Monday, February 1, 2010

धारावाहिक उपन्यास



प्रिय दोस्तो… मुझे जानकर खुशी हो रही है कि नेट की दुनिया के पाठक मेरे ब्लॉग पर आकर न केवल मेरे उपन्यास ‘बलि’ को पढ़ रहे हैं बल्कि अपनी राय से मुझे अवगत भी करा रहे हैं। किसी भी लेखक के लिए वे क्षण अत्यंत सुखद होते हैं जब वह अपने पाठकों की राय से गुजरता है। मैं डॉ रूपसिंह चन्देल, बलराम अग्रवाल, महेश दर्पण, सुरेश यादव, सुश्री निर्मला कपिला जी, राज सिंह, अजय कुमार, अशोक गुप्ता, चांद शुक्ला, जैनी शबनम, प्रेम, डॉ अमरजीत कौंके, प्राण शर्मा, नवराही, सुश्री संध्या गुप्ता जी और पंजाबी के वरिष्ठ लेखक जगजीत बरार जी का बहुत बहुत आभारी हूँ कि उन्होंने अपनी राय देकर मेरा हौसला बढ़ाया। आदरणीय जगजीत बरार जी ने तो मेरे उपन्यास पर बहुत बड़ी प्रशंसात्मक टिप्पणी की है, मेरे जैसे लेखक के लिए यह गर्व की बात है। कुछ पाठकों की राय है कि मैं उपन्यास के चैप्टर अधिक लम्बे न दिया करूँ, लम्बी पोस्टिंग को पढ़ना उनके लिए दुष्कर होता है। इस सन्दर्भ में मैं बताना चाहूँगा कि मेरा यह उपन्यास करीब 250 पृष्ठों का है और इसके लगभग सभी चैप्टर लम्बे हैं। फिर भी मैं कोशिश करूंगा कि हर चैप्टर दो या तीन अंशों में ब्लॉग पर जाए। भविष्य में भी मैं आपकी दो-टूक राय की प्रतीक्षा करूंगा। -हरमहिंदर चहल


बलि
हरमहिंदर चहल

(गतांक से आगे...)

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सुधार के बराबर आकर अबोहर ब्रांच नहर पर एक बड़ी झाल बनी हुई है। इसी झाल के ऊपरी पुल से होकर बरनाला-लुधियाना की बड़ी सड़क गुजरती है। पुल के ऊपर से देखने पर लगता है मानो पानी ऊँची चोटियों से नीचे गिर रहा हो। इतना पानी, इतनी ऊँचाई से इतने जोर से गिरता है कि पानी के शोर के अलावा और कुछ सुनाई नहीं देता। ऊँची-ऊँची लहरें उठती हैं, लहरें नहर की पक्की दीवारों से टकरा कर फिर नहर के मध्य की ओर मुड़ जाती हैं। ऊपर की तरफ, झाल के पीछे जो पानी दरिया बना शान्त दिखाई देता है, वही झाल से नीचे गिरते ही मदमस्त हाथी की तरह धमाल मचाता हुआ ऊपर-नीचे उठता है। पानी का कोलाहल बेहद मधुर संगीत पैदा करता है। फिर लहरें कम होती जाती हैं, पानी शान्त-स्थिर होता चला जाता है। झाल से फर्लांग भर नीचे पहुँचकर पानी बिलकुल शान्त हो जाता है। अपनी मस्त चाल से आगे बढ़ने लगता है। यहीं से नहर बायें हाथ को मोड़ काटती है। थोड़ा-सा बायीं होकर फिर सीधी हो जाती है। यही से इसके बायें किनारे के साथ-साथ हलवारे का फौज़ी हवाई अड्डा आरंभ हो जाता है। दायीं ओर लहराती हुई फसलें हैं। काफी दूर तक हवाई अड्डा नहर के साथ साथ चलता है। आगे जाकर अड्डे की सीमा आ जाती है। इससे आगे दोनों ओर हरे-भरे खेतों के बीच से नहर किसी नवब्याहता दुल्हन की तरह आगे बढ़ती जाती है। काफी दूर जाकर नहरी रैस्ट हाउस अखाड़ा आता है। उससे पहले नहर की बायीं ओर बस एक गाँव है- मलकपुर। यह गाँव न बहुत बड़ा है और न बहुत छोटा। पुराने ज़मानों में शहर की ओर जाने के लिए लोग नहर की पटरी के रास्ते ही आते-जाते थे। अब गाँव में से भी पक्की सड़क गुजरती है जो पीछे जगरावां से आकर हलवारे गाँव के अड्डे पर बरनाला-लुधियाना वाली बड़ी सड़क पर आ चढ़ती है। हलवारे फौज़ी अड्डे के बढ़ने से हलवारा गाँव भी सुधार से बिलकुल जुड़ गया है। उधर मलकपुर और हलवारा एकमेक हुए पड़े हैं।
उन दिनों न ही इतनी आबादी थी, न ही इतना ट्रैफिक, न ही इतनी सड़कें। जब सुखचैन ने गाँव से पाँचवी पास की तो नज़दीक का बड़ा स्कूल सुधार का ही था। गाँव के स्कूल से प्राइमरी पास करके मलकपुर के सारे बच्चे सुधार के हायर सेकेंडरी स्कूल ही जाते। जब सुखचैन ने सुधार के इस स्कूल में जाना आरंभ किया तो उस गाँव से लगभग पच्चीस-तीस बच्चे साइकिलों पर सुधार जाते थे। उन दिनों नहर की पटरी बहुत बढ़िया थी। सुबह के समय मलकपुर के बच्चे नहर की पटरी पर एक दूसरे से होड़ लगाते हुए साइकिलें दौड़ाते सुधार की ओर जाते। शाम को हुड़दंग मचाते बच्चों की टोलियाँ गाँव को वापस लौट आतीं।
सुखचैन का परिवार मध्यम श्रेणी का जमींदार परिवार था। उसके बड़े भाई ने उससे पहले सुधार से ही दसवीं पास की थी। दसवीं करने के पश्चात उसने किसी सेंटर से जे.बी.टी. की। फिर किसी नज़दीकी स्कूल में मास्टर लग गया। नौकरी मिलने की देर थी कि उसका विवाह हो गया। उसकी घरवाली जे.बी.टी. टीचर थी। दौड़भाग करके उसके भाई ने उसकी बदली भी अपने स्कूल में करवा ली। दोनों एक साथ स्कूल जाते, एक साथ वापस लौटते। दो जनों की तनख्वाह से घर के हालात बदलने लगे। घर में एक किस्म की बहार ही आ गई। पर यह बहार अधिक देर न रही। सुखचैन की भाभी अक्खड़ स्वभाव की थी। साझा परिवार में वह न रह सकी। घर में झगड़ा रहने लगा। बड़े भाई ने घरवालों को अपने अलग होने की मंशा बताई। घरवालों की तो कंपकंपी छूट गई। उसके पिता ने खुद तंग रहकर जैसे तैसे उसे कोर्स करवाया था। सारी उम्मीदें उसी पर टिकी थीं कि यह नौकरी करेगा और घर को संभालेगा। साथ ही, छोटों को पढ़ाएगा। परन्तु जब उसने चारों पल्ले झाड़ दिए पिता को चिन्ता हुई। पिता ने शान्त मन से सोचा तो उसे घर के लड़ाई-झगड़े का एक हल नज़र आया। उसने बड़े लड़के को अलग रहने की इजाज़त दे दी। उसने सोचा कि घर तो जैसे पहले घिसट रहा था वैसे ही घिसटता रहेगा, पर घर में से लड़ाई-झगड़ा तो खत्म करें। लड़के को पिता का हुंकारा मिलने की देर थी कि उसने जगरावीं जाकर किराये पर मकान ले लिया। अपना डंडा-डेरा उठा कर शहर के किराये वाले मकान में रहने लग पड़ा। वहीं से दोनों पति-पत्नी स्कूल आते और वहीं से लौट जाते। घर में आना-जाना उन्होंने बिलकुल बन्द कर दिया। पिता को बेटे की नौकरी लगने का कोई फायदा न हुआ। उसके अनुसार तो वह न हुए के बराबर था। घर की कबीलदारी का रस्सा फिर से पिता के गले में आ पड़ा। इस बात का सुखचैन के दिल पर बड़ा असर पड़ा। उसे भी भाई के फैसले ने भीतर तक झिंझोड़ कर रख दिया था। भाई के माध्यम से घर में खुशहाली के उसने सपने देखे थे। उसे भाई-भाभी से नफ़रत हो गई क्योंकि उन्होंने घर की कबीलदारी को संभालने की बजाय भागने की सोची। बूढ़े पिता का बोझ बांटना तो दूर, उस पर और बोझ लाद दिया। सुखचैन का पिता 'रब की रज़ा' में रहने वाला इन्सान था। 'जो तुधि भावे...' कहते हुए उसने हाथ जोड़े। संभाल ली घर की जिम्मेदारी। इस घटना ने सुखचैन को समय से पूर्व ही गंभीर बना दिया। वह स्कूल से लौटकर खेत में चला जाता। पिता के साथ खेती के काम में हाथ बंटाता। छुट्टी वाले दिन खेत में काम करवाता। वह रात में जमकर पढ़ाई करता। दिन में अधिक से अधिक समय निकालकर खेत में काम करता। जब उसका भाई मास्टर लगा था तो वह सोचा करता था कि दसवीं करने के बाद वह कालेज ज़रूर जाएगा। कालेज को लेकर उसके बहुत सुनहरे सपने थे। अब वह सोचता कि स्कूल पास करने के बाद वह सीधे ही कोई कोर्स करेगा। फिर नौकरी करके घर की हालत बदलेगा। उसका स्कूल सुधार के बाहरी तरफ पड़ता था। स्कूल से पहले रास्ते में दायें हाथ डिग्री कालेज गुरूसर, सुधार का बोर्ड वह रोज देखा करता था। कई बार उसे कालेज के अन्दर जाने का अवसर भी मिला था। अन्दर रौब में घूमते लड़के और नाचती-कूदती लड़कियों को देखकर उसके अन्दर सरसराहट सी उठती। वह सोचता- शायद उसे भी कभी यहाँ आना है। इस कालेज में पढ़ने का उसका सपना था। लेकिन भाई की खुदगर्जी ने उसके सारे सपने चकनाचूर कर दिए। अब उसका एक ही लक्ष्य था कि कब वह कोई कोर्स पूरा करे, कब नौकरी लगकर घर की हालत को बदले।
