बलि
हरमहिंदर चहल
(गतांक से आगे...)
चैप्टर- 18(शेष भाग)
अगले दिन अबोहर गंगानगर रोड पर शहर से बाहर आठ भइये मारे जा चुके थे। उनकी जिम्मेदारी ली थी - जीवन सिंह रंगरेटा ने।
पुलिस को अभी तक पिछले एक्शन के बारे में कुछ पता नहीं चला था और ऊपर से यह नया ग्रुप पैदा हो गया था।
पुलिस ने दिनरात एक कर रखा था। लेकिन खाड़कू ग्रुपों का अभी तक कोई अता-पता नहीं मिला था। ''चौबीस घंटों के अन्दर-अन्दर मुज़रिमों को पकड़ लिया जाएगा''- मंत्री जी का ऐलान। सवेरे-सवेरे ऊँची आवाज़ में अख़बार की सुर्खियाँ पढ़ता जैलदार सीढ़ियाँ चढ़कर चौबारे की ओर जा रहा था। उसने देखा कि गुरलाभ अभी भी सोया पड़ा था। जैलदार ने गुरलाभ को उठाते हुए अख़बार की सुर्खियों के बारे में बताया।
''तू उठकर खड़ा हो। ऐसे नहीं चलेगा। जल्दी तैयार हो कर नीचे आ जा। आज मंत्री जी ने अबोहर में आना है।'' जैलदार ने बांह पकड़कर गुरलाभ को खड़ा किया।
अबोहर के सभी जाने-माने लीडर रैस्ट हाउस में एकत्र हुए बैठे थे। पुलिस के अलावा बाकी अन्य सभी महकमों के अफ़सर मंत्री जी की प्रतीक्षा कर रहे थे। होम मिनिस्टर के अपने शहर में यह सब हो रहा था। मंत्री जी के लिए बड़ी शर्मिन्दगी की बात थी। मंत्री जी समय से ही आ गए थे। दिनभर लोगों की शिकायतें सुनते रहे। नेताओं से विचार-विमर्श करते रहे। पुलिस विभाग के अफ़सरों से बैठकें होती रहीं। मुख्य विषय था इस इलाके को खाड़कूवाद की आँधी से बचाना। पुलिस के बड़े अफ़सरों से विचार-विमर्श के बाद उन्होंने पुलिस महकमे में कुछ फेर-बदल भी किया। जैलदार और गुरलाभ मंत्री जी को उनकी कोठी में मिले। मंत्री जी ने बड़े गौर से गुरलाभ के चेहरे की तरफ देखा। फिर 'मिलते रहना' कहकर उन्हें विदा किया। पुलिस के फेर-बदल में जो सबसे खास नियुक्ति की गई थी, वह थी तेज-तर्रार एस.पी. रणदीप को अबोहर में लाना। पुलिस फाइलों में खाड़कूवाद से लड़ने वाले अफ़सरों में उसका नाम सबसे ऊपर था।
रणदीप की अबोहर में पोस्टिंग होने का पता गुरलाभ को घर पहुँचने के बाद लगा। उसके मामा जैलदार को उन दोनों की पुरानी दोस्ती की कोई जानकारी नहीं थी। गुरलाभ रात में चौबारे में अकेला पड़ा था। उसे नींद नहीं आ रही थी। पहली बार वह अपने बारे में सोच रहा था। कहाँ से चला था और कहाँ पहुँच गया। अब तक उसने जो कुछ भी किया, शुगल के तौर पर ही किया था। वह लुधियाना के कालेज में दाख़िल होने से लेकर बाद के दिनों को याद करता विचारों में गुम हुआ पड़ा था। कितने मारे, कितने लूटे, कितने अगवा किए, कोई गिनती नहीं थी। जब तक लुधियाना में रहा, वह पूरी अति किए रहा। इसमें से हासिल क्या किया, कुछ नहीं। जो रुपया-पैसा लूटा, सब उड़ा दिया। अब यहाँ आकर भी वही सबकुछ शुरू कर लिया, पर इसमें से मिलता क्या था ? कुछ भी नहीं। खाड़कू बनकर लोगों को लूटने के, लोगों को मारने के और अन्य शौक तो पूरे कर लिए, पर खटा-कमाया कुछ भी नहीं। अपने संगी-साथियों को पकड़वा कर लुधियाने का चैप्टर तो बन्द कर दिया, पर उसका सारा लाभ उठा गया रणदीप। उसी की वजह से आज रणदीप इंस्पैक्टर से एस.पी. के पद पर पहुँच गया था। गुरलाभ देख रहा था कि लहर समाप्ति की ओर जा रही थी। ऐसे समय में पुलिस वालों का क्या भरोसा कि दूसरों के साथ-साथ उसे भी गाड़ी चढ़ा दें। फिर रणदीप तो गुरलाभ के सभी भेद जानता था। अब उसे अपना भविष्य सुरक्षित करना चाहिए। अपने भविष्य को लेकर उसने कई योजनाएँ बनाईं। इसके लिए उसे मंत्री जी की मदद की ज़रूरत पड़नी थी। सो, एक काम तो यह था कि वह मंत्री जी के सम्पर्क में रहे। दूसरी बात, रणदीप को अपने ऊपर हावी न होने दे। और अन्तिम बात सोची उसने अपने रुपये-पैसे के बारे में। उसका बड़ा बहनोई कैनेडा में रहता था।
कैनेडा बहनोई से फोन पर बात की। उससे कहा कि वह उसके लिए वहाँ एक अलग खाता खुलवा दे। फिर जैसे जैसे वह हवाले के माध्यम से रुपया-पैसा एक्सचेंज करे, वह उसे उधर डालर के रूप में उसके खाते में जमा करवाता रहे। बहनोई ने उसे इस काम को करने का भरोसा दे दिया। उसका यह बहनोई और उसकी बहन दोनों गुरलाभ के स्वभाव से परिचित थे। डरते थे कि कहीं वह गलत राह ही न पड़ जाए। इसलिए अच्छा ही है अगर वह कैनेडा आ जाए। पैसों का प्रबंध होने के बाद उसने अगली योजनाओं के विषय में सोचा। सबसे पहले तो यह एरिया छोड़ दे। अपने पुख्ता प्रबंध करने के बाद ही रणदीप के सामने जाए। उसका विचार था कि दो-एक और बड़े एक्शन करके रणदीप को उलझा दे। फिर स्वयं किसी दूसरे इलाके में निकल जाए। ऐसी योजनाएँ बनाते बनाते वह देर रात सो पाया। सवेरे दिन चढ़ते तक सोया रहा। सुबह भी उसके मामा ने ही जगाया। उसके मुँह की तरफ देखकर मामा हैरान हो रहा था।
''कैसे ? तू रात में सोया नहीं ?''
''नहीं, सोया तो था। बस, यूँ ही शरीर कुछ ढीला-सा है।''
''ऐसी क्या बात हो गई ?''
''बात तो कोई नहीं मामा जी। एक आपको बात बतानी है। जिस नये एस.पी. रणदीप का कल मंत्री जी जिक्र कर रहे थे, वह मेरा परिचित है।'' गुरलाभ ने बात बदली।
''अच्छा फिर ?''
