। न ही अब तेरे बोलने से कोई अन्तर पड़ेगा। इस कारण कोर्ट का हुक्म है कि तुम इस समय चुप रहे।
      ठीक है जज साहिब ! देश आपका, कोर्ट आपकी, ज्यूरी आपके लोगों की, वकील आपके। फिर यहाँ किसी बेगाने का केस कैसे निरपक्ष ढंग से चल सकता है। पर मैंने पहले ही कहा है कि मुझे कोई रंजिश नहीं है। किसी पर कोई गुस्सा नहीं है। आपका हुक्म सिरमाथे है।इतना कहते हुए आफिया चुप हो गई। कोर्ट में ख़ामोशी पसर गई। फिर, जज की आवाज़ ने इस ख़ामोशी को तोड़ा। उसने कोर्ट बर्खाश्त करते हुए सज़ा देने की तारीख़ अगले दिन की रख दी। मार्शल आफिया को जेल की ओर ले गए और कोर्ट खाली हो गई।
      उस रात आफिया का सैल बदल दिया गया। नया सैल बहुत तकलीफ़देह नहीं था। रात के समय हर रोज़ की तरह उसको जागते रखने के लिए तंग-परेशान भी नहीं किया गया। पर आज उसको खुद ही नींद नहीं आ रही थी। वह छोटे-से कमरे में चक्कर लगाए जा रही थी। आखि़र वह बैठ गई और एक तरफ रखा पैन-कागज उठा लिया। काफ़ी देर पैन का पिछला हिस्सा मुँह में लिए वह दीवार की ओर देखती रही। फिर उसने कॉपी खोली और लिखने लगी, “अमजद, कल मेरी ज़िन्दगी का फैसला हो जाएगा। मुझे पहले ही पता है कि मुझे लम्बी सज़ा होगी। इस बात का कोई अफ़सोस नहीं है। बस एक चाहत-सी दिल में है कि काश, तू कल कोर्ट में माजूद हो। तुम ये न सोचना...।लिखती लिखती आफिया एकदम चैंकीं और उसने लिखना बंद कर दिया। फिर उसने लिखी हुई पंक्तियों को पढ़ा। पैन-कॉपी एक तरफ रखते हुए वह लिखी हुई इबारत को ग़ौर से देखते हुए अपने आप से बोली, “हैं अमजद ! इस वक्त यह मेरे मन में कैसे आ गया।उसने आँखें मूंद ली और उसकी आँखों के कोये गीले हो गए। फिर उसने लिखा हुआ कागज फाड़ दिया और कॉपी एक तरफ रख दी। वह उठकर फिर से कमरे में चक्कर लगाने लगी। चलती-फिरती रुक गई और कागज-पैन फिर से उठा लिया। इस बार वह ठीक होकर बैठ गई और बड़े ध्यान से लिखने लगी, “मेरी प्यारी मम्मी, मुझे पता है कि मेरी तरह आज तुझे भी नींद नहीं आएगी। तू तो बल्कि पता नहीं पिछले कितने समय से अच्छी तरह सोई ही नहीं होगी। मैं समझ सकती हूँ कि औलाद का दुख क्या होता है। पर मेरी प्यारी मम्मी, तेरे बताए रास्तों पर चलती हुई मैं आज यहाँ तक का सफ़र तय कर आई हूँ। मैं तेरा धन्यवाद करती हूँ जो तूने मुझे मज़हब के इस असली काम की राह पर डाला। पर मैं तेरी सोच पर खरी न उतरी। तू चाहती थी कि मैं राजनीति में बुलंदियाँ छूती। पर वो मेरा राह नहीं है। मुझे पता है कि आज जो भी हूँ, वह तेरी शिक्षाओं के कारण ही है। पर अपने राह वहाँ आकर अलग अलग हो जाते हैं, जब तू इस मज़हबी काम को राजनीति के लिए सीढ़ी बनाने को कहती है और मैं इस पवित्र काम के असली मायनों को निभाना चाहती हूँ। खै़र, ये बातें अब दूर की हैं।