जब उसका भाई घर से अलग हुआ, तब सुखचैन ने दसवीं कक्षा शुरू की थी। भाई वाली घटना के बाद वह पढ़ाई की ओर ज्यादा ध्यान देने लगा था। वह जानता था कि जितने अच्छे नंबर आएंगे, उतना ही अच्छा कोई कोर्स मिलेगा। कई बार वह पूरी पूरी रात जागकर पढ़ता रहता। उसमें आए इस परिवर्तन और इस बदलते स्वभाव की ओर बेशक किसी और ने ध्यान न दिया हो, पर रम्मी ने इसे अवश्य पकड़ लिया था। रम्मी हैरान थी। हँसते-खेलते सुखचैन को क्या हो गया ? जो सारा दिन हँसता-खिलखिलाता रहता था, उसे एकदम ही सांप सूंघ गया। मानो वह गुमसुम हो गया हो।
रम्मी रिटायर्ड कर्नल की बेटी थी। हलवारे फौज़ी हवाई अड्डे के सिरे पर अफसरों और अन्य कर्मचारियों के क्वाटर थे। रम्मी का पिता था तो फौज़ी अफसर पर वह कहीं ओर से रिटायर होकर आया था। इन क्वाटरों में हलवार अड्डे की यूनिट के ही सभी कर्मचारी थे। कुछेक बाहर से भी थे। रम्मी का पिता भारतीय फौज़ में से तो कर्नल के पद से रिटायर हो गया था, पर बाद में उसे एक ऐसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई जो हलवारा फौज़ी यूनिट के लिए काम करती थी। नौकरी मिलने के बाद उसने दौड़भाग कर इन क्वाटरों में से एक क्वाटर अपने लिए अलॉट करवा लिया। उसकी बड़ी लड़की ने हायर सेकेंडरी में दाख़िला ले लिया। क्वाटर नहर के निकट ही पड़ते थे। क्वाटरों के कुछ अन्य बच्चों के साथ रम्मी भी साइकिल पर ही स्कूल आने-जाने लगी। आरंभ में वह अन्य बच्चों में शामिल नहीं होती थी। वह फटी ऑंखों से देखती रहती। पता नहीं, ये ग्रामीण लड़के-लड़कियाँ उसे अच्छे नहीं लगते थे या फिर वह इन्हें कुछ समझती नहीं थी। पहली बार सुखचैन से उसकी बातचीत उस दिन हुई जिस दिन स्कूल से घर लौटते समय उसका साइकिल खराब हो गया। सब आगे बढ़ गए थे। वह साइकिल घसीटती पैदल नहर की पटरी पर चली आ रही थी। उस दिन सुखचैन भी किसी कारण पीछे रह गया था। उसने दूर से ही पहचान लिया था कि यह तो स्कूल में आई नई लड़की थी। सुखचैन ने करीब आकर उसका साइकिल ठीक करने की कोशिश की। साइकिल ठीक न हुआ। उसने रम्मी को अपने साइकिल के पीछे कैरिअर पर बिठा लिया और दायें हाथ से रम्मी का साइकिल पकड़कर साथ-साथ दौड़ाने लगा। सुखचैन के पीछे रम्मी आराम से बैठी थी। बैठते ही उसने राहत की सांस ली थी। पता नहीं कब से वह अपना साइकिल घसीटे चली आ रही थी।
''क्या नाम है तेरा ?'' सुखचैन ने बात चलाई।
''रमनदीप कौर। वैसे मुझे सब रम्मी कहकर बुलाते हैं।''
''लगता है, तेरे फॉदर फौज़ी अफ़सर हैं ?''
''थे, अब रिटायर हो चुके हैं। वैसे तुमने कैसे अंदाजा लगाया ?''
''तेरे बात करने के लहजे से। तूने नाम बताया -रमनदीप कौर। अगर कोई गाँव की लड़की होती तो जानती हो वह अपना नाम कैसे बताती ?'' सुखचैन ने पीछे की ओर मुँह करके कहा।
''कैसे ?'' रम्मी के मुँह पर चंचलता थी।
''वह कहती- मेरा नाम रम्मी है या कहती- रमनदीप। तेरी तरह पूरा नाम रमनदीप कौर नहीं बताती।''
वह खिलखिलाकर हँस पड़ी। इतनी सुन्दर हँसी सुखचैन ने पहली बार देखी थी। इतनी सुन्दर लड़की उसके बिलकुल पास लगकर पहली बार ही बैठी थी। थोड़ा सा भी साइकिल इधर-उधर होता तो रम्मी का मुँह सुखचैन की पीठ से जा लगता। उसे बहुत अच्छा लगता। फिर वह जानबूझ कर साइकिल यूँ चलाने लग पड़ा कि थोड़ी थोड़ी देर बाद रम्मी का मुँह उसकी पीठ से जा टकराता। फिर अचानक उसने साइकिल की ब्रेक लगाई तो रम्मी की गोल मोल सी देह सुखचैन की पीठ से जा लगी। वह रोमांचित सा हो उठा। उसे लगा कि काश, यह सफ़र खत्म ही न हो। रम्मी उसकी साइकिल के पीछे इसी तरह बैठी रहे। फिर वे इधर-उधर की बातें करने लग पड़े। सुखचैन के लिए यह पहला अवसर था कि वह किसी हमउम्र लड़की से बात कर रहा था। शायद रम्मी के लिए भी यह पहला मौका था। पन्द्रह-बीस मिनट में उनका सफ़र खत्म हो गया। रम्मी अपना साइकिल पकड़कर क्वाटरों की ओर चल पड़ी। ये पन्द्रह-बीस मिनट उनकी ज़िन्दगी में ऐसे आए कि उनके जीवन ही बदल गए।
इस घटना के बाद, जब कभी पुन: अवसर मिलता, वे एक दूसरे से बातें करने लगते। जब आपस में अच्छी तरह खुल गए तो बातें करने के लिए मौके तलाशने लगे। सवेरे तो सभी स्कूल की तरफ साइकिलों को दौड़ाते हुए जाते थे, स्कूल पहुँचने में ताकि देर न हो जाए। वापस लौटते हुए कोई जल्दबाजी न होती। सुखचैन और रम्मी धीमे-धीमे साइकिल चलाते सबसे पीछे रह जाते। जब सारा हुजूम आगे निकल जाता तो वे आराम से साइकिल बराबर-बराबर चलाते हुए बातें करने लगते। उनकी बातें पढ़ाई को लेकर होतीं, अध्यापकों को लेकर होतीं या फिर छुट्टियों के बारे में होतीं। बातें हालांकि साधारण ही होती थीं, पर उन्हें एक दूसरे के करीब रहकर अच्छा लगता। गर्मी का मौसम होने के कारण वह पानी पीने के लिए कहीं सघन दरख्तों की छांव में रुकते तो घड़ी दो घड़ी आमने-सामने बैठकर बातें करते। कभी साइकिल चलाते चलाते यूँ ही कहीं खड़े हो जाते। कुछ देर एक साथ बैठकर बिताते। कोई शक्ति थी जो दोनों को एक दूसरे की ओर खींच रही थी। यह खिंचाव दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा था। कई बार जब आस पास निर्जन और सुनसान होता तो रम्मी सुखचैन के पीछे कैरिअर पर बैठ जाती। सुखचैन उसका साइकिल दायें हाथ में पकड़कर अपनी साइकिल चलाता रहता। फिर वह साइकिल तेज तेज दौड़ाने लगता। फिर एकदम ब्रेक लगाता तो रम्मी उसकी पीठ से चिपक जाती। उस समय दोनों को बड़ा मीठा अहसास होता। इस प्रकार रोज़ अठखेलियाँ करते वे दिनों दिन निकट होते चले गए। फिर शरद ऋतु आई। वह भी गुजर गई। पढ़ाई के दिन थे। दोनों एक दूसरे को देखकर पढ़ने की ताकीदें करते। रम्मी पढ़ने में वैसे भी बहुत होशियार थी। प्लस टू के सालाना पेपर आ गए। पेपरों से पहले छुट्टियाँ हो गईं। घर बैठकर दोनों ने पेपरों की पूरी तैयारी की। उसके बाद पेपर शुरू हो गए। हर तीसरे-चौथे दिन वे पेपर देकर अपने अपने घरों को लौट जाते। अब पेपरों के अलावा और कोई बात न होती। जिस दिन अन्तिम पेपर था, रम्मी ने सवेरे जाते समय सुखचैन से कहा कि पेपर के बाद एक साथ वापस लौटेंगे। अन्तिम पेपर खत्म होते ही यूँ लगा जैसे सिर पर से भारी बोझ उतर गया हो। वापस लौटते हुए दोनों एक साथ हो लिए। रास्ते में अपनी मनपसंद जगह पर आमने-सामने बैठ गए।
''अब आगे का क्या प्रोग्राम है सुखचैन ?''