''फिर क्या। पुलिस में जाने के बाद वह बड़ा ही कमीना बन गया। सब-इंस्पैक्टर भर्ती हुआ था। थोड़े से समय में देख लो, एस.पी. बना बैठा है। मेरा मतलब है, अब वह लिहाज-विहाज कुछ नहीं करता। बस, हर किसी को इस्तेमाल करना चाहता है।''
जैलदार चुपचाप सुनता रहा।
''मैं नहीं चाहता, मुझे वह यहाँ हर वक्त अपने संग खींचता घूमे। और फिर, पुलिस के संग घूमता आदमी तो यूँ ही बुरा लगता है। मुझे तो वैसे भी गाँव की तरफ जाना ही है। बस, मेरे बाद यदि वह यहाँ आए तो कह देना कि गुरलाभ तो कोई साल भर से इधर आया ही नहीं।''
''वह तो कोई बात नहीं। मैं टाल दूँगा उसको। अगर कोई बात है तो बता, हम अभी चलते हैं मंत्री जी के पास।'' उसके मामा को उसे लेकर हस समय धुकधुक लगी रहती थी।
''नहीं, बात कोई नहीं। बस मैं इस पुलिस वाले को पसन्द नहीं करता।''
वे बातें कर ही रहे थे कि नीचे से नौकर ने आकर सूचना दी कि बाहर पुलिस आई है। गुरलाभ ने तुरन्त जैलदार को नीचे भेज दिया। जब वह नीचे पहुँचा, पुलिस अफ़सर बैठक में विराजमान था। जैलदार के करीब आते ही पुलिस अफ़सर ने बड़े अदब से नमस्कार किया।
''मैं नया एस.पी. ओपरेशन रणदीप सिंह हूँ जी। गुरलाभ मेरा जिगरी दोस्त है। मैंने सोचा, उसे मिल ही आऊँ।'' रणदीप मासूस-सा बनकर जैलदार से मुखातिब हुआ।
''वह तो जब से लुधियाना में रहने लगा है, इधर कम ही आता है।''
''यहाँ बिलकुल ही नहीं आया।'' रणदीप का पुलिसिया दिमाग बोला।
''नहीं, यहाँ तो पिछले छह-सात महीनों से बिलकुल ही नहीं आया। अगर कहते हो तो गाँव से बुला लेते हैं या फिर मैं गाँव का पता दे देता हूँ, वहाँ आदमी भेजकर बुला लो।'' जैलदार का सियासी दिमाग बोला।
''नहीं, काम तो कुछ नहीं। मैंने सोचा, पुराने दोस्त से मिल आऊँ।'' उठता हुआ रणदीप बोला।
''तुम काका जी, कोई चाय-पानी तो पीते।''
''नहीं जी, अभी जल्दी है। फिर कभी सही। अच्छा, गुरलाभ आया तो उसे मेरे बारे में बता देना।'' रणदीप की गाड़ियों का काफ़िला चला गया।
जैलदार गहरी सोच-विचार में डूबा धीरे-धीरे चौबारे की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। एस.पी. आपरेशन का खुद चलकर आना और गुरलाभ का उससे न मिलना, कोई बात तो अवश्य थी, पर यह साला कपूत कहाँ कुछ बताता है। कहीं कोई और ही चाँद न चढ़ा दे। चौबारे में जाकर जैलदार ने बताया कि तेरा वो एस.पी. आया था। आगे जैलदार कुछ पूछना चाहता था। लेकिन यह सोचकर खामोश रह गया कि यह कहाँ कोई भेद देने वाला है।
अँधेरा होने पर गुरलाभ कार लेकर दूर वाले खेत की ओर निकला। गणेश उसका इंतज़ार कर रहा था। नये लड़के - गोरा और जीवन भी उनके रंग में ढल चुके थे। अपने अड्डे पर बैठे वे भी प्रतीक्षा कर रहे थे।
''आज मैं किसी कारण आ नहीं सका। कल देखेंगे। आ जा, उसके बाद का प्लैन समझ ले।'' चबूतरे पर कुर्सी डाल कर बैठा गुरलाभ धीरे-धीरे शराब के घूंट भर रहा था। अगले दिन दोपहर ढलने के बाद गुरलाभ ने कार निकाली। वह दूसरे राह से होता हुआ रसूलपुर कोठी पहुँचा। उसकी हिदायत के अनुसार एक काम तो गणेश ने सवेरे ही कर लिया था। वह पंजाब के बार्डर से पार पड़ते राजस्थान के छोटे-से शहर मटीली से जीप चोरी करके ले आया था। राजस्थान से चोरी करने का कारण था कि उधर की पुलिस इतनी जल्दी इधर नहीं आने वाली थी। जीप उसने एक खाली पड़े क्वार्टर में खड़ी की हुई थी। यहाँ लाने के बाद उसने उसकी नंबर प्लेटों के साथ-साथ अन्य कई चीज़ें बदलकर उस जीप को नहरी विभाग की जीप बना दिया था। नंबर प्लेटों के ऊपर लिखा हुआ था - नहरी विभाग, पंजाब, फिरोजपुर सर्किल। गुरलाभ उसका काम देखकर खुश हो गया।
लक्खेवाली मंडी में मारे पाँच दुकानदारों वाली वारदात के कारण अगले दिन हरतरफ हाहाकार मची हुई थी। एस.पी. रणदीप को कमांडो फोर्स के लैटर पैड पर चिट्ठी मिली जिस पर लिखा हुआ था, ''तुम्हारा स्वागत है एस.पी. रणदीप। यह तो शुरूआत है। तूने मेरे साथियों को धोखे से पकड़ा था। याद है न, लुधियाना के रेड हाउस का कारनामा। मैं तेरे साथ सरेआम मुकाबला करूँगा।- लेफ्टिनेंट जनरल 'बाबा बसंत'।'' रणदीप जानता था कि रेड हाउस में से बाबा बसंत नाम का एक लड़का बच निकला था। रणदीप को यकीन हो गया कि ये सारी कार्रवाइयाँ बाबा बसंत ही कर रहा था। वह अपने ढंग से बाबा बसंत के पुराने तौर-तरीके देखते हुए उसे खोजने लगा। उधर रात में गुरलाभ घर पहुँचा। उसने मामा को बताया कि वह सवेरे ही लुधियाना की तरफ निकल जाएगा। आधी रात के बाद ही वह पैदल खेत की ओर चल पड़ा। उधर गणेश और उसके दो साथी बिलकुल तैयार बैठे थे। जीप में गुप्त स्थान बनाकर हथियार छिपा दिए थे। गणेश ने ड्राइवर की वर्दी पहन रखी थी। गोरा और जीवन वेलदारों की वर्दी पहने बैठे थे। जीप में लेवल करने का सारा सामान रखा हुआ था। गुरलाभ देखने में एस.डी.ओ. लगता था। नई जगह गणेश के बताने पर चुनी गई थी। चौकीदार लगने से पहले वह उस कोठी में कच्चा वेलदार रहा था। बियाबान के बीच यह नहरी कोठी गंग कैनाल के किनारे पर थी। सादिक से आगे एक लिंक रोड पर आठेक किलोमीटर जाकर एक गाँव आता था- सोहणके। इसी गाँव के नाम पर कोठी का नाम था- 'नहरी कोठी, सोहणके।' गाँव से कच्चे रास्ते दो किलोमीटर जाना पड़ता था।
दिन चढ़ते ही गणेश ने जीप नहर की पटरी पर चढ़ा ली। गुरलाभ उसके बराबर बैठा था। गोरा और जीवन नहर महकमे का कुछ सामान बीच में रखकर पीछे बैठे हुए थे। थोड़ी दूर आगे की तरफ जाकर डिफेंस रोड पर से होते हुए जीप लम्बी डिस्ट्रीब्यूटरी की तरफ हो गई। आगे चलकर लम्बी डिस्ट्रीब्यूटरी का हैड आ गया। राजस्थान कनाल और सरहिंद फीडर सामने थे। दोनों नहरें हरीके हैडवर्क्स से निकलती थीं। पंजाब में से साथ-साथ चलती ये आगे चलकर हरियाणा की ओर चली जाती थीं। दोनों नहरों के बीचवाली पटरी सिर्फ़ नहर विभाग के अफ़सरों के वाहनों के लिए थी। लम्बी हैड के पास बीचवाली पटरी पर जाने के लिए तथा पुल के ऊपर हमेशा एक गेट लगा रहता था। जैसे ही गणेश ने पुल के ऊपर ले जाकर जीप रोकी तो साथ वाली कोठरी में से हैड वर्क्स का चौकीदार दौड़ा हुआ आया। आते ही उसने गुरलाभ को सलूट ठोका। उसने दूर से ही फिरोजपुर सर्किल की जीप देख ली थी। गणेश को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी। चौकीदार ने गेट का ताला खोला, जीप बीचवाली पटरी पर होकर ऊपर की ओर चल पड़ी। ''अब कहीं कोई रुकावट नहीं जी।'' गणेश ने गुरलाभ को सुनाते हुए कहा। गुरलाभ ठाठा बांधे चुपचाप बैठा रहा। दोपहर होते तक जीप सोहणके गाँव पहुँच गई। आगे कच्ची राह थी। लगभग डेढ़ किलोमीटर कच्चे राह पर चलकर आगे नहर का पुल आ गया और दूसरी तरफ 'सोहणके नहरी रेस्ट हाउस' था। शाम तक उन्होंने वहाँ पक्का अड्डा जमा लिया। यहाँ रहने का हर प्रबंध कर लिया।