       मैं जानती हूँ कि तू भी दूसरों की तरह मेरे केस की हर रोज़ की कारगुज़ारी देखती होगी। आज तू भी अति निराश हुई होगी कि मैंने अपने वकीलों का कहना नहीं माना, नहीं तो शायद मैं बच जाती। अम्मी, तुम सबका यह भ्रम है। क्योंकि अमेरिकियों ने मुझे किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं है। एक केस न हुआ तो कोई और दूसरा घड़ लेंगे।इसलिए मैं इस अदालती कार्रवाई को महज एक ड्रामे के तौर पर ले रही हूँ। नहीं तो तुम बताओ कि इन्होंने मुझे दुनिया की सबसे ख़तरनाम जिहादी स्त्री घोषित किया हुआ है। इनकी सूची में मेरा नाम सातवें नंबर पर है। हर रोज़ टी.वी. पर मेरा जिक्र चलता है तो उसमें भी मुझे हौआ बनाकर पेश किया जाता है। पर जब मेरे पर केस चलाने की बात आई तो इन्होंने यूँ ही एक फर्ज़ी-सा केस घड़ लिया। जब मुझे एक तरफ ये इतनी ख़तरनाक जिहादी स्त्री घोषित करते हैं तो मेरे पर केस भी वही क्यों नहीं चलाया गया। बात तो फिर बनती अगर ये मेरे पर वही केस चलाते जिसके कारण जैसा कि ये कहते हैं, मुझे कितने ही वर्षों तक तलाशते रहे हैं। यदि मेरे पर टैरेरिज़्म का केस चलता तो मैं दिखाती इन्हें कि असली टैरेरिज़्म क्या होता है। मैं इनका दूसरा चेहरा दुनिया के सामने नंगा करते हुए इनके बखिये उधेड़ देती। पर क्या करूँ इन दोगले लोगों ने अपने आप को बचाने के लिए मेरे पर वो केस चलाया ही नहीं। क्योंकि यदि ये मेरे पर टैरेरिज़्म का केस चलाते हैं तो इन्हें वो सारे बड़े जिहादी कोर्ट में पेश करने पड़ते जो कि इन्होंने अफगानिस्तान की अति भयंकर जेलों में बंद किए हुए हैं। उन्हें बाहर लाकर ये अपना दोगला चेहरा आप ही कैसे नंग कर सकते हैं। चलो फिर जो भी मेरे पर केस बनाया गया, उसमें कौन-सा इन्होंने कोई इन्साफ़ वाली बात की है। बस, पाँच-सात लोगों ने कह दिया कि आफिया ने हमारे पर गोली चलाई और जज ने मान लिया कि हाँ, आफिया इन लोगों के इरादतन क़त्ल की दोषी है। जो गोली मेरे मारी गई, वह तो सबको दिखती है, पर उसकी कोई बात नहीं करता। और जो गोलियाँ ये कहते हैं कि मैंने इन पर चलाईं, उनके कहीं खोल भी बरामद नहीं किए गए। किसी हथियार पर मेरे फिंगर प्रिंट भी नहीं मिले। कोई फॉरसेनिक जांच नहीं हुई। बस, इनके अपने लोगों के कहने पर जज ने मुझे दोषी मान लिया। अच्छा, यह कहते हैं कि ये ज्यूरी सिस्टम के माध्यम से दूध का दूध और पानी का पानी कर देते हैं। पर यहाँ यह उसूल किधर गया। किसी ज्यूरी मेंबर ने भी यह सवाल उठाने की कोशिश नहीं की कि कम से कम एक आध सबूत ही पेश किया जाए जिससे यह साबित हो कि आफिया ने गोली चलाई। यह हो भी नहीं सकता था क्योंकि ज्यूरी मेंबर वही अमेरिकी हैं जो पिछले कितने ही वर्षों से मेरे बारे में अपनी सरकार द्वारा बताया गया ही सुनते आ रहे हैं। उनके लिए तो मैं पहले से ही दोषी हूँ। हाँ, बात तब थी यदि केस किसी ऐसी जगह चलाया जाता, जहाँ के लोग अमेरिकी प्रभाव से मुक्त होते। पर ऐसा संभव नहीं है। इसीलिए मैं इनके किसी नाटक का हिस्सा नहीं बनना चाहती थी और न ही बनी। मैं यह भी नहीं चाहती कि कोई मेरे पर दया करें हाँ, सबूतों के आधार पर मेरे पर केस का फैसला होता तो मैं खुशी खुशी परवान कर लेती। चलो छोड़ो इस बात को और क्या बढ़ाना है। मैं उन सभी का