''क्या मतलब ?''
''मतलब यह कि कौन सा कालेज चुना है आगे की पढ़ाई के लिए ?''
''रम्मी, मुझे तो कोई ट्रेनिंग करनी है। जिस भी कोर्स में दाखिला मिला, उसी के हिसाब से कालेज होगा।''
''यह क्या बात कर दी कि ट्रेनिंग करूँगा।'' रम्मी ने नाक सिकोड़ते हुए कहा।
रम्मी की ओर देखकर सुखचैन ने नज़रें झुका लीं।
''डिग्री कालेज गुरूसर सुधार को देखते ही मेरा तो मन ललचाने लगता है कि कब इस कालेज में दाख़िला लूँ। इसके अन्दर कैसे लड़के-लड़कियाँ आज़ाद घूमते हैं। कैसे यहाँ खेल होते हैं। कैसे यहाँ गिद्धे-भंगड़े पड़ते हैं। ज़िन्दगी तो इस कालेज में है। मैं तो बी.ए. आर्ट्स में दाख़िला ले लूँगी। तू भी इसी कालेज में चल। हम दोनों एक ही कालेज में दाख़िला लेंगे।'' रम्मी अपने आप में मस्त हुई न जाने क्या क्या बोले जा रही थी।
''रम्मी, मन तो मेरा भी बहुत करता है इस कालेज में पढ़ने को। पर मेरी मजबूरी है। मैं आगे पढ़ाई चालू रखने की बजाय कोई कोर्स करना चाहता हूँ।'' फिर घर के हालात बताते हुए सुखचैन ने सब कुछ रम्मी को बता दिया। सुनकर रम्मी उदास हो गई।
''तेरे बग़ैर मेरा यहाँ दिल कैसे लगेगा ? साजन बिना कैसी खुशियाँ।'' रम्मी ने आँखें भर लीं।
''मैं तुझसे दूर कहाँ जाऊँगा। यहीं कहीं आसपास रहूँगा। मेरा भी कहाँ तुझे छोड़कर पढ़ने को मन करता है। पर रम्मी, मजबूरी अपनी जगह है।'' सुखचैन ने रम्मी का हाथ अपने हाथ में लेकर गहरा सांस भरा।
''तू हौसला रख। मैं कहीं भी होऊँगा, हफ्ते में एक बार तुझे ज़रूर ही मिला करूँगा।''
''जैसी तेरी मर्जी। मुझे हमेशा तेरी प्रतीक्षा रहेगी। ज़िन्दगी की आखिरी सांसों तक तेरा इंतज़ार करूँगी।'' कहते हुए रम्मी खड़ी हो गई।
''तू हौसला रख। तुझे अकेली नहीं छोड़ने वाला।'' सुखचैन भी चलने के लिए उठ खड़ा हुआ।
''अच्छा फिर, रिजल्ट आने तक मिलते रहना।'' इतना कहकर रम्मी ने अपनी राह पकड़ ली।
सुखचैन कुछ देर उसे जाते हुए देखता रहा। 'नसीब अपना अपना, रे मन चल अब।' अपने आप से बातें करता हुआ सुखचैन भी चल पड़ा। अब वह स्कूल की तरफ से खाली था। घर के काम में पूरा हाथ बंटा सकता था।
कई दिन तो वह छोटे-मोटे काम निपटाता रहा। इतने में गेहूं की कटाई का काम शुरू हो गया। उसने अपने पिता के सिर से खेती का सारा बोझ अपने कंधों पर ले लिया। उसने पूरी योजना के साथ गेहूं निकालने का जिम्मा संभाला। गेहूं संभल गई तो उसने झोने की तैयारी शुरू कर दी। पहले उसने इधर-उधर से बीज खोज कर बढ़िया पनीरी (धान की पौध) तैयार करवाई। फिर समय से पूरे खेत में धान की रौंपाई शुरू कर दी।
उस दिन वह खेत से थका-मांदा घर लौटा तो उनका पड़ोसी पंडित पूरन चन्द उनके घर में बैठा था जो उसका चाचा लगता था। उसके लड़के ने सुखचैन के साथ ही प्लस टू के पेपर दिए थे।
''आ भई भतीजे, बधाई ।''
''कैसी बधाई चाचा ?'' सुखचैन भौंचक सा झांका।
''अरे भतीजे, रिजल्ट आ गया। तेरा नाम भी मैरिट में है। कमाल कर दिया ओए भतीजे।'' पूरन चन्द ने उसे अपनी छाती से लगा लिया।
सुखचैन को इतनी खुशी हुई कि उससे कुछ बोला ही नहीं गया। मैरिट में नाम आने का सुनकर खुशी के आँसू उसकी आँखों में तैरने लगे। उसने कसकर चाचा को अपनी बांहों में भर लिया।
''वैसे तो हमारे वाले की भी फर्स्ट डिवीजन है पर तूने तो कमाल ही कर दिया। बहुत खुशी की बात है। अब बता, आगे तेरा क्या प्रोग्राम है ?''
पूरन चन्द सरकारी नौकरी करता था। वह नहरी रैस्ट हाउस अखाड़ा में एस.डी.ओ. का क्लर्क था जिसे एस.डी.सी. कहते थे। शुरू में वह दसवीं करके नहरी विभाग में क्लर्क भर्ती हुआ था। पहले तो रिकार्ड विभाग में था। बाद में तरक्की करता-करता एस.डी.ओ. का क्लर्क बन गया। एस.डी.सी. को बड़ा अनुभव होता है। जितने भी काम ओवरसियर करवाते हैं, वह सारा रिकार्ड उसके हाथों में से ही निकलता है। फिर वह बिल तैयार करके चैक करता है। ठेकेदारों को पेमेंट करवाता है। सारा लेखा-जोखा नीचे से ऊपर की ओर चलता पहले उसी से शुरू होता है। ऊपर से नीचे आने वाला लेखा जोखा भी उसी पर आकर खत्म होता है। वह ओवरसियरों, ए.डी.यू. और एक्सीयन की रत्ती रत्ती भर की कार्रवाई की खबर रखता है। उसके इसी अनुभव को देखते हुए सुखचैन ने उससे सलाह मांगी।
''तुम ऐसा करो फिर।'' पूरन चन्द बैठने के लिए चारपाई नज़दीक खींचते हुए बोला।
''हाँ जी। बताओ।''
''वैसे यार एक बात है कि मेरा लड़का आगे कालेज में पढ़ना चाहता है। पर मैं कहता हूँ कि कालेज जाने से अच्छा है कोई कोर्स कर ले। मैं तो कहता हूँ, तुम दोनों ओवरसियर के कोर्स कर लो।'' ओवरसियर के कोर्स सुनकर सुखचैन का दिल धड़क उठा।
''चुपचाप लुधियाना में ओवरसियर के कोर्स में दाख़िला ले लो। तुम्हारे नंबरों के हिसाब से तुम्हें दाख़िला भी सिविल में मिल जाएगा। फिर तीन साल कोर्स करके नहरी कोठी में ओवरसियर लग जाना।''
''वाह चाचा, कमाल कर दिया। ओवरसियर बनने का तो मेरा शुरू से ही सपना रहा है। मैं तैयार हूँ। बस, मुझे बताओ, दाख़िला मिलेगा कैसे ?''
''अगर तू तैयार है तो मैं अपने वाले को भी मना लूंगा। रही बात दाख़िले की तो कल चलते हैं। बस, सवेरे तैयार रहना।'' पूरन चन्द घर की ओर लौटते हुए बोला।
अगले दिन उन्होंने लुधियाना पहुँचकर अर्जियाँ भरीं। फिर दो सम्पाह बाद इंटरव्यू पर गए। उन्हें सिविल इंजीनियरिंग डिप्लोमे में दाख़िला मिल गया। सारे कागज-पत्र और फीस आदि भर दी। उन्हें हॉस्टल में कमरा भी मिल गया। सब कुछ हो गया। बस, अब उन्हें 20 अगस्त को क्लास शुरू करनी थी। उधर रम्मी ने भी सुधार कालेज में दाख़िला ले लिया था।
(जारी…)
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Monday, January 25, 2010

धारावाहिक उपन्यास


प्रिय दोस्तो… एक बार फिर मैं आपके समक्ष हूँ, अपने धारावाहिक उपन्यास “बलि” की अगली किस्त लेकर। मैं उन सभी पाठकों का हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने मेरे ब्लॉग पर आकर न केवल मेरे उपन्यास की पहली किस्त को पढ़ा बल्कि अपनी अमूल्य टिप्पणियां देकर मेरा उत्साहवर्द्धन भी किया। अब तो यह सिलसिला चल ही निकला है। मैं अपने इस धारावाहिक उपन्यास की अगली किस्तों के साथ आपसे रू-ब-रू होता ही रहूँगा। आपका यह स्नेह –प्यार मुझे भविष्य में भी मिलता रहेगा, ऐसा मेरा विश्वास है। -हरमहिंदर चहल


बलि
हरमहिंदर चहल

(गतांक से आगे...)