अगले दिन गुरलाभ फिरोजपुर चला गया। बाकियों को वह हिदायत देकर गया था कि एक आदमी हर वक्त पहरे पर रहे। यह भी कि कोठी में से कोई बाहर न निकले। गुरलाभ दिन भर फिरोजपुर के कालेजों में घूमता रहा। जो कुछ वह तलाश रहा था, वह उसे एक कालेज में मिल ही गया। वह था उसका कोई पुराना दोस्त। नवदीप उसका अबोहर कालेज के समय का मित्र था जो अब फिरोजपुर में पढ़ रहा था। बाहर किराये पर कमरा लेकर रहता था। नवदीप भी गुरलाभ की भाँति दबंग स्वभाव का ऐशी आदमी था। दो दिन के साथ में गुरलाभ ने उसे अच्छी तरह टोह लिया। तीसरे दिन गुरलाभ नवदीप को संग लेकर रात के अँधेरे में सोहणके कोठी लौटा।
''काका जी, हम तो फिक्र में मरे पड़े थे। आपने इतने दिन लगा दिए।'' गणेश दौड़कर गुरलाभ के पास आया।
''तुम अपने काम से मतलब रखा करो। तुम्हें जो हुक्म दिया जाता है, उसी के मुताबिक अमल किया करो। आलतू-फालतू चिंताओं को छोड़ दो।'' गुरलाभ ने गणेश को डांट दिया।
उसके पश्चात् गुरलाभ और नवदीप ने रैस्ट हाउस में अपनी महफिल लगा ली। गणेश और उसके साथियों ने किसी क्वार्टर में खाने-पीने का प्रोग्राम चला लिया। नवदीप वहाँ बैठा गुरलाभ के विषय में काफी कुछ समझ गया था। उसके कालेज के कई लड़के भी इसी राह पर निकल गए थे। नवदीप तो ऐश करने वाला लड़का था। फिरोजपुर से चलते हुए उसने नहीं सोचा था कि गुरलाभ किसी बियाबान जगह पर अड्डा लगाये बैठा होगा। वह तो इधर-उधर घूमने की मंशा से ही गुरलाभ के मोटरसाइकिल के पीछे बैठ गया था। पर गुरलाभ को फिरोजपुर शहर में रहते दोस्तों की ज़रूरत थी। इधर-उधर की बातें करते हुए थोड़ी देर बाद ही गुरलाभ असली मुद्दे पर आ गया।
बातचीत करते और पैग लगाते हुए वे दो घंटे बैठे रहे। नशे की लोर में नवदीप के दिल में से भी डर उड़ चुका था। काफी देर बाद रोटी खाकर वे रेस्ट हाउस की छत पर सो गए। अगले दिन सवेरे ही गुरलाभ ने नवदीप से उसके कमरे की चाबी ली। उसे बस अड्डे से बस चढ़ा आया। वापस लौट कर उसने नहरी मकहमे वाली जीप निकाली। साथियों को संग बिठाकर फिरोजपुर शहर में आ गया। नवदीप के कमरे पर जाकर उसने आसपास के हालात का जायजा लिया। एक कार का प्रबंध उसने पहले ही किया हुआ था। शाम होने तक वह इधर-उधर घूमते हुए योजनाएँ बनाता रहा। फिर शाम हो जाने पर उसने साथियों को कार में बिठाया और दानामंडी की ओर निकल गया। धीरे-धीरे कार चलाते हुए उसने एक दुकान के आगे कार रोक ली। दुकान का मालिक आढ़तिया दुकान से बाहर ही आ रहा था जब गणेश कार से उतर कर उसके नज़दीक पहुँचा।
''सेठ साहिब, आपसे इंस्पेक्टर साहिब मिलना चाहते हैं।''
''हैं ! कहाँ ?'' हैरान सा होता सेठ कार की तरफ चल पड़ा। उसने सोचा शायद मार्कफैड का इंस्पेक्टर था। जैसे ही वह कार के करीब आया, पीछे से गणेश ने उसकी बगल में पिस्तौल लगा दिया। थर्र-थर्र कांपता सेठ पिछली सीट पर गिर पड़ा। उसके दोनों तरफ दो जने बैठ गए। गणेश अगली सीट पर आ गया। सिर पर मौत देखकर सेठ की जबान का लकवा मार गया। शहर से थोड़ा बाहर निकलकर सेठ की आँखों पर पट्टी बांध दी गई। एक स्थान पर कार रोककर गुरलाभ ने गणेश को एक तरफ बुलाया।
''देखो, सेठ को कुछ नहीं होना चाहिए। इसकी पूरी सेवा करना। कमरे से बाहर नहीं निकलने देना। जब तक मैं न आऊँ, छोड़ना नहीं।'' इतना कह कर गुरलाभ शहर को लौट गया। गणेश ने कार का स्टेयरिंग संभाल लिया। रात के अँधेरे में सेठ को कुछ पता नहीं लग रहा था कि वे उसे किधर ले जा रहे हैं। घंटे भर बाद, कच्चे-पक्के राहों से होती हुई कार सोहणके रेस्ट हाउस पहुँच गई। दो जनों ने सेठ को बांहों से पकड़कर बाहर निकाला। फिर पहले से तैयार किए कमरे में ले जाकर उसकी आँखों पर से पट्टी उतार दी।
''सेठ साहिब, आप हमें अपना नौकर समझो। जिस चीज की ज़रूरत हो, हमें बता दो। यहाँ से भागने की या ऐसी कोई बात न करना। बस, दो दिन की बात है और उसके बाद आपको ठीकठाक आपके घर छोड़ आएँगे।'' गणेश नम्रता के साथ बोला।
''पर यह तो पता लगे कि मुझे उठाया क्यों गया है। मेरा कोई कसूर...'' सेठ का चेहरा सफेद हुआ पड़ा था।
''यह तो जी हमारे बाबा जी को मालूम है। हम तो सेवादार हैं।'' इतना कहते हुए गणेश ने कमरा बन्द कर दिया। एक व्यक्ति बाहर पहरे पर बैठ गया।
उधर सेठ के बेटे ने दुकान में बैठे हुए अन्दर से सेठ को कार में बैठते देख लिया था। उसे कुछ गड़बड़ लगी। वह शीघ्रता से जूता पहनते हुए बाहर की ओर भागा तो कार जा चुकी थी। शाम के घुसमुसे में उसे सिर्फ़ कार की पिछली लाल बत्तियाँ ही दिखाई दी थीं। पीछे मुड़ते समय उसे सड़क पर गिरा पड़ा रुक्का दिखाई दिया। उसने उसे उठा कर जेब में डाल लिया। अन्दर जाकर एक तरफ खड़े होकर उसने आहिस्ता से रुक्का खोला - ''सेठ को अगवा किया जाता है। पुलिस को बताओगे तो सेठ की लाश मिलेगी। तुमसे कल कंटेक्ट किया जाएगा... कमांडो फोर्स।'' लड़के के होश उड़ गए। पुलिस के पास तो जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। लड़के ने अभी किसी को भी बताना उचित न समझा। वह ऊपर चौबारे में जाकर बैठ गया। अँधेरे में बैठा वह कोई न कोई रास्ता खोजने की कोशिश कर रहा था। फिर उसे याद आया कि पिछले महीने उसके मुहल्ले में खाड़कुओं द्वारा की गई अगवा की घटना, उसके इलाके के एक नेता पिरथी सिंह ने सुलझाई थी। सेठ का लड़का पिरथी सिंह के पास जा पहुँचा। उसको कमांडो फोर्स द्वारा फेंकी गई चिट्ठी और सेठ के अगवा होने के बारे में सब कुछ बताते हुए मदद की मांग की। पिरथी सिंह चिट्ठी को ध्यान से देखता रहा। वह समझ गया था कि यह कोई नया ग्रुप था।
पिरथी सिंह ने लड़के को कुछ समय इंतज़ार करने को कहकर लौटा दिया।
पिरथी सिंह फोन की प्रतीक्षा करने लगा। इस काम का वह मशहूर दलाल था। वह जानता था कि ग्रुप बेशक नया ही प्रतीत होता था, पर कंटेक्ट वह उसी को करेगा।
उधर गुरलाभ ने भी पूरा होमवर्क करके ही एक्शन किया था। रात के ग्यारह बजे के करीब उसने पिरथी सिंह के घर फोन किया। फोन उठाते ही जत्थेदार पिरथी सिंह समझ गया कि फोन उसी का ही था।
''अपना कोड वर्ड बताओ।'' पिरथी सिंह तुरन्त बोला।
''हैं जी ! कोड वर्ड !''