धन्यवाद करती हूँ जिन्होंने मेरे लिए आवाज़ उठाई। अच्छा, ख़त लम्बा हो गया है, बस करती हूँ। अम्मी, जब तक भाई जान के जरिये यह ख़त तुम्हें मिलेगा, तब तक मैं अपनी लम्बी सज़ा भुगतने के लिए किसी जेल की कोठरी में स्थायी तौर पर बंद हो चुकी होऊँगी। बस, एक आखि़री बात और। बड़ा ही दिल करता है, एक बार उस घर को देखने को जहाँ मैं जन्मी, पली-पढ़ी और बड़ी होकर उस घर में हँसते-खेलते हुए अपनी ज़िन्दगी का सुहावना समय गुज़ारा। इसके अलावा दिल में बड़ी इच्छा है कि काश ! एक बार अपने बच्चों के बीच बैठकर उनकी किलकारियाँ सुन सकती। परंतु मुझे पता है कि यह ख्वाहिशें कभी पूरी नहीं होंगी। आखि़र में यही कहूँगी कि मुझे अपने किए पर कोई अफसोस नहीं है। मुझे तो बल्कि गर्व है कि मैं भी अल्लाह के बताये राह पर चलते हुए जिहाद की थोड़ी-बहुत सेवा कर सकी... आफिया।ख़त लिखकर आफिया ने दीवार से पीठ टिका ली। आहिस्ता आहिस्ता उसे नींद आ गई।
      23 सितंबर, 2010 को कोर्ट फिर से शुरू हुई। कोर्ट खचाखच भरी हुई थी। मीडिया के अलावा आफिया के हमदर्द और उसके रिश्तेदार कोर्ट में हा़जिर थे। यू.एस. मार्शलों ने आफिया को कोर्ट में पेश किया। उसने बैठे हुए लोगों की ओर एक नज़र देखा। कोर्ट शुरू हुई तो जज ने आफिया से कहा कि वह कुछ कहना चाहती है तो उसने नामें सिर घुमा दिया। सज़ा सुनाने से पहले जल ने बोलना प्रारंभ किया, “डॉक्टर आफिया का केस एक उलझी हुई कहानी की तरह है। मैं इस केस की तह तक पहुँचने में असफल रहा हूँ। उस पर जो भी आरोप लगे है, उनके अनुसार हालांकि वह दोषी साबित हो गई है, पर फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जो कि अनसुलझा रह गया है। इस अजीबोगरीब कहानी को सुलझाने में न ही एफ.बी.आई. ने मदद की और न ही डाॅक्टर आफिया ने। दोनों इस बारे में बोलने से कतराते रहे। इसलिए यह कहना कठिन है कि असल में पिछले दिनों के दौरान सचमुच हुआ क्या है। उदाहरण के तौर पर डॉक्टर आफिया कह रही है कि वह अफगानिस्तान के गज़नी शहर में उस दिन इसलिए गई कि वह अपने पति को तलाश रही थी। जब कि सरकार कह रही है कि आफिया उस दिन आत्मघाती हमला करने के लिए अफगानिस्तान में गई थी। या फिर हो सकता है कि वह अफगानिस्तान में ऐसे दस्तावेज़ देने गई थी जिनसे डर्टी बम बनाया जा सकता हो। इसके अलावा कोर्ट यह भी नहीं जान सकी कि डॉक्टर आफिया 2003 से 2009 तक कहाँ रही है। यह मुकदमा भी बहुत पेचीदा और कठिन रहा क्योंकि डॉक्टर आफिया ने अदालती कार्रवाई में बहुत बार बाधा पैदा की।अपनी बात कहकर जज कागज पर कुछ लिखने लग पड़ा।