1.1
धीमे-धीमे ज़िन्दगी अपनी रफ्तार पकड़ने लगी। उसे आसपास की जानकारी होने लगी। अधिकतर वास्ता लोगों से ही पड़ता था। अधिकांश समय भी बाहर नहर पर ही गुजरता था। दफ्तर कोठी से तीसेक मील की दूरी पर था, पर हर रोज़ दफ्तर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। दफ्तर को एस.डी.ओ. का क्लर्क एस.डी.सी. चलाता था। असल में, सारे नहर विभाग के दफ्तर यहीं पर थे। इसे नहरी कॉलोनी के नाम से जाना जाता था। एस.डी.ओ., एक्सीअन, ज़िलेदार और पटवारियों के दफ्तर यहीं पर थे। ओवरसियर के दफ्तर में भी अधिक ज़रूरत नहीं होती थी। वह सप्ताह में एक-आध बार नहरी कॉलानी वाले अपने दफ्तर में जाता था। ओवरसियर का ज्यादातर काम बाहर अपने इलाके में ही होता था। लोगों की अनेक किस्म की शिकायतें होती थीं। किसी की शिकायत होती थी कि उनका मोघा सही नहीं। उसे चैक करने ओवरसियर ही जाता। किसी ने अपनी ऊँची ज़मीन के लिए पानी बंधवाने की अर्जी दे रखी होती तो ओवरसियर ज़मीन का लेवल करके देखता कि यहाँ पानी पहुँच सकता है कि नहीं। किसी को अपनी ज़मीन एक मोघे से निकलवा कर दूसरे मोघे में डलवानी होती तो इसके लिए दौड़भाग भी ओवरसियर ही करता। कभी कहीं नहर में से पानी लीक हो जाता या अन्य कोई टूट-फूट हो जाती तो ओवरसियर की दौड़धूप और भी बढ़ जाती।
पर अधिकांश समय ऐश-ओ-आराम में ही गुजरता था। सवेरे नौ-दस बजे तैयार होकर वह मोटर साइकिल पर बाहर निकलता। डिफेंस रोड तक जाते-जाते मन बन जाता कि उसे किस ओर जाना है। यदि शेरगढ़ कोठी जाना होता तो सीधा नहर की पटरी ही जाता। पटरी से जाने का एक लाभ तो था कि सारे इलाके की इंस्पेक्शन हो जाती। धीरे-धीरे मोटर साइकिल पर जाते हुए दोनों तरफ के मोघों का निरीक्षण करता जाता। अगर किसी ने मोघा तोड़ा होता तो पता चल जाता। कई जगह किसी ने 'कट' लगाकर पानी चोरी किया होता तो वह तुरन्त पकड़ा जाता। कई स्थानों पर लोगों ने रात में रबड़ के पाइप फेंककर पानी की चोरी की होती तो पाइपों के ताज़ा निशानों से चोरी का पता लग जाता। वैसे भी लोग नहरी बाबू को गुजरते देखते तो चोरी का साहस कम ही करते। लेकिन, कई बार इधर नहर की पटरी से गुजरने का खामियाज़ा भी भुगतना पड़ता। वह यह कि करीब आधे रास्ते जाकर बायें हाथ को चौधरी अक्षय कुमार की ढाणी पड़ती थी। कई बार अक्षय कुमार आसपास ही घूमता-टहलता मिल जाता तो फिर वह पीछा नहीं छोड़ता था। उसकी एक आदत बुरी थी कि वह दिन में भी शराब पीता था। बस, उसे साथ चाहिए होता था। साथ किसी भी वक्त मिल जाए तो शराब शुरू। पक्की रिहाइश तो उसकी गाँव वाली कोठी में थी, पर यह खेतवाली ढाणी भी किसी महल से कम नहीं थी। नीचेवाले कमरों में खेती का सामान पड़ा रहता था। ऊपर चौबारों के आगे खुला आँगन था जहाँ अक्षय कुमार अपना अड्डा जमाता था। या फिर ढाणी से बाहर निकलकर छायादार दरख्तों के नीचे जहाँ खुली हवा चलती थी। अक्षय कुमार के संग उसके दो-चार मित्र अवश्य हुआ करते। इसके अतिरिक्त उसके साथ चार बाडीगार्ड सदैव हुआ करते। यदि अक्षय कुमार कभी ढाणी में सोता तो वे सारी रात जागकर पहरा देते। दिन के समय वे अक्षय के इर्दगिर्द रहते। अगर अक्षय कहीं बैठने का प्रोग्राम बनाता तो बाडीगार्ड उससे कुछ फासले पर पोज़ीशन लेकर बैठते। कारण- एक तो बस शौक था। बाडीगार्ड संग रखने से बड़े लोगों की शान बढ़ती थी। लेकिन असली कारण यह था कि एक ज़मीन के सौ-एक किल्ले का उसका झगड़ा चल रहा था। दूसरी पार्टी उसके घरों में से ही थी। ज़मीन का झगड़ा बुजुर्ग़ों के समय से चला आ रहा था। इसके चलते दोनों धड़ों में कई बार टक्कर भी हुई थी। कई बार खून-खराबा भी हुआ था। परन्तु इस झगड़े का कभी कोई हल न निकला। पुश्त-दर-पुश्त झगड़ा भी आगे सरकता चला आ रहा था। वैसे, अक्षय कुमार के समय में यह लड़ाई कुछ ठंडी पड़ गई थी क्योंकि अक्षय कुमार ठंडे स्वभाव का नरम आदमी था। उसने तो इस झगड़े को निपटाने के लिए कुछ साझे बन्दों को बीच में रखकर राज़ीनामा करने का भी प्रयास किया था। राज़ीनामा तो अभी तक नहीं हुआ था, पर झगड़े की सुलगती आग मद्धम अवश्य पड़ गई थी। अक्षय कुमार खुद अकेला था। आगे, उसके भी एक ही पुत्र था जबकि दूसरे धड़े में बन्दों की कमी नहीं थी। यही कारण था कि अक्षय चाहता था कि झगड़े का हमेशा-हमेशा के लिए अन्त हो जाए।
कोठी से निकलते ही सुखचैन असमंजस में था कि किस तरफ चला जाए। डिफेंस रोड तक पहुँचते-पहुँचते उसके मन ने कोई फैसला नहीं किया। डिफेंस रोड का पुल चढ़ते हुए उसने इधर-उधर देखा और सीधा नहर की पटरी पर चढ़ गया। रात में हुई हल्की बारिश के कारण धूल दबी हुई थी। आसपास नज़र दौड़ाने पर दूर-दूर तक नरमे की खेत लहराते नज़र आते थे। नहर के दायीं ओर ही सिर्फ़ हरियाली थी। बायीं तरफ तो टीला शुरू हो जाता था जो कई मील तक नहर के साथ-साथ चलता था। स्याह काले नरमों के खेत शराबी हुए जट्ट(किसान) की तरह कल्लोल कर रहे थे। सावन का महीना बीत गया था। बस, नरमे के खेतों को फल पड़ने वाला था। अगला पुल पार करते नहर की पटरी पर टीले का रेता फैला पड़ा था। मोटर साइकिल घुर्र-घुर्र की आवाज़ करता और टेढ़े-मेढ़े बल खाता रेता पार कर गया। आगे फिर साफ़ पटरी शुरू हो जाती थी। उससे अगले पुल पर खड़े होकर सुखचैन ने अपने पैरों को थोड़ा मला। यह राह वहावखेड़े को जाता था। उससे आगे रत्तेखेड़े गाँव में से होकर ही अबोहर को जाया जा सकता था। वहाँ खड़े-खड़े उसने कुछ देर सोचा कि क्यों न आज दफ्तर ही हो आया जाए। फिर उसने बायीं ओर निगाह दौड़ाई। सामने अक्षय कुमार की ढाणी थी। 'चलो, अक्षय के पास ही चलते हैं।' सुखचैन ने मन में कहा। मोटर साइकिल पुन: नहर की पटरी पर चढ़ा ली। ढाणी के बराबर आकर उसने निगाह डाली तो ढाणी में दो जीपें खड़ी थीं। इसका अर्थ था- अक्षय ढाणी में ही था। अगले पुल पर उसने मोटर साइकिल स्टैंड पर खड़ी कर दी। वहाँ से वह यूँ ही पैदल पीछे की ओर मुड़ गया। ढाणी के बराबर नहर में आमने-सामने दो मोघे थे। बायीं ओर का मोघा अक्षय कुमार का था। दायीं ओर वाला वहावखेड़े और रत्तेखेड़े वालों का। यह दोनों गाँव का साझा मोघा था। उसने दायीं ओर के मोघे को गौर से देखा। मोघे के साथ ही नहर की तरफ कुछ घास दबा हुआ था। उसे कुछ शक-सा हुआ तो वह पुल की तरफ चल पड़ा। पुल पर से होकर छोटी पटरी की तरफ हो लिया। मोघे पर खड़े होकर इधर-उधर दृष्टि घुमाई। रात में किसी ने पाइप लगाए थे। 'खसके' पर घास दबा हुआ था। ऊपर खाल के किनारे भी पाइपों के निशान थे। इसका मतलब रात में जिस किसी की भी पानी की बारी थी, उसने पाइप लगाकर पानी चोरी किया था। कहीं ओर जाने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया था। बस, अब पटवारी को मिलकर उस आदमी का पता लगाना था जिसकी रात में पानी की बारी थी ताकि पानी चोर को पकड़ा जा सके। वह वापस जैसे ही पुल पर पहुँचा तो सामने से अक्षय कुमार आता दिखाई दिया। उसने ढाणी के चौबारे में खड़े-खड़े ही मोटर साइकिल की उड़ती धूल देख ली थी। वह तभी अपने आदमियों के संग पुल की ओर चल पड़ा था। वह जानता था कि यह मोटर साइकिल नहरी बाबू का ही है। करीब पहुँचते ही अक्षय बोला, ''क्यों? मिला कुछ ?'' उसने दूर से ही देख लिया था कि बाबू निशानियाँ खोज रहा था।
''मिल तो बहुत कुछ गया है। बस, अब तो बन्दे का पता लगाना है। पटवारी से बन्दे का नाम भी पता चल जाएगा।'' सुखचैन जाने के लिए अपने मोटर साइकिल की तरफ बढ़ा।
''छोड़ यार, आ ढाणी में चलते हैं।'' अक्षय, बाबू का हाथ पकड़ते हुए बोला। साथ ही उसने अपने एक आदमी को इशारा किया कि वह बाबू का मोटर साइकिल ढाणी में ले चले।
''नहीं अक्षय, मुझे इस बन्दे को ज़रूर पकड़ना है।'' सुखचैन ने जिद्द की।
''वह भी हो जाएगा। पहले ढाणी तो चलें।'' वह सुखचैन को ढाणी की तरफ ले चला। ढाणी पहुँच कर उसने रसोइये को खाना बनाने का आदेश दे दिया। स्वयं मेज सजाने लगा।
''ऐसे तो काम नहीं चलेगा।'' सुखचैन का ध्यान पाइपों की ओर था।
''मुझे सब पता है, तू फिक्र न कर।'' अक्षय ने विश्वास दिलाया।
''क्या मतलब ?'' सुखचैन हैरान था।
''तेरे यारों ने ही रात में पाइप लगाये हैं।''
''मेरे यार कौन से आ गए ?''