''हाँ, कोड वर्ड।''
''कोर्ड वर्ड तो... जी नये ही हैं।''
''चल, ठीक है। पर कितने डिब्बे ?''
''जी पचास।''
''बहुत ज्यादा हैं। तुम्हारी फसल के मुताबिक बीस मिलेंगे।''
''ये तो बहुत कम हैं।''
''मैं तो एक ही बात किया करता हूँ, आर या पार। अगर मंजूर है तो बताओ, नहीं तो फोन काटो।''
''ठीक है।''
''कल को तीन बजे मेरे शैलर पर मिलना। तुम्हारा काम वहाँ हो जाएगा। मेरा काम दिन छिपने से पहले होना चाहिए।''
''ठीक है जी।''
करीब बारह बजे सेठ का लड़का हताश चेहरा लिए पिरथी सिंह के शैलर पर पैसे पहुँचा आया। पिरथी सिंह ने उसे यकीन दिलाया कि दिन छिपते सेठ घर पहुँच जाएगा। ठीक तीन बजे गुरलाभ पिरथी सिंह के शैलर पर पहुँच गया। पिरथी सिंह ने उसे सिर से लेकर पांव तक तोला। गुरलाभ उसे इस काम में अनुभवी लगा। वह पिछला दरवाजा खोलकर गुरलाभ को अपने प्राइवेट कमरे में ले गया।
''वो सामने पड़े हैं बीस लाख। इसमें चौथा हिस्सा मेरा। चौथा पुलिस का। आधा तेरा। किसी का डर नहीं, लूटो मौजें।''
''जी, पुलिस का भी ?''
''इसकी तुम्हें फिक्र करने की ज़रूरत नहीं। तुम्हें हर तरफ से बचाकर रखना भी मेरा काम है। मेरे होते पुलिस तुम्हें नहीं बुलाने वाली।''
''अब हम बिजनेस पार्टनर बन गए हैं, चाय का कप पीकर जाना।''
उसके बाद दोनों चाय की चुस्कियाँ भरते छोटी-छोटी बातें करते रहे।
पिरथी सिंह ने चौथा हिस्सा अपनी तिजौरी में रख लिया। चौथा हिस्सा लिफाफे में डालकर एस.पी. के घर भेज दिया। उधर गुरलाभ ने मोटरसाइकिल निकाला और सीधा सोहणके की ओर हो लिया। वहाँ पहुँचकर उसने सेठ को कार में बिठाते हुए गणेश को शहर की तरफ भेज दिया। सेठ की आँखें बांधी हुई थीं। वह पिछली सीट पर पड़ा था। शहर से बाहर एक उजाड़-सी जगह पर गणेश ने कार रोकी। फिर उसने गोरे की मदद से सेठ को बाहर निकालकर सड़क से नीचे खतानों में बिठा दिया।
गुरलाभ खुश था। नई जगह पर उसका पहला एक्शन कामयाब रहा था। उसे आगे के लिए पिरथी सिंह जैसे बढ़िया चैनल मिल गये थे। उसने तीनों लड़कों को बुलाया। पचास-पचास हजार हरेक को दिया। गणेश, गोरा और जीवन, तीनों बहुत खुश थे। इस तरह बैठे-बिठाये पैसे मिलते रहें, यही कुछ तो वह चाहते थे।
(जारी…)
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Sunday, August 22, 2010
धारावाहिक उपन्यास
Sunday, August 15, 2010
धारावाहिक उपन्यास
बलि
हरमहिंदर चहल
(गतांक से आगे...)
चैप्टर- 18(प्रथम भाग)
लुधियाने से ट्रैक्टर लेकर चला गुरलाभ रात को अबोहर पहुँच गया। रास्ता ही लम्बा था। वह स्वयं भी वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते रात कर देनी चाहता था। अबोहर से बाहर ही बाहर वह डबवाली रोड पर पड़ गया। आगे नहर के पुल पर पहुँच कर वह दायें हाथ गाँव की ओर मुड़ने के स्थान पर बायें हाथ नहर की पटरी पर हो लिया। खतरनाक सामान लेकर वह आधी रात अपनी ननिहाल वाले घर कैसे जा सकता था। करीब डेढ़ किलोमीटर जाकर उनका दूर वाला खेत आ गया। इस खेत का एक हिस्सा नहर के साथ लगता था। खेत से आगे ही नहरी कोठी रसूलपुर रह जाती थी। यहाँ चौकीदार को छोड़कर अन्य किसी की रिहाइश नहीं थी। पुराना रैस्ट हाउस और कुछ क्वार्टर खाली पड़े रहते थे। चौकीदार भी नई उम्र का लड़का था। इस चौकीदार गणेश से पहले उसका बाप राम लाल यहाँ का चौकीदार था। राम लाल ने सारी उम्र इस रैस्ट हाउस की चौकीदारी करते ही गुजारी थी। राम लाल के समय भी यहाँ दूसरा कोई नहीं रहता था। जैलदारों का खेत नज़दीक होने के कारण उसकी सारी उम्र उनके संग घूमते ही गुजर गई थी। उसका इकलौता बेटा गणेश दसवीं की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर निठल्ला-सा इधर-उधर घूमने लगा तो उसने गणेश को कहीं दूर कच्चे बेलदार के तौर पर रखवा दिया था। फिर राम लाल की मृत्यु के बाद गणेश को पिता के स्थान पर चौकीदारी की नौकरी मिल गई थी। बाप की तरह वह भी सारा दिन जैलदारों के खेत में ही रहता था। हमउम्र होने के कारण गुरलाभ से वह अधिक घुलामिला था। वह गुरलाभ का वफ़ादार नौकर था। गुरलाभ के सभी उल्टे-सीधे काम वही करता था। आधी रात के करीब रैस्ट हाउस के पास जाकर जब गुरलाभ ने हॉर्न बजाया तो गणेश सिर पर साफा लपेटते हुए दौड़ा आया। ट्रैक्टर की तेज लाइट के कारण वह अँधेरे में कुछ पहचान नहीं पाया। फिर जैसे ही गुरलाभ नीचे उतरकर उसके पास आया तो वह उसे पहचानते हुए उसके पैरों की ओर झुका।
''काका जी, सासरीकाल।''
''कैसे, अकेला ही है ?'' गुरलाभ धीमी आवाज़ में बोला।
''हाँ जी, और यहाँ किसने होना है।'' गणेश गुरलाभ के इस तरह पूछने का कारण कुछ और ही समझा था। 'पर काका जी, ट्रैक्टर पर क्यों हैं ? पहले तो कार पर आते थे।' उसने मन में सोचा। ''काका जी, करूँ कोई खाने-पीने का इंतज़ाम ?''
''वह सब छोड़। मुझे यह बता कि रैस्ट हाउस के कमरों में क्या पड़ा है ?''