      इसके विपरीत डिफेंस वकील ने अपनी स्टेटमेंट में कहा, “यह केस आफिया के खिलाफ इस कारण गया क्योंकि वह मानसिक तौर पर ठीक नहीं है। जो ऊटपटांग उत्तर आफिया ने दिए, वे उसने जानबूझ कर नहीं दिए बल्कि उसकी मानसिक स्थिति खराब होने के कारण उसके वश में कुछ नहीं है। बार बार वह बिना मतलब ही चलती कार्रवाई में बोलने लग पड़ती थी क्योंकि वह मानसिक रोगी है। नहीं तो डॉक्टर आफिया जैसी उच्च पढ़ी-लिखी औरत से ऐसे व्यवहार की आशा नहीं की जा सकती। सारे ही केस के दौरान रहा उसका व्यवहार यह साबित कर देता है कि वह दिमागी तौर पर बीमार है। उसकी इस तरह की दिमागी हालत एफ.बी.आई. के अमानवीय अत्याचार के कारण हुई है। इसीलिए उसको कुछ भी याद नहीं है कि वह इस पिछले अरसे के दौरान कहाँ थी। जो औरत इतने वर्षों से अपने बच्चों को लेकर अपनी और उनकी जान बचाने के लिए छिपती रही हो, फिर चाहे वह किसी से भी छिपती रही हो, वह नरम व्यवहार की हक़दार है। इतने वर्षों से हर वक्त डर के साये में जी रही औरत पर वैसे भी रहम करने का इन्सानी फर्ज़ है। जितनी सज़ा की वह हक़दार है, वह तो उसने पिछले कुछ वर्षों के दौरान भुगत ही ली है। मेरी कोर्ट से अपील है कि छोटे छोटे तीन बच्चों की माँ और दिमागी तवाज़न खो चुकी इस औरत को सज़ा सुनाने के समय इन नुक्तों पर भी ध्यान रखा जाए।
      डिफेंस वकील बोलकर हटी तो आफिया ने जज से कहा कि वह कुछ कहना चाहती है। अब जज ने उसको बोलने की अनुमति दे दी तो आफिया बोलने लगी, “मैं अमेरिका को बहुत प्यार करती हूँ, इसलिए मैं इसको नुकसान पहुँचाने के बारे में सोच भी नहीं सकती। मेरा मिशन है कि संसार में शांति रहे। आखि़र में मैं अपने मुसलमान बहन-भाइयों से विनती करती हूँ कि वह मेरे कारण किसी पर गुस्सा न हों। वह किसी के प्रति मन में ईष्र्या या बदले की भावना न रखें।इतना कहकर वह चुप हो गई।
      अंत में, जज ने उसकी फाइल पर कुछ लिखा और फिर सज़ा सुना दी। जज ने आफिया को छियासी वर्ष की लम्बी सज़ा सुनाई। जज द्वारा सुनाई सज़ा की बात सुनते ही अदालत में से कइयों की शेम शेम की आवाजे़ं उभरीं तो आफिया फिर से खड़ी हो गई। वह अदालत में उपस्थित लोगों की तरफ देखते हुए बोली, “देखो, मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि मेरे कारण किसी पर गुस्सा न होएँ। मुहम्मद साहब ने अपनी शिक्षाओं में कहा है कि अपने दुश्मनों को भी माफ़ कर दो। मेरी सबसे प्रार्थना है कि मुहम्मद साहब की शिक्षा पर अमल करके सच्चे मुसलमान होने का सबूत दें। तुम हर उस शख़्स को माफ़ कर दो जिस पर तुम्हें गुस्सा आ रहा है। किसी के साथ गुस्सा मत करो। शायद अल्लाह को यही मंजूर है। मुझे भी अल्लाह की यह मर्ज़ी मंजूर है। मुझे किसी के साथ रंजिश नहीं है। अगर मुझे खुद को किसी पर गुस्सा नहीं तो तुम्हें भी नहीं होना चाहिए। खुदा हाफिज़। इंशा अल्ला, सब खुशी खुशी यहाँ से जाएँ।
      उसकी यह बात सुनकर जज उससे सम्बोधित हुआ, “डाॅक्टर आफिया तेरा इन बातों के लिए शुक्रिया। खुदा करे, तेरा आगे के जीवन का सफ़र खुशगवार रहे।इसके बाद जज उठ गया। यू.एस. मार्शल आफिया को पिछले दरवाज़े से जेल की ओर ले चले।
-समाप्त-

2 comments:

रूपसिंह चन्देल said...

इस महत्वपूर्ण उपन्यास के लिए चहल को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं.

चन्देल

alka sarwat mishra said...

बहुत अच्छा उपन्यास लिखा आपने ,मैंने एक-एक लाइन पढ़ी है ,बहुत बधाई.