''जो उस दिन मोघा लगाते समय तेरे से बहस कर रहे थे।''
''अच्छा ! वो वहावखेड़े की ढाणी वाले।'' करीब दो महीने पहले इसी मोघे की मरम्मत हुई थी। इस पुल वाली राह पर गाँव से बाहर जो ढाणी थी, उसे वहावखेड़े की ढाणी कहते थे। मोघे की मरम्मत के समय इस ढाणी वाले फालतू की लीडरी झाड़ते हुए सुखचैन से मोघे के साइज़ के बारे में बहस करने लगे थे। सुखचैन ने किसी की नहीं मानी थी। अपने हिसाब से मोघा ठीक कर दिया था। शायद, इसी कारण अक्षय मजाक में उन्हें बाबू के यार बता रहा था।
''ले अक्षय, फिर तो फंस गए कबूतर जाल में। अब नहीं छोड़ूंगा।''
''जल्दी न मचा, कबूतरों को अच्छी तरह फंस लेने दे।''
''क्या मतलब ?'' सुखचैन ने हैरानी से अक्षय की ओर देखा।
''वह यूँ कि आज रात फिर उनकी पानी की बारी है। आज रात वे फिर पाइप लगाएँगे।''
''पक्का पता है ?''
''पूरा पक्का।''
''तो यूँ कर फिर। एक जीप कोठी भेज दे। मैं बस आधे घंटे में लौट कर आया।''
अक्षय कुमार सुखचैन की बात समझ गया था। सुखचैन ने मोटर साइकिल पुन: नहर की पटरी पर चढ़ा दी। नीचे की ओर चल पड़ा ताकि देखने वाले को लगे कि बाबू तो चला गया। अगले पुल के रास्ते वह कोठी की ओर मुड़ गया। तब तक जीप कोठी पहुँच चुकी थी। सुखचैन ने अकेले मेट को एक तरफ ले जाकर सारी बात समझाई। फिर जीप में बैठकर वह अक्षय की ढाणी चला गया। शेष बचा दिन उन्होंने खाते-पीते बिताया। उसने अपनी योजना बना ली थी। करीब दो घंटे रात बीतने पर मेट पाँच-सात बेलदारों के संग टेढ़े रास्ते से होता हुआ अक्षय की ढाणी पर पहुँच गया। सुखचैन तैयार था। उधर मोघों की तरफ हलचल-सी हुई। चार-पाँच आदमी पाइप खींचकर लाए। आधे घंटे की मशक्कत के बाद पाइप चला दिए। खाल में पानी दुगना हो गया। अपनी ओर से बेफिक्र होकर पाइप लगाने वाले लौट गए, सिर्फ़ एक व्यक्ति मोघे पर रह गया। सुखचैन, मेट और बेलदारों को लेकर धीमे-धीमे मोघे की ओर बढ़ा। दोनों तरफ से घेर कर उन्होंने उस व्यक्ति को पकड़ लिया और बांध दिया। फिर पाइप बाहर निकाले। बेलदार अपने साइकिल ले आए। सारे पाइप साइकिलों से बांधे और कोठी की ओर ले चले। सुखचैन ने जीप मंगवाई और उस पकड़े हुए आदमी को संग लेकर वह भी कोठी की तरफ चल पड़ा। प्रोग्राम यह था कि सवेरे दिन चढ़ने पर उस व्यक्ति को पाइपों सहित थाने ले जाकर मालिक के नाम का पर्चा कटवाया जाएगा। पकड़ा गया आदमी वहावखेड़ा ढाणीवालों का 'सीरी' था। अक्षय इस सारे आपरेशन के दौरान पर्दे के पीछे रहा। उसका कहना था कि पड़ोस का मामला है। इस प्रकार सामने आना अच्छा नहीं लगता। आपरेशन पूरा करके सुखचैन कोठी में आकर आराम से सो गया।
दिन अभी चढ़ा भी नहीं था कि अक्षय की ढाणी से एक आदमी कोठी पहुँच गया। उसे अक्षय ने ही भेजा था। उसे हिदायत सिर्फ़ इतनी थी कि वह बाबू को एक तरफ ले जाकर सन्देशा दे कि अक्षय कुमार कोठी आ रहा है। उसके आने से पहले वह कहीं न जाए। अक्षय स्वयं सुबह-सुबह जाकर बाबू को नींद से नहीं उठाना चाहता था। वह जानता था कि इस पकड़-पकड़ाई में ही रात काफी बीत गई थी। बाबू अभी आराम से ही उठेगा। सुखचैन ज्यों ही उठा तो उसने बाहर की तरफ देखा। बाहर मेट घूम रहा था। सुखचैन को करीब आता देख मेट भी आगे बढ़ा।
''अक्षय कुमार की बन्दा आया है जी।'' मेट ने सल्यूट मारते हुए बताया।
''क्यों ? सब ठीक तो है ?'' सुखचैन हैरानी-सी में बोला।
''पता नहीं जी। वह तो मुँह-अंधेरे में ही आकर बैठा हुआ है। उसने कहा है कि अक्षय आपके पास ही आ रहा है। आप उसे मिले बगैर कहीं न जाएँ।''
''अच्छा, चलो ठीक है। मैं भी तैयार होता हूँ। और हाँ, जिसे रात में पकड़कर लाए हो, उसे चाय-पानी पिला दो।'' इतना कहकर सुखचैन अन्दर चला गया। वह समझ गया था कि अक्षय कुमार रात वाली पाइपों की बाबत ही आ रहा होगा। क्या मालूम, उन्होंने उससे कोई सिफारिश डलवाई हो। अड़ोसी-पड़ोसी गाँव हैं, क्या पता। जब सुखचैन तैयार होकर बाहर आया तो अक्षय रैस्ट हाऊस के सामने बिछी कुर्सियों पर अपने आदमियों के संग बिराजमान था।
''सारा गुड़ गोबर हो गया यार !'' अक्षय ने सुखचैन से हाथ मिलाते हुए उसे एक ओर ले जाकर कहा, ''आज सवेरे मुँह-अंधेरे ही रत्तेखेड़े वाले करनबीर का फोन आ गया कि ये पाइपों वाले बन्दे तो अपने ही हैं।''
''अब पकड़ कर कैसे छोड़ दें ? पहले पता नहीं था इन्हें, जब चोरी करते थे ?'' सुखचैन के माथे पर बल पड़ गए।
''फिर अब उस करनबीर की बात कैसे लौटाएँ ?'' अक्षय कुमार भी चिंतातुर था। करनबीर रत्तेखेड़े के ऊँचे सरदारों का लड़का था। वह अक्षय कुमार के साथ पढ़ता रहा था। दोनों की बड़ी गहरी दोस्ती थी। अक्षय के कारण ही सुखचैन की थोड़ी-सी जान-पहचान करनबीर से थी।
दोनों बातें करते-करते नहर की पटरी पर आ गए। अक्षय की बातें सुनकर वह सोच में पड़ सामने बहते हुए पानी की ओर देखने लगा।
''बात अब करनबीर की नहीं, यह तो अब मेरी बन गई। अब बता क्या करें ? बुरे फंस गए।''
''बुरे तो फंस ही गए। आज अगर इन्हें छोड़ दिया तो लोगों को मुँह लग जाएगा।'' सुखचैन को भी राह नहीं सूझ रही थी।
''अब तो जो भी हो, इन्हें छोड़ना तो पड़ेगा ही।''
''बड़ी मुश्किल से तो पकड़े थे यार ! उनकी उस दिन वाली लीडरी तो निकल ही जाती।''
''चल, गोली मार उस बात को। अब पीछे क्या रह गया जब करनबीर की झोली में ही आ गिरे। चल, वहीं चलते हैं, जैसा चाहे कर लेना। बस, केस को रफा-दफा कर।''
''केस तो अब रफा-दफा ही समझ। पर वहाँ कहाँ जाना है ?''