''दो कमरे खाली हैं। एक में सीमेंट के खाली बोरे पड़े हैं। कहो तो कमरे में बैड लगा दूँ ?'' गणेश अभी भी अपनी सोच के मुताबिक ही बोल रहा था।
''नहीं, बैड-शैड रहने दे। इधर आकर बैटरी जला।''
बैटरी की रोशनी में पेचकस और चाबियों की मदद से गुरलाभ नट बोल्ट खोलने लगा। सब कुछ तैयार करके उसने फिर गणेश को संग लिया। रैस्ट हाउस का खाली बोरों वाला कमरा खुलवाया। उसने गणेश को कुछ बताया, फिर बोरों के ढेर को इधर उधर करके बीच में खाली जगह बनाई। गणेश को संग लेकर पोलीथीन के बैग अन्दर ढोने लगा। राइफ़िलों और पैसों वाले बैग बीच में रखकर उनके ऊपर फिर खाली बोरे चिन दिए।
कमरे में ताला लगाकर गुरलाभ ट्रैक्टर को मोड़कर खेत वाले कोठे की तरफ ले गया। ट्रैक्टर का ड्राइवर पहले ही खेत में पहुँचा बैठा था। उसे गुरलाभ ने रैस्ट हाउस से काफी पीछे उतार कर खेत की तरफ भेज दिया था। उससे आगे ट्रैक्टर को स्वयं चला कर ले गया था। उसने ड्राइवर को कुछ धीमे से समझाया, दिन चढ़ने पर गाँव जाने का कहकर वह सो गया।
सवेरे ही ड्राइवर को चला आता देख बड़े जैलदार का माथा ठनका। वह तो कल से दुखी हुआ घूमता था। ज्यों-ज्यों ड्राइवर करीब आता गया, जैलदार के माथे की त्यौरी गहरी होती चली गई। ड्राइवर ने 'सासरीकाल सरदार जी' कहा पर जैलदार चुपचाप उसे घूरता रहा।
''काका जी ने कार मंगवाई है।'' ड्राइवर डरते-डरते बोला।
''कहाँ है वह ?''
''जी, शहर में है।''
''कहाँ कहा ?'' जैलदार ड्राइवर को मारने को दौड़ा।
''शहर से रात को खेत में आ गए थे। अब तो खेत में है।'' ड्राइवर ज्यादा देर झूठ न बोल सका।
''चल, कार निकाल।''
ड्राइवर कार निकाल लाया।
''ओए, पीछे मर। साला बैठा है नंबरदार बना।'' ड्राइवर की सीट पर बैठे ड्राइवर से जैलदार गुस्से में बोला। ड्राइवर जल्दी से उठकर पिछली सीट पर बैठ गया। जैलदार ने ड्राइवर की सीट पर बैठते ही कार दौड़ा ली। गाँव से सड़क पर चढ़कर, आगे साथ ही नहर की पटरी पर हो लिया।
''तुझे दस दिन हो गए मरे को... इतने दिन वहाँ क्या भैण...।''
''जी, काका जी ने रोक लिया था।''
''साला काका जी का।'' जैलदार अपना गुस्सा किसी और पर निकाल रहा था। जब वे खेत पर पहुँचे, गुरलाभ सोया पड़ा था। बौखलाया-सा जैलदार कुछ सोच कर चुप हो गया।
''इसे उठा कर चाय-पानी पिला। कह गाँव चलना है।'' इतना कहकर जैलदार एक तरफ खड़े ट्रैक्टर की ओर चल दिया। वह काफी देर ट्रैक्टर को और नई बनी कंबाईन को निहारता रहा। फिर आगे खेत की तरफ बढ़ गया। जब तक जैलदार मुड़कर आया, गुरलाभ तैयार हुआ बैठा था। वह जैलदार मामा को करीब होकर मिला। जैलदार ने उसकी तरफ टेढ़ी नज़र से झांका। ''चलो, घर चलें।'' जैलदार ने कार स्टार्ट कर ली। गुरलाभ बराबर में बैठ गया। ड्राइवर पीछे बैठ गया।
''कैसे मामा जी, पारा कुछ ज्यादा ही हाई है।'' गुरलाभ ने मामा को प्यार से बुलाया।
''क्यों, तुझे नहीं पता ?'' प्रत्युत्तर में जैलदार कुछ कहने ही लगा था कि उसने पीछे बैठे ड्राइवर की ओर देखा।
''तू नीचे उतर ओए कुत्ते की औलाद। साला बैठा है बराबर लाट साहब बना।'' कार रोकते हुए जैलदार ड्राइवर को गुस्से में बोला। ड्राइवर कार से उतर कर ट्रैक्टर की ओर चल पड़ा।
''अब बताओ मामा जी। कैसे सवेरे-सवेरे चढ़ाई की ?'' गुरलाभ ने फिर मामा के साथ प्रेमभरी वार्तालाप करनी चाही। जैलदार चुपचाप कार चलाता रहा। जैलदार गुरलाभ को ऊपर चौबारे में ले गया।
''यह क्या चल रहा है ?'' जैलदार ने गुरलाभ की आँखों में आँखें गड़ाकर पूछा।
''क्या कह रहे हो ? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा।''
''तू लुधियाना में अब तक क्या करता था ?''
''पेपर दे रहा था, और मैंने क्या करना था। पिछले दिनों छुट्टियों में कुछ देर दोस्तों के पास रहा और अब खाली हूँ।''
''कल यहाँ सी.आई.डी. का इंस्पेक्टर आया था।'' यह कहकर जैलदार चुप हो गया। उसने देखा कि गुरलाभ के चेहरे पर कुछ तनाव-सा आ रहा था।
''क्या कहता था इंस्पेक्टर ?'' अपने आप को सहज रखते हुए गुरलाभ ने पूछा।
''यह जो नई आँधी चल रही है, तेरा इससे क्या लेना-देना है, तू खुद ही बता दे।''
''मामा जी, मुझे सीधी बात बताओ। इंस्पेक्टर क्या कहकर गया है ?''
''उसका कहना था कि तू इन खाड़कुओं का मददगार है। अभी तो वह इतना ही कहकर गया है कि अपने लड़के को संभालो। कहीं किसी गलत राह पर न चल दे।'' जैलदार का गुस्सा ठंडा होता जा रहा था। वह एक तरफ कुर्सी पर बैठ गया। तब तक गुरलाभ भी संभल गया था। उसे हैरानी इस बात की थी कि सी.आई.डी. वाला उसके गाँव जाने की बजाय यहाँ क्यों आया। फिर इतनी जल्दी ! उसके पहुँचने से पहले ही पहुँच गया। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। असल में वह पुलिसवाला लुधियाना से रणदीप ने अपने तौर पर भेजा था। वह गुरलाभ को अपने हाथ में से नहीं निकलने देना चाहता था। उसे गुरलाभ की राजनीतिक पहुँच की जानकारी थी। वह जानता था कि सीधे तौर पर तो वह गुरलाभ का बाल भी बांका नहीं कर सकता। रणदीप को यह नहीं पता था कि अभी तो गुरलाभ को स्वयं ही इस ओर से हटने की उतावली नहीं थी। अभी तो वह खुद ही इस लहर का और आनन्द लूटना चाहता था।
''मामा जी, बात यह है कि हमारे कालेज के कितने ही लड़के इस लहर में शामिल हो गए। कुछ मारे गए। कुछ अभी भी सक्रिय हैं। कारनामे किए जाते हैं। और बहुत से नये लड़के इस लहर में शामिल होते जा रहे हैं। यह सी.आई.डी. वाले तो कालेज के हर लड़के के पीछे लगे हुए हैं। पूछताछ करके खुद ही लौट जाते हैं। और फिर हमें किस बात का डर है जब हमारा किसी से कोई लेना-देना ही नहीं।'' गुरलाभ की प्रभावशाली बात से जैलदार ने कुछ राहत की साँस ली।
''गुरलाभ, तू नहीं जानता, जब गवर्नमेंट ऐसी लहरों को कुचलने पर आती है न, फिर ये खास सिफ़ारिशें भी काम नहीं आतीं। ये लीडर तो खड़े-खड़े ही आँखें फेर लेते हैं।'' अपनी तरफ से जैलदार गुरलाभ को यह समझा रहा था कि कहीं मंत्री जी की फूंक में आकर आग में हाथ न डाल बैठना।
''न हमें गलत काम करना है, न ही हमें सिफारिशों की ज़रूरत है। आप तो यूँ ही घबरा रहे हो।'' गुरलाभ हर तरीके से मामा की तसल्ली करवाना चाहता था। जैलदार शांत बैठा कुछ सोच रहा था। वह गुरलाभ के चंचल स्वभाव से परिचित था। 'आगे इस पर निगाह रखनी पड़ेगी।' वह मन ही मन सोच रहा था।
''अब तो फिर छुट्टियाँ हैं। अब तो मुझे रहना ही आपके पास है।'' गुरलाभ चुप बैठे जैलदार को इतना कहकर नीचे उतर गया। दिन भर गुरलाभ घर में ही रहा। पिछले पहर कार लेकर वह दूर वाले खेत की ओर चल दिया। खेत का चक्कर लगाकर वह रसूलपुर कोठी चला गया। गणेश उसे सामने ही मिल गया। गणेश की ओर देखते हुए उसने मन ही मन काफी कुछ सोच लिया। रैस्ट हाउस के कमरे की चाबी लेकर उसने अन्दर रखे सामान की तसल्ली की। फिर रैस्ट हाउस के सामने चबूतरे पर बिछी कुर्सी पर जा बैठा। जब भी गुरलाभ आता था तो गणेश को अजब-सा चाव चढ़ जाता था। गुरलाभ के कामधंधे ही ऐसे हुआ करते थे कि गणेश हर वक्त उसके संग ही रहना चाहता था। पहले उसने अच्छी कड़क चाय बनाकर गुरलाभ के सामने ला रखी। खुद भी गिलास में चाय डालकर गुरलाभ के सामने नीचे ज़मीन पर ही बैठ गया।
''काका जी, इस बार तो आपने बहुत देर बाद चक्कर लगाया।'' चाय का घूंट भरता गणेश बोला।
''बस, पढ़ाई-लिखाई ही पीछा नहीं छोड़ती। फिर मैंने सोचा, चलो, गणेश को मिल आएँ।'' गुरलाभ ने गणेश को फूंक दी।
''जी, धन्यभाग मेरे। आपने मुझे याद रखा।'' गणेश ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
''क्यों फिर, यहाँ मौज मार रहा है ?''
