Sunday, August 8, 2010

धारावाहिक उपन्यास



बलि
हरमहिंदर चहल
(गतांक से आगे...)

चैप्टर- 17
कई दिन सुखचैन चुपचाप रहा। घरवालों ने समझा कि जगह-जगह इंटरव्यू पर घूमता फिरता है, इस कारण शायद निराश था। उसे मौसी के परिवार की चिंता थी। उनके बचने का अब कोई रास्ता नहीं। अगर खाड़कुओं से बच रहे तो पुलिस नहीं छोड़ेगी। यदि पुलिस से बच गए तो ये नहीं छोड़ेंगे। बड़े बुरे दिन आए थे। वह दिनरात उन्हीं के विषय में सोचता रहता था। काम उसका चल रहा था। टाईम भी उसका वही था। सवेरे जाकर काम शुरू करवाता था। शाम को काम बन्द करवा कर घर लौटता था। जितनी भर तनख्वाह मिलती थी, उससे उसके इंटरव्युओं पर आने-जाने का खर्च चले जाता था। करीब दो हफ्ते बाद उसका पड़ोसी चाचा पंडित पूरन चंद मिला था। सवेरे जब वह काम के लिए निकल रहा था तो सामने से पूरन चंद घर की तरफ आ रहा था। सुखचैन चाचा से मिलने के लिए खड़ा हो गया।
''हाँ भई भतीजे, कैसा चलता है काम ?''
''बस, चाचा जी ठीक है।'' सुखचैन करीब आकर नमस्ते करता हुए बोला।
''क्यों ? कल तुझे चिट्ठी नहीं आई ?''
''चिट्ठी कैसी चाचा जी ?'' सुखचैन ने हैरानी में पूछा।
''जो तुमने सीवरेज बोर्ड की इंटरव्यू दी थी, उसका रिजल्ट निकला है। हमारे वाला तो सिलेक्ट हो गया है। कल ही उसे सिलेक्शन की चिट्ठी आई है।''
''अच्छा, पर मुझे तो कोई चिट्ठी नहीं आई।'' सुखचैन निराश-सा बोला।
''तुझे मैं एक बात बताता हूँ। सीवरेज महकमा इतना बढ़िया नहीं। अब कुछ ही दिनों में पब्लिक हैल्थ की भी नौकरियाँ निकलने वाली हैं। मंडी बोर्ड की भी नौकरियाँ निकलेंगी। मेरे हिसाब से सबसे बढ़िया महकमा तो नहर विभाग ही है। पोस्टें नहरी विभाग में भी निकलेंगी, पर अभी ठहर कर। तब तक ज्यादा सिफारिशी लड़के सीवरेज बोर्ड, पब्लिक हैल्थ और मंडी बोर्ड जैसे महकमों में चले जाएँगे। इसके बाद कम गिनती होने के कारण नहरी विभाग में नौकरी मिलनी आसान हो जाएगी। तू सीवरेज बोर्ड, पब्लिक हैल्थ या मंडी बोर्ड को छोड़, निगाह रख नहरी विभाग की नौकरी पर। वहाँ अपना आदमी भी है। वहाँ तेरी सिलेक्शन करवाने की मेरी जिम्मेदारी रही। अपने वाले को भी मैं नहरी विभाग में लगवाकर ही खुश हूँ। तब तक कहीं और नौकरी करता है तो करता रहे। तू अब किसी न किसी तरह जहाँ नौकरी कर रहा है, वहीं फंसा रह।'' पूरन चंद ने सुखचैन को हौसला दिया। सुखचैन निराश-सा काम पर चला गया। यद्यपि जैसे भी था, पर सीवरेज बोर्ड में सिलेक्शन न होने के कारण वह सारा दिन उदास रहा।
शाम को जब वह घर लौटा तो एक इंटरव्यू की चिट्ठी आई पड़ी थी। फिरोजपुर के नहरी विभाग की ओर से होने वाला यह इंटरव्यू चार दिन बाद था। इंटरव्यू वाले दिन तड़के जल्दी उठ कर तैयार होकर वह फिरोजपुर निकल गया। इंटरव्यू दो बजे शुरू होनी थी। वहाँ से नहरी कालोनी में जाकर उसे पता चला कि कुल आठ लड़के रखे जाने थे। इंटरव्यू आरंभ होने तक केवल सात लड़के ही मुश्किल से पहुँचे। कुछ दिन पूर्व हुई सीवरेज बोर्ड की सिलेक्शन के कारण बहुत से लड़के उधर चले गए थे। सुखचैन को कुछ आशा-सी बंधी। इंटरव्यू के समय जब उसने बताया कि इसी विभाग में वह पिछले कई महीनों से वर्क इंचार्ज के तौर पर काम कर रहा है तो उसके इस अनुभव ने इंटरव्यू लेने वालों को काफी प्रभावित किया। सप्ताह तक परिणाम बताने का कहकर सभी लड़कों को वापस भेज दिया गया। वह प्रसन्न-सा घर लौट आया। उसे लगता था कि शायद यहाँ काम बन ही