''बात ऐसी है कि करनबीर टांग टूटी होने के कारण चल फिर नहीं सकता। वे लोग उसके घर में ही बैठे हैं। करनबीर का कहना है कि तुम उसके यहाँ बैठकर इन लोगों को बेशक जूते मार लो या कुछ और कर लो। बस, केस न बनाओ।''
''तो क्या अब हमें करनबीर के घर जाना होगा ? यह क्या बात हुई ?''
''देख सुखचैन, उसकी मज़बूरी है। पर वह कहता है कि एकबार उसके घर आ जाओ। उसने बन्दे तुम्हारे हवाले करने हैं। इतना तो उसे भी पता है कि मोघे की मरम्मत वाले दिन ये तेरे गले पड़ रहे थे।''
सुखचैन समझ गया कि करनबीर कोठी में आने से मजबूर था, पर वह उन लोगों को सबक भी सिखाना चाहता था। वह भी उसके सामने। और फिर, अक्षय कुमार बीच में था ही, जाना तो अब पड़ेगा ही।
उसने सबको काम पर भेज दिया। स्वयं अक्षय कुमार के संग चला गया। जीपें सीधी नहर की पटरी पर हो गईं। अक्षय की ढाणी वाले पुल से वे दायें हाथ की ओर कच्चे रास्ते पर हो लिए। वहावखेड़ा गाँव के ऊपर से घूम कर आगे मील भर की दूरी पर था- रत्ता खेड़ा। रत्ता खेड़ा आगे एक लिंक रोड से होकर अबोहर - हनुमानगढ़ सड़क से जुड़ा हुआ था। लिंक रोड के अड्डे से अबोहर थोड़ी दूर ही रह जाता था।
जैसे ही जीपें दरवाजे के सामने जाकर रुकीं तो नौकर सभी को एक तरफ बड़ी-सी बैठक में ले गया। वहाँ करनबीर टांग पर पलस्तर बांधे एक पलंग पर पड़ा था।
''भाई जी, माफ़ करना, मैं तो उठ नहीं सकता।''
''गाड़ी ज़रा धीमी चलाया कर।'' अक्षय ने नसीहत दी। पहले उन्हें चाय पानी पिलाया गया। इधर-उधर की बातें होती रहीं।
''भाई जी, एक बार हमारी इज्ज़त ज़रूर रखो। बन्दे तो बिलकुल ही नीचे लगे पड़े हैं।'' करनबीर सुखचैन से सम्बोधित हुआ।
''चल, वो बात तो अब खत्म हो गई। कोई और बात सुना।'' सुखचैन ने माहौल को सहज बनाते हुए कहा।
''एक बार तुम्हारे सामने ज़रूर करता हूँ इन्हें। तुम चाहो तो जूतियाँ मार लो।''
''नहीं, नहीं यार। जाने दे अब उन्हें।''
सुखचैन के रोकते-रोकते भी करनबीर ने नौकर भेजकर उन लोगों को बुला लिया। वहवाखेड़ा ढाणी के तीन-चार लोग गर्दन झुकाये बैठक में घुसे। हाथ जोड़ कर नमस्ते की। बैठने से वे शरमा रहे थे।
''कोई बात नहीं सरदार जी, बैठो चारपाई पर।'' सुखचैन ने उनकी झिझक-सी दूर की।
''बाबू जी, काम तो बड़ा शर्मिन्दगी वाला कर बैठे...।'' उनके एक बड़े व्यक्ति ने शर्मिन्दगी जताते हुए बात शुरू की, ''इस बार मेहरबानी करो, आगे ऐसे काम के पास से भी नहीं गुजरेंगे।'' उस गर्दन झुकाये व्यक्ति ने अपनी बात पूरी की।
''नहीं, इसमें मेहरबानी वाली कौन सी बात है। अगर अहसान मानना है तो करनबीर और अक्षय का मानो। इन्हीं के कारण बात यहीं पर खत्म हो गई।'' सुखचैन ने उनके सामने करनबीर और अक्षय की तारीफ़ की।
''नहीं जी, अहसान तो सभी का है। आप तो हमें सेवा बताओ।'' इतना कहकर उसने जेब में हाथ डाला।
''नहीं भाई साहब। मैं यह काम नहीं करता।'' सुखचैन ने हाथ खड़ा करके उसे रोका।
''फिर हमें कोई तो हुक्म करो।'' वह फिर सिर झुकाये बोला।
''बस, यह काम दोबारा न करना। और सरकारी मुलाजिम से बोलने का ढंग थोड़ा ठीक रखा करो।'' सुखचैन ने उस दिन वाली बात की ओर इशारा किया।
उनकी बोलती बन्द हो गई। कोई बात नहीं सूझी।
''ठीक है, कोई बात नहीं। हम सब भाइयों जैसे ही हैं।'' सुखचैन ने माहौल को सहज-सा बनाते हुए उन्हें वापस भेज दिया।
शिखर दोपहरी हो चुकी थी। करनबीर ने भोजन का आर्डर दे दिया। सुखचैन ने आराम से बैठते हुए आसपास नज़रें घुमाईं। बैठक बहुत सुंदर ढंग से सजाई हुई थी। हर तरफ चौधराहट झलकती थी।
सामने वाली दीवार पर चार-पाँच तस्वीरें एक पंक्ति में लगी हुई थीं। ये उनके पुरखों की स्मृतियाँ थीं। एक तरफ शेर की खाल लटक रही थी। साथ ही हिरन के लम्बे सींगों वाला बड़ा-सा सिर टंगा हुआ था। दीवारों पर टंगी निशानियाँ सरदारों के शौक की कहानी कह रही थीं। करनबीर और अक्षय आपस में बातें करने लग पड़े।
उन्हें बातें करता छोड़ सुखचैन उठकर दीवारों पर टंगी पेटिंग्स देखने लगा। वहीं से उसने दरवाजे की तरफ देखा। एक तरफ बाड़ के घेरे में मृगों का एक जोड़ा खड़ा था। सुखचैन धीमे कदमों से करीब जाकर उछलते-कूदते मृगों को देखने लग पड़ा। साथ ही, कबूतरों और तीतरों का दरबा था। सुखचैन जानवरों की अठखेलियाँ देख ही रहा था कि अचानक उसके कानों में जानी-पहचानी आवाज़ पड़ी-
''सुखचैन... तू ?''
सुखचैन ने पीछे मुड़कर देखा। सामने सत्ती खड़ी थी।
''हाँ मैं, पर सत्ती तू यहाँ कहाँ ?'' सुखचैन हैरान हुआ।
''मेरा तो यह घर है।'' सत्ती खुलकर हँसी।
उन्हें बातें करता देख करनबीर आश्चर्य में भरकर उनकी तरफ़ देखने लगा। फिर कोहनी के बल होकर वह ऊँचे स्वर में बोला-
''कैसे ? तुम एक दूसरे को जानते हो ?''
''जी हाँ, मैं भी लुधियाने में ही पढ़ा हूँ।'' सुखचैन ने मुस्कराते हुए बड़ी आत्मीयता से उत्तर दिया।
''वाह भाई ! फिर तो पुराने स्टुडेंट्स का पुनर्मिलाप हो गया।'' यह कहकर करनबीर पुन: अक्षय के साथ बातों में व्यस्त हो गया। उधर सुखचैन और सत्ती एक ओर फूलों की क्यारी की तरफ बढ़ गए।
''सुखचैन, तू इधर कैसे ?'' सत्ती ने बात आगे बढ़ाई।
''मैं इधर नौकरी करता हूँ।''
''नौकरी ? इधर... पर इधर नौकरी कहाँ करता है ?'' सत्ती हैरान थी।
''मैं तुम्हारे नज़दीक ही नहरी कोठी रतनगढ़ में ओवरसियर हूँ।''
''अच्छा ! यह कोठी तो हमारे इलाके में बहुत मशहूर है।'' सत्ती को उत्सुकता हुई, ''पर तू यहाँ इस तरह मिलेगा, मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था।''
''देख ले, तू तो बिन बताए लुधियाना ही छोड़ आई थी।'' अचानक सुखचैन संजीदा हो गया, ''पर अब तू कहाँ पढ़ती है ?''
''अब मैं पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में पढ़ती हूँ।''
''पटियाला में दिल लग गया ?''