''टाइम पास हुआ जाता है। वैसे अब अकेले को डर-सा लगता रहता है।''
''वह क्यों भाई ?''
''यह जो नई लहर चली है खाड़कुओं की इसी के कारण। अब तो कहते हैं, इस तरफ भी आते जा रहे हैं। कहते हैं, ऐसी उजाड़ जगहों पर तो वे अड्डे बनाते हैं जी... आम लोग भी अब तो सहमे हुए हैं जी, जो खेतों में अकेले रहते हैं।''
''अच्छा, इधर भी वही हाल है ?''
''हाँ जी। सच पूछो, मैं तो रात में डर ही गया था। मैंने कहा- आ गए बाबे, अब नहीं छोड़ेंगे।''
''बाबे ?'' गुरलाभ दिलचस्पी से गणेश की बातें सुन रहा था।
''हाँ जी, इधर उन्हें बाबे ही कहते हैं। अभी तो इधर इक्का-दुक्का ही बातें होती हैं। उधर लुधियाने की तरफ इनका बहुत जोर सुना है।''
''हाँ, उधर तो पूरी चढ़ाई है।''
''काका जी, आपने कभी देखे हैं ये बाबे ? आप तो लुधियाने ही रहते हो।'' गणेश ने भोलेपन में बात की।
''ओए, वो कौन सा आसमान से उतरे हैं। आम लड़कों जैसे ही हैं। बस, एक ही फ़र्क है कि उनके गलों में ए.के. सैंतालीस लटकी होती हैं।''
''ए.के. सैंतालीस तो जी कहते हैं, बड़ी बुरी राइफ़ल है। यह तो पुलिसवालों को भी आगे लगा लेती है।''
''तुझे कैसे पता ?'' गुरलाभ ने गणेश की ओर टेढ़ी नज़र से देखा।
''लोगों से ही सुनते हैं।''
''अगर कभी तेरे ये बाबे यहाँ आ गए तो फिर क्या करेगा ?''
''करना क्या है जी। जो हुक्म करेंगे, मानना पड़ेगा।''
''अगर उन्होंने तुझे अपने संग शामिल होने को कहा, फिर ?''
''ना जी ना, पुलिस वाले पकड़ लें तो कहते हैं, मांस चीर कर बीच में मिर्चें भर देते हैं।''
''ओए, पुलिस-वुलिस कहाँ फटकती है उनके पास। वे तो मौजें मारते हैं। उनके पास खुले पैसे होते हैं। पैसे से जो चाहे करो।''
''फिर तो हो सकता है, वे पुलिस को महीना देते हों जी।'' गणेश ने अपनी समझ के मुताबिक बात की।
''वो तो देते ही होंगे, तभी तो कोई बुलाता नहीं। मुझे तो लगता है, वो खूब ऐश करते हैं।''
खुले पैसे और ऐशों की बात सुनकर गणेश के अन्दर कुछ कुछ होने लगा। उसके चेहरे के बदलते हावभाव गुरलाभ देख रहा था।
''फिर कइयों को पुलिस मार क्यों देती है जी ?'' गणेश की जिज्ञासा बढ़ रही थी।
''जो महीना नहीं भरते, उन्हें पुलिस मार देती होगी।''
''राह तो बुरी ही है जी।'' गणेश ने कानों को हाथ लगाया।
''अच्छा फिर, मैं कल आऊँगा। कोई आए-जाए तो ख़याल रखना।''
गणेश को इतनी हिदायत देकर गुरलाभ गाँव लौट गया। बातों बातों में उसने गणेश को टोह लिया था। उसे वह काम का आदमी लगा। उधर गणेश का उतना ध्यान गुरलाभ द्वारा रखे सामान की ओर नहीं था जितना कि उसकी कही गई बातों की ओर था। गुरलाभ के साथ बाबाओं के बारे में बात करके अब उसे उनसे इतना डर नहीं रहा था। गुरलाभ की बातों ने उसके मन में कुछ और ही हलचल मचा दी थी। अगले दिन शाम के वक्त फिर गुरलाभ आया। चाय-पानी पीकर उसने कमरे की चाबी ली। अन्दर से दो राइफ़लें निकाल लाया। रैस्ट हाउस के बाहर चारपाई पर बैठ कर जब उसने पॉलीथीन के बैगों में से राइफ़लें निकालीं तो गणेश हैरानी से राइफ़लों की तरफ देखने लगा। जैलदारों के पास उसने कई किस्म के हथियार देखे थे पर ऐसी चमचमाती राइफ़लें तो कभी नहीं देखी थीं।
''चल आ, मलोट तक काम पर होकर आना है।'' राइफ़लें कार की डिग्गी में छिपा कर रख लीं। गणेश को उसने पिछली सीट पर बिठा लिया। मलोट पहुँचते-पहुँचते उन्हें अँधेरा हो गया था। गुरलाभ काफी देर तक कार लिए इधर-उधर घूमता रहा। आख़िर वह डिफैंस रोड पकड़कर छापियाँ वाली की तरफ निकल गया। थोड़ी दूर जाकर ही उसने कार एक तरफ रोक दी। सड़क के साथ ही उसने भइयों की झुग्गी देख ली थी। एक राइफ़ल उसने स्वयं उठा ली, दूसरी गणेश को थमा दी। झुग्गी के आगे पहुँच कर उसने धमकी देते हुए अन्दर बैठे तीन भइयों को बाहर निकाल लिया। गणेश का मुँह सफ़ेद हुआ पड़ा था। गुरलाभ ने गोलियों की बौछार की तो बग़ैर चू-चाँ किए भइये धरती पर ढेर हो गए। लहू की नदी बह चली।
''ले, अब तू भी चला गोली।'' गुरलाभ ने गणेश को दबका मारा।
''मैं मैं, मैं जी।'' गणेश से बोला नहीं जा रहा था। उसके हाथ कांप रहे थे। गुरलाभ ने उससे राइफ़ल लेकर उसे लोड किया और लाक हटाकर दुबारा उसके हाथ में पकड़ाते हुए उसकी उंगल घोड़े पर टिका दी।
''दबा घोड़ा, नहीं तो मैं तुझे मार दूँगा।'' गुरलाभ ने अपनी राइफ़ल का मुँह गणेश की तरफ कर लिया। भयभीत से गणेश ने घोड़ा दबाया तो राइफ़ल के मुँह से आग की लपटें निकलीं। गुरलाभ ने जेब में से कुछ कागज निकालकर वहाँ फेंक दिए और कार की ओर मुड़ पड़ा। गणेश को संग बिठा कर उसने कार सीतो गुनो की तरफ तेज रफ्तार में दौड़ा ली। आगे भाई केरे से गाँवों के बीच में से होते हुए उसने कार को लिंक रोड पर चढ़ा लिया। शीशे में से पीछे बैठे गणेश को देखकर गुरलाभ ज़हरीली हँसी हँसा। गणेश बुत बना बैठा था। गाँवों में से होते हुए नहर की पटरी चढ़कर उसने कार रसूलपुर रैस्ट हाउस में जा लगाई। सबसे पहले उसने दोनों राइफ़लें कमरे में छिपा दीं। कार की नंबर प्लेट बदलकर असली नंबर प्लेट लगा दी। इधर से खाली होकर उसने कार में से कुछ सामान उठाया और चबूतरे पर गर्दन झुकाये बैठे गणेश के पास जा बैठा। उसने बोतल में से आधा गिलास शराब से भरकर सूखा ही गणेश के मुँह को लगा दिया। गणेश के अन्दर उसने बमुश्किल जबरन ही शराब उंडेली। फिर गिलास भरकर वह खुद पी गया। कुछ देर वह चुप बैठा गणेश की ओर देखता रहा। दसेक मिनट के बाद गणेश के शरीर में हरकत होने लगी।
''काका जी, यह क्या हो गया ?'' वह मरी-सी आवाज में बोला।
''होना क्या था। आज से तू और मैं भी बाबे बन गए।''
''पर जी, बहुत बुरा हुआ। यूँ ही गरीब मार दिए।''
''बाबों का काम है मारना। अच्छा या बुरा सोचना नहीं।''
''अब पुलिस टाँगें चीरेगी।'' पुलिस को याद करते हुए गणेश को पिये हुए पैग का नशा उतर गया।
''पुलिस को हम पूरा महीना देंगे। हम क्या किसी से कम हैं।'' गुरलाभ ने एक गिलास और भरकर गणेश को पिला दिया। नशे की लोर में गणेश अच्छे सुरूर में बोलने लगा, ''पर मेरे पास पुलिस को देने के लिए कहाँ हैं जी पैसे।''
''ओए, तू पैसों की फिक्र न कर। अब हम बाबे बन गए। पैसों की अब कोई कमी नहीं रहेगी।'' इतना कहते हुए दस हजार की गड्डी उसने गणेश को पकड़ा दी।
''ये आज वाले एक्शन के हैं तेरे। पुलिस को महीना मैं खुद भरूँगा।'' गुरलाभ को भी अच्छा-खासा नशा हो गया था।
सुबह मलोट में तहलका मच गया। शहर की सारी पुलिस वहाँ हाज़िर थी। बड़े-बड़े अफ़सर भी पहुँचे हुए थे। सिवाय उस कागज के टुकड़े के पुलिस को कोई सबूत नहीं मिला। 'सारे भइये पंजाब छोड़कर चले जाएँ। नहीं तो सभी का यही हश्र होगा।' - मेज़र जनरल बाबा बसंत ''कमांडो फोर्स'' । बाबा बसंत के नाम की चिट्ठी फेंक कर गुरलाभ ने दोहरी खेल खेली थी। पहला मकसद था- पुलिस को भ्रम में डालना। दूसरा, बाबा बसंत को खोजना। उसका विचार था कि यदि बाबा बसंत आसपास हुआ तो अपने नाम की झूठी चिट्ठी पर कोई न कोई रियेक्शन करेगा। पुलिस ने अपना रिकार्ड खंगाला। यह नाम उनके लिए बिलकुल नया था। वैसे भी इस इलाके में पिछले कुछ महीनों से ही इक्का-दुक्का वारदातें होने लगी थीं। इस घटना ने पुलिस के हाथ-पैर फुला दिए। अगले हफ्ते ऐसी चार वारदातें और हुईं। चारों वारदातें मलोट के आसपास ही हुई थीं। हर जगह से पुलिस को कमांडो फोर्स के मेजर जनरल बाबा बसंत की चिट्ठी ही मिलती थी। हर एक्शन के बाद गुरलाभ गणेश को दस हज़ार रुपया देता था। गणेश की झिझक धीमे-धीमे खत्म होती गई। उसे पैसे का लालच होता चला गया।
अगली कार्रवाई में गुरलाभ ने मलोट के एक आढ़तिये को अगवा किया। उसके घरवालों ने अपना आदमी बचाने के लिए पुलिस से बाहर-बाहर किसी लीडर के मार्फत फिरौती की रकम दी और आदमी ठीकठाक घर वापस पहुँच गया। लुधियाना की भाँति यहाँ भी गुरलाभ ने अपनी पार्टी के एक लीडर केवल कुमार को अपने संग मिला लिया था। भरोसे वाला आदमी मिलने के बाद गुरलाभ ने दो-चार हाथ और मारे। उधर रसूलपुर रैस्ट हाउस के एक बन्द पड़े क्वार्टर में कैश का ढेर लगा पड़ा था। अब तक गणेश की सारी झिझक खत्म हो चुकी थी। वह एक खूंखार आतंकवादी बन चुका था। रात में वे एक्शन किया करते। दिन में आराम से गणेश अपनी नौकरी करता। गुरलाभ भलामानुष बनकर घर में रहता।
कई दिनों बाद शाम के समय गुरलाभ और गणेश रसूलपुर रैस्ट हाउस में बैठे थे।
''देखा, पुलिस के बाजे बजा दिए।'' गुरलाभ ने पैग की चुस्की लेते हुए बात छेड़ी। मलोट एरिये की कार्रवाइयों के बाद पुलिस ने इलाके का चप्पा-चप्पा छान मारा था। जगह-जगह नाके लगा दिए थे। लोगों में दहशत बढ़ती जा रही थी। लोगों को लगता था कि पता नहीं कितने खाड़कू इधर आ गए हैं। खेतों की ढाणियों में रह रहे लोगों की जानें सूखी पड़ी थीं।
''काका जी, वो तो ठीक है, पर कहीं पुलिस इधर न आ निकले।'' गणेश पुलिस की मार से बहुत डरता था।
''नहीं, अपना महीना भरा हुआ है। पुलिस से तू न डर।'' गणेश की सोच के अनुसार ही गुरलाभ ने उत्तर दिया।
''पर एक बात है।'' गुरलाभ ने गणेश की तरफ देखा।
''हाँ जी, हुक्म करो।''
''हमें अब और लड़कों की ज़रूरत है। यह प्रबंध तुझे करना पड़ेगा।''
''एक तो है जी मेरी निगाह में। साथ वाले गाँव का लड़का है - गोरा।''
''लड़के दिल-गुर्दे वाले चाहिएँ। तेरे जैसे।'' गणेश को उसने फूंक दी।
''लड़का तो जी वह बड़ा खुर्रांट है। अगर कहो तो कल ही ले आऊँ।'' गणेश ने छाती ठोकी।
''नहीं, मेरे सामने मत लाना। एक यह भी मेरी बात समझ ले कि मेरा भेद बाहर नहीं निकले। कोई दिखावा भी नहीं करना। तू ऐसा करना…।''
''हाँ जी, बताओ।''
''एक तो तेरा यह गोरा। एक लड़का और तैयार करना है। उनसे कहना कि नौकरी मिल रही हैं कहीं। दस दस हजार एडवांस मिलेगा।''
''जी, मैं समझ गया।''
अगले दो दिनों में गणेश ने गोरे के साथ उसका एक दोस्त जीवन भी तैयार कर लिया। गणेश ने उन्हें बताया कि लुधियाना की ओर से कोई अफ़सर आया था। नौकरी का दस-दस हजार पहले मिलेगा। नौकरी क्या थी ? यह सोचकर उन्होंने क्या लेना था। बीस रुपये रोज की दिहाड़ी करने वालों को इतने पैसे मिल रहे थे। फिर एक दिन गणेश उन दोनों को दस-दस हज़ार दे आया। शाम को किसी खास जगह पर प्रतीक्षा करने के लिए कह आया। गुरलाभ ने रसूलपुर कोठी में से कुछ सामान कार की डिग्गी में रखा। गणेश कार चलाने लगा। गुरलाभ पीछे मुँह-सिर लपेटकर बैठ गया। बल्लूआणे के अड्डे से करीब आधा मील पीछे एक पुल पर गणेश ने कार रोक ली। एक तरफ बैठकर प्रतीक्षा करते गोरा और जीवन दोनों करीब आए तो गणेश ने उन्हें कार में बैठने का इशारा किया। उनमें से एक आगे बैठ गया, दूसरा पीछे गुरलाभ के बराबर। गुरलाभ ने किसी से आँख न मिलाई। गोरे और जीवन को कुछ पता नहीं था कि वे किधर जा रहे थे। क्या काम था। वे कार में घुटे-घुटे से बैठे थे। बल्लूआणा और अबोहर के बीच कार एक लिंक रोड पर मुड़ गई। लिंक रोड पर थोड़ी दूर जाकर गुरलाभ ने कार रुकवा ली। गणेश ने उन दोनों को बाहर निकाला। गुरलाभ भी बाहर निकल आया। गणेश ने कार की डिग्गी खोलकर सभी को एक-एक राइफ़ल थमा दी। गोरे और जीवन ने काँपते हाथों से राइफ़लें पकड़ लीं। कार दुबारा स्टार्ट हुई। कच्चे रास्ते पर पड़ कर थोड़ा पीछे की ओर भट्ठे पर जा खड़ी हुई। गणेश अब ऐसे एक्शनों को अंजाम देने के काबिल हो चुका था। उसने सामने चलती-फिरती लेबर को धमकाया। सबको एक लाइन में खड़ा कर लिया। कुछ मजदूर इधर-उधर भाग गए। सात-आठ मजदूरों को उन्होंने काबू में कर लिया। सामने हथियारबंद आदमी देखकर मजदूर हाथ बांधे खड़े थे। गुरलाभ ने इशारा किया। गणेश ने सभी को सेकेण्ड में भून दिया। गोरे और जीवन के चेहरे पीले ज़र्द हो गए थे।