''दिल कहा तो बहुत कहा। यह यूनिवर्सिटी तो बहुत बढ़िया है। सच पूछो तो लुधियाना तो यूँ ही है- मशीनी शहर सा। पटियाला में तो ज़िन्दगी जोश से भरपूर रहती है।''
''चल फिर तो ठीक है, बहुत अच्छा हुआ।''
''सुखचैन तेरा डिप्लोमा पूरा हो गया। तुझे बढ़िया नौकरी मिल गई। मुझे यह जानकर बड़ी खुशी हुई है। उस वक्त नहीं लगता था कि डिप्लोमा पूरा होगा।'' सत्ती को भी पुराना समय स्मरण हो आया था।
''हाँ, उस वक्त तो हालात बहुत खराब थे। बस, किस्मत अच्छी समझो कि कोर्स पूरा हो गया।''
''सच, सुखचैन...'' बात करते-करते सत्ती ने अचानक चुप होकर आकर आसपास देखा। फिर दुबारा बोली, ''तुझे गुरलाभ कभी मिला ?''
''गुरलाभ ! तुझे नहीं पता ?'' सुखचैन के चेहरे पर कई भाव आए और कई गए।
''कैसा पता ? क्या बात है ? कहाँ है गुरलाभ ?'' सत्ती ने परेशान-सा होकर सुखचैन की तरफ देखा।
''सत्ती, वह तो...'' वह बताने ही चला था कि गुरलाभ और उसके साथी तो लुधियाना में किसी मीटिंग के दौरान ही पकड़े गए थे, उसके बाद सबकी पुलिस मुठभेड़ में मरने की खबर ही आई थी, लेकिन सामने से चले आते अक्षय को देखकर सुखचैन खामोश हो गया। प्रश्न भरी नज़रों से सत्ती भी सुखचैन को कुछ कहने ही वाली थी कि पीछे से आती पदचाप सुनकर वह भी चुप हो गई। अक्षय के करीब आने पर दोनों ने बातों का रुख बदल दिया। अक्षय सुखचैन को संग लेकर लौट गया। सत्ती के मन में उथल-पुथल होने लगी। गुरलाभ के साथ क्या हुआ ?...
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अबोहर की नहरी कालोनी के सामने वाली सड़क की तरफ से शहर से बाहर निकलते ही लगता था कि राजस्थान शुरू हो गया। वैसे भी राजस्थान का बार्डर यहाँ से मात्र बीसेक किलोमीटर ही था। इस सड़क पर ट्रैफिक भी अधिक नहीं होता था। इधर आस पास कोई बड़ा शहर भी नहीं था। इधर के गाँवों में भी अधिकतर किसान ही थे। आम तौर पर सभी गाँवों की आबादी मिली-जुली-सी थी। किसी गाँव में किसान सिखों की आबादी थोड़ी अधिक थी तो किसी गाँव में बागड़ी बोलते किसान अधिक थे। कई गाँव तो पूरे के पूरे जट्ट सिखों के थे अथवा पूरे जाटों के। अबोहर के दसेक किलोमीटर बाहर जाकर एक छोटा-सा बस-अड्डा आता था। गाँव बस-अड्डे से थोड़ा हटकर था। गाँव तक लिंक रोड जाती थी। गाँव का नाम था- रत्ताखेड़ा। यह कम आबादीवाला गाँव था। पूरी आबादी ही जट्ट सिखों की थी। गाँव में दो ही परिवार थे। एक बड़ा परिवार, दूसरा छोटा परिवार। गाँव के दूसरी तरफ बड़ा परिवार पड़ता था। उससे आगे सड़क नहीं थी। आगे कच्चा राह जाता था जो अगले गाँव वहावखेड़े के बीच में से होकर नहर पर जा चढ़ता था। बड़े परिवार की गिनती के ही घर थे। बस, केवल पन्द्रह घर। ये घर बड़ी ज़मीनों वालों और सरदारों के थे। किसी भी घर के पास सौ किल्ले से कम ज़मीन नहीं थी। इस पन्द्रह घरों की लगभग दो हजार किल्ले ज़मीन थी। बहुत वर्ष पहले इस दो हजार किल्ले के टुकड़े का एक ही मालिक था - सरदार मोता सिंह। यह अंग्रेजों के जमाने की बात है। मोता सिंह को अंग्रेजों ने उसकी विशेष सेवाओं के बदले में यह दो हजार किल्ले की ज़मीन का टुकड़ा और सफ़ेदपोश का खिताब बख्शा था। सरकार-दरबार में उसका रुतबा था। मोता सिंह को ज़मीन का मालिकाना हक तो मिल गया पर मोता सिंह को भविष्य में इस ज़मीन का कोई वारिस नहीं मिला। सफ़ेदपोश मोता सिंह ने तीन विवाह करवाये, पर तीनों से ही औलाद न हुई। मोता सिंह की दो बहनें थीं। वे दोनों ब्याही हुई थीं और अपने-अपने घर में बसी थीं। जब कोई चारा न रहा तो मोता सिंह ने दोनों बहनों के परिवार रत्तेखेड़े में बुलवा लिए और सारी ज़मीन की मालिकी उन्हें सौंप दी। उसके बाद दोनों बहनों के परिवार ज़मीन के मालिक बनकर खेती करवाने लगे। नई पीढ़ियाँ आने लगीं। परिवार बढ़ते चले गए। फिर उन दो परिवारों से पन्द्रह परिवार बन गए। पन्द्रह घरों के लिए भी ज़मीन बहुत थी। सभी घरों ने बड़ी-बड़ी कोठियाँ बनवा रखी थीं। कई घर पुरानी किलेनुमा हवेलियों में ही रहते थे। इन्हीं में से एक हवेली का मालिक था - जंग सिंह। जंग सिंह ने सारी उम्र सरदारी करते हुए पूरी-पूरी ऐश की थी। जंग सिंह के तीन बच्चे थे। बड़ी लड़की बहुत पहले ब्याह दी गई थी। उससे कई साल बाद जन्मा इकलौता बेटा था- करनबीर जो विवाहित था और तीस बरस का हो चला था। करनबीर से छोटी थी सतबीर जिसे प्यार से सब सत्ती कहकर बुलाते थे।
सत्ती घर में सबसे छोटी होने के कारण लाडली थी। उसका बचपन घरवालों के लाड़-प्यार में ही बीता था। जब उसे स्कूल में पढ़ने भेजा गया, उस समय गाँव में मिडिल स्कूल था। बचपन कब बीत गया, पता ही नहीं चला। आसपास के गाँवों में उन दिनों प्राइमरी स्कूल ही थे। रत्तेखेड़े के परिवार की ओर करीब दो मील पर एक छोटा-सा गाँव और था - अमरगढ़। अमरगढ़ भी सरदारों का गाँव था। यहाँ सिर्फ़ प्राइमरी स्कूल था। यह गाँव अबोहर डबावली सड़क के बिलकुल ऊपर पड़ता था। अबोहर भी यहाँ से पांचेक किलोमीटर दूर था। गाँव के बच्चे प्राइमरी करने के बाद अबोहर की बजाय रत्तेखेड़े के मिडिल स्कूल में ही पढ़ने जाते थे। लोग छोटे बच्चों को शहर भेजने के स्थान पर साथ वाले गाँव में ही भेजना पसंद करते थे। गुरलाभ अपनी ननिहाल वाले गाँव अमरगढ़ में रहता था। उसका अपना गाँव कुरज कलां तो लुधियाना ज़िले में सुधार के पास था। लेकिन उसके ननिहाल में कोई छोटा बच्च न होने के कारण उसे ननिहालवालों ने अपने पास रख लिया था। उसने प्राइमरी अमरगढ़ के पास करके रत्तेखेड़े के मिडिल स्कूल में दाख़िला ले लिया। गाँव के अन्य बच्चे भी रत्तेखेड़े जाते थे। कुछ पैदल चलकर और कुछ साइकिलों पर। जब गुरलाभ ने छठी कक्षा में दाख़िला लिया तो उसी समय सत्ती भी छठी में दाख़िल हुई थी। लड़के-लड़कियाँ उस समय सब एक जैसे थे। इकट्ठा खेलते, एक साथ पढ़ते और इकट्ठे लड़ा करते। सत्ती और गुरलाभ का तभी आपस में लगाव-सा आरंभ हो गया था। दोनों एक -दूसरे के करीब रहते। तब, दोनों में एक दूसरे को अच्छा लगने के अतिरिक्त कुछ नहीं था। मिडिल स्कूल के तीन साल चुटकी बजाते गुजर गए। उसके बाद सत्ती को अबोहर में लड़कियों के एक स्कूल में दाख़िला दिला दिया गया। वहाँ छोटा सा एक हॉस्टल था। वह हॉस्टल में ही रहती थी। गुरलाभ भी अबोहर में पढ़ने लगा था। वह गाँव के अन्य बच्चों के संग सवेरे बस पर शहर पढ़ने जाता। शाम को बस पर ही वापस अमरगढ़ लौटता। महीना, बीस दिन में कभी-कभार बस में या कहीं दूसरी जगह गुरलाभ और सत्ती का आमना-सामना हो जाता था। यह वो वक्त था जब बचपन पीछे छूट चुका था और ज़िन्दगी उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ती जवानी की ओर बढ़ रही थी। अब वे जब कभी मिलते तो एक-दूजे की आँखों में आँखें डालकर झांकते। जब भी कहीं नज़रे मिलतीं तो चुम्बक की भांति जुड़ जातीं। वैसे आपस में कभी कोई बातचीत नहीं हुई थी। लेकिन आँखों ही आँखों में बहुत-सी बातें हो जातीं। ऐसी मुलाकात के बाद वे फिर से एक-दूसरे को मिलने के लिए तरसते। इस तरह फिर कभी संयोग से मुलाकात हो जाती। ज्यों-ज्यों मुलाकातें बढ़ती गईं, त्यों-त्यों मिलने की चाह और ज्यादा बढ़ती चली गई। कई बार गुरलाभ सत्ती के स्कूल के आसपास चक्कर लगाता रहता कि शायद सत्ती कहीं दिखाई दे जाए। मुलाकात तो कभी संयोग से ही होती थी। इस तरह संयोग से हुई मुलाकातों की यादों को और उन पलों को वे दिल में बसाये अगली मुलाकात की प्रतीक्षा किया करते। स्कूल के ये चार वर्ष भी चुपचाप पता नहीं कब बीत गए।