''अब तुम चलाओ गोली।'' गणेश ने सपाट आवाज़ में उनसे कहा।
''हम गोली ? ना ना यह काम नहीं। हम हाथ जोड़ते हैं। हमें माफ करो।'' गोरा और जीवन थर्र-थर्र काँप रहे थे।
''अगर तुमने गोली न चलाई तो तुम्हें भी इनके साथ मैं ढेर कर दूँगा।'' पीछे से गुरलाभ की तीखी आवाज़ आई।
एक तरफ गणेश और एक तरफ गुरलाभ उन्हें घेरे खड़े थे। असहाय होकर उन्होंने गिरे पड़े मजदूरों पर गोलियों की बौछार की।
सभी को फटाफट कार में बिठाकर गणेश ने कार वापस लिंक रोड पर चढ़ाते हुए सामने गाँव की ओर मोड़ ली। उससे आगे कार गोबिंदपुर डिस्ट्रीब्यूटरी चढ़ गई। आगे जाने पर एक खाली पड़ा नहरी तारघर आता था। पहले बने प्रोग्राम के अनुसार गणेश ने वहाँ कार रोक ली। आसपास सन्नाटा व्याप्त था। उसने डिग्गी में से शराब की बोतल निकाल कर बड़े-बड़े पैग बनाये और गोरे और जीवन को पकड़ा दिए। गोरा और जीवन सुन्न-से मिट्टी बने बैठे थे। ''नहीं भाई, रहने दे।'' गोरा बमुश्किल बोल पाया। गणेश ने जबरन उसे शराब पिला दी। फिर दस-दस हजार की गड्डी दोनों का पकड़ाते हुए गणेश बोला, ''ये अब अगले वाले काम के हैं। पहले का हिसाब बराबर।''
''नहीं भाई, हम नहीं कर सकते यह काम। हमें यार तुम माफ करो।'' जीवन ने गणेश का हाथ पीछे धकेलते हुए मिन्नत की।
''अरे यह काम तुम अपने लिए कहाँ करते हो। यह तो कौम के वास्ते है। यही बाबों का हुक्म है।'' गणेश ने मुँह-सिर छिपाये बैठे गुरलाभ की ओर देखा। गोरा और जीवन बेहरकत बैठे रहे।
''तुम भट्ठे के मजदूरों को मार कर बाबे बन चुके हो। अच्छा यही है, अब बाबों का हुक्म मानो, नहीं फिर पुलिस...।'' गुरलाभ ने गुप्त धमकी देते हुए बात बीच में ही अधूरी छोड़ दी।
दोनों के होश उड़े पड़े थे। इतने में गणेश ने कार की नंबर प्लेटें बदलकर और कार में से सारा सामान निकाल कर कार की चाबी गुरलाभ को थमा दी।
''अच्छा, बाबा जी। कल हम आपको वहीं मिलेंगे।'' कार नहर की पटरी पर चढ़ा कर गुरलाभ गाँव की तरफ निकल गया। उधर गणेश, गोरे और जीवन को लेकर खेतों में से होता हुए उनके गाँव की ओर चल पड़ा।
''ओए बामण, तूने हमें किस कुत्ते काम में फंसा दिया।'' गुरलाभ के जाते ही गोरे ने भड़ास निकाली।
''इतना बुरा क़त्लेआम। यार मेरे तो अभी तक फ्यूज उड़े पड़े हैं। आज तो बच गए, भविष्य में नहीं ऐसे राह पडेंगे।'' जीवन अभी तक डरा हुआ था।
''सारा दिन काम करके बड़ी मुश्किल से बीस रुपये दिहाड़ी मिलती है। कहाँ दस हजार, यह भी तो सोच लो।'' गणेश बोला।
''इन गरीब मजदूरों को मारने से मिलेगा क्या ?'' गोरा थोड़ा नशे में हो गया था।
''यह तो बड़े बाबा जी जाने, वही कमांडर जनरल हैं। हम तो उनकी फौज के सिपाही हैं।''
''यह आदमी कौन था ?'' अचानक जीवन ने पूछा।
''यह बड़े बाबा जी हैं। सारे पंजाब पर इनका राज चलता है। सारी पुलिस इनके हाथ में है। तुम आम खाओ, पेड़ गिनकर क्या करना है।''
''नहीं यार, आज जो हुआ, सो हुआ। आगे दिल नहीं मानता।'' गोरे ने साफ़ जवाब दे दिया।
''अगले काम के पैसे तो तुमने पकड़ लिए हैं। वह तो अब करना ही पड़ेगा। उसके बाद फिर देखा जाएगा। तुम यूँ क्यों नहीं समझते कि हम तो फौजी हैं। फौजी सामने दुश्मन को देखकर उफ्फ करता है कभी। वह ठांय से गोली मारता है।''
''ये मजदूर अपने दुश्मन कैसे हो गए ? अगर मारना है तो मोटी तोंद वाले सेठों को क्यों नहीं मारते तुम्हारे बाबे ?'' जीवन को भी नशा हो चला था।
''ओए, उनके भी बहुत उड़ाते हैं तोते। आगे चलकर बाबा जी से कहकर तुम्हारी ड्यूटी उधर लगवा दूँगा।'' गणेश ने देखा दोनों लाइन पर आते जा रहे थे। सामने गाँव आ गया था।
''चल ठीक है, कल वाला काम करने के बाद हम दुबारा ऐसा काम नहीं करेंगे।'' गोरा सोच में डूबा खड़ा था कि वे पैसे लेकर फंस गए थे।
''ठीक है फिर। कल को जहाँ तुम्हें बताया, वहीं मिलना। पर देखना, कहीं मुझे न मरवा देना। बाबा जी धोखा करने वालों को नहीं छोड़ते।''
असमंजस में फंसे गोरा और जीवन अपने आप कहाँ भागते। दिन चढ़ते ही भट्ठा पुलिस की छावनी बना पड़ा था। आठ राजस्थानी मजदूरों की लाशें सफ़ेद कपड़ों में लिपटी एक पंक्ति में पड़ी थीं। एक तरफ बैठे उनके परिवार वाले विलाप कर रहे थे। वारदात करने वालों का कोई पता नहीं चल रहा था। ए.के. 47 के खाली कारतूसों के अलावा कमांडो फोर्स के लैटर हैड पर लिखी एक चिट्ठी मिली थी - ''सारे हिंदू पंजाब छोड़कर चले जाएँ। नहीं तो सबका यही हाल होगा।- द्वारा मेजर जनरल बाबा बसंत कमांडो फोर्स।'' पुलिस को लगता था कि यह बाबा बसंत का कोई नया ग्रुप इधर आ चुका था।
(जारी…)
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