प्लस-टू करके कालेज में दाख़िला लेने का समय आ गया था। गुरलाभ की मसें भीग आई थीं। दाढ़ी उतरने लगी थी। वह शरीर से दुबला-पतला था। देखने में लम्बू-सा लगता था। उधर सत्ती ने भी लम्बा कद निकाल लिया था, पर अभी वह पतली-पतंग सी थी। हल्की-सी मानो तितली हो। दोनों ने जवानी की दहलीज़ पर पैर रख लिया था। प्लस-टू पास करने के पश्चात् वे सिर्फ़ एक बार खुलकर मिले थे, वह भी बस में अबोहर से गाँव की तरफ लौटते दोनों को किस्मत से साथ-साथ सीट पर बैठने का अवसर मिल गया। दो जवान दिलों की यह पहली मुलाकात थी। उनसे कोई बात नहीं हो पा रही थी। दोनों को कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि क्या बातें करें। उन्होंने पढ़ाई की, कालेज की, आगे की पढ़ाई की बातें तो कीं पर दिल की बात जुबां पर न ला सके। उनके दिलों ने नज़रों की जुबान से बहुत-सी बातें कर लीं। जवान धड़कनों पर पुंगरता प्यार एक-दूसरे की नज़रों के रास्ते दिल में उतर गया। उन्होंने प्यार की इस पहली और अमूल्य मुलाकात की यादों को दिलों की गहराइयों में कहीं छिपा लिया। यह छोटी-सी मुलाकात दोनों की ज़िन्दगी में फूल खिला गई।
गुरलाभ ने अब अबोहर के गवर्नमेंट कालेज में दाख़िला ले लिया। यह लड़के-लड़कियों का साझा कालेज था। गुरलाभ को पूरी उम्मीद थी कि सत्ती भी यहीं दाख़िला लेगी। वह कई दिन प्रतीक्षा करता रहा, पर सत्ती कहीं दिखाई न दी। वह सोचता था कि सत्ती के लिए तो यह कालेज यूँ भी बहुत नज़दीक है। शहर से बाहर यह कालेज अबोहर-हनुमानगढ़ सड़क के बिलकुल ऊपर था। यहाँ से करीब पाँच किलोमीटर जाकर ही रत्ताखेड़ा आ जाता था। लेकिन सत्ती इस कालेज में नहीं आई। गुरलाभ कुछ निराश-सा हो गया। कक्षाएँ शुरू हो गईं तो गुरलाभ ने सोचा कि सत्ती ने किसी दूसरे कालेज में दाख़िला न ले लिया हो। उसने अन्य दो-तीन छोटे-छोटे कालेज भी छान मारे, पर सत्ती न मिली। उसका मन और अधिक उदास हो गया। उसने इधर-उधर जहाँ कहीं से भी पता चल सकता था, पता किया, पर सत्ती का कोई पता न चला। सत्ती को खोजता गुरलाभ स्वयं गुम हो गया। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। उसका पढ़ाई में मन न लगता। उसका खेलों में जी न लगता। उसका किसी चीज में दिल न लगता। उसने कई बार रत्ताखेड़ा जाकर सत्ती के घर की तरफ चक्कर लगाए कि शायद कहीं से सत्ती का दीदार हो जाए। सत्ती वहाँ नहीं थी। सत्ती के बगैर उसका गाँव उजाड़-वीरान-सा प्रतीत हुआ। कई महीने गुजर गए, पर उसे सत्ती के बारे में कोई ख़बर न मिली। कई बार वह यूँ ही रेलवे-स्टेशन या बस-अड्डों पर जाकर घूमता रहता कि शायद कहीं सत्ती दिखाई दे जाए। वह जब भी गाँव आने-जाने के लिए बस पकड़ता तो एक-एक सीट पर निगाहें दौड़ाता। कई बार वह शहर में यूँ ही चक्कर लगाता रहता। वह शहर के एक कोने से आरंभ करता। एक गली में चलता वह गली के अन्त तक आस पास की दुकानों की तरफ गौर से देखता। फिर वहाँ से लौटते समय भी ऐसा ही करता। कहीं से लड़कियों का समूह आता दिखाई देता तो वह बड़े गौर से उनकी तरफ देखता। कई माह गुजर गए। मौसम बदलने लगे पर गुरलाभ की खोज पूरी न हुई। अब वह हर समय गमगीन-सा रहने लगा। शहर छान मारा। आसपास खोज लिया। सत्ती कहीं ऐसी अदृश्य हुई कि वह उसकी एक झलक पाने को तरस उठा।
फिर एक दिन वह बस में बैठा तो संयोग से सत्ती का बड़ा भाई करनबीर उसके साथ वाली सीट पर आ बैठा। सत्ती के परिवार के किसी सदस्य को अपने करीब बैठा पाकर उसे मानो एक चाव-सा महसूस हुआ। उसे आसपास का वातावरण अच्छा लगने लगा। उसने सोचा कि यह समय पुन: नहीं मिलेगा और साहस करके बोला, ''भाई साहब, आपका गाँव रत्ताखेड़ा है न ?''
''हाँ।'' करनबीर ने मुस्करा कर उसकी तरफ देखा, ''तू मुझे कैसे जानता है ?''
''जी, अमरगढ़ मेरी ननिहाल है। मैं आठवीं तक आपके गाँव में पढ़ा हूँ।''
''अच्छा-अच्छा, तू हमारे गाँव में पढ़ता रहा है। अब कहाँ पढ़ता है ?''
''जी, उसके बाद प्लस-टू मैंने अबोहर से पास की। अब गवर्नमेंट कालेज अबोहर में बी.ए. कर रहा हूँ।''
''वाह भाई वाह ! गवर्नमेंट कालेज की तो क्या बात है।'' करनबीर को अपने कालेज के दिन याद हो आए।
''भाई साहब, आठवीं कक्षा में शायद आपकी छोटी बहन भी पढ़ा करती थी।'' गुरलाभ डरते-डरते बोला।
''हाँ, सत्ती ने आठवीं गाँव से ही की थी। अब तो वह कालेजिएट हो गई है।''
''यहाँ किस कालेज में पढ़ती है ?'' शब्द उसके गले में से बमुश्किल बाहर निकले।
''नहीं-नहीं, वह यहाँ अबोहर में नहीं पढ़ती। उसे तो हमने सिधवां कालेज भेज दिया था। वहीं हाँस्टल में रहती है।''
गुरलाभ का कलेजा नीचे डूबता चला गया। उसके बाद उसे नहीं मालूम कि क्या-क्या बातें हुईं और सफ़र कैसे पूरा हुआ।
'वाह सत्ती वाह ! मैं तुझे यहाँ खोजता मर गया। तू चुपचाप दूर हॉस्टल में जा बैठी। वाह री किस्मत ! ऐसा ही होना था।'
सत्ती हालांकि नहीं मिली थी पर उसकी खोज समाप्त हो गई थी। अब उसे पता था कि सत्ती कहाँ है। उसे पता चल गया था कि सत्ती इस शहर में नहीं मिल सकती। सत्ती के रहते जिस अबोहर शहर से उसको बेइन्तहा मोह था, वही अबोहर अब उसे बिलकुल भी नहीं भाता था। हँसता-बसता शहर उसे सत्ती के बगैर उजाड़-सा लगता था। शहर की गलियाँ उसे सूनी-सूनी लगती थीं। रौनक भरे बाज़ार उसे काटने को आते थे। सत्ती को खोजते-खोजते उसने शहर का चप्पा-चप्पा छान मारा था। पर अब उसे शहर में चलते हुए ऐसा महसूस होता मानो उसके पैरों के नीचे अंगारे बिछे हों। वह यह शहर छोड़ देना चाहता था, यहाँ से कहीं दूर भाग जाना चाहता था। यारों के संग बहारें थीं, अब यहाँ क्या था। बी.ए. का एक साल उसने बड़ी मुश्किल से पूरा किया। जैसे-तैसे पास भी हो गया, पर अब उसका न तो पढ़ने को मन करता था, न ही यहाँ रहने को। आख़िर, एक दिन उसने अपना बैग कंधे पर रखा और लुधियाने वाली बस में चढ़ गया। बस ज्यों ही शहर से बाहर निकलकर शाह फकीर के टीले के पास पहुँची तो उसने गर्दन घुमाकर पीछे छूट गए शहर की ओर देखा। शहर को अलविदा कहा।
(जारी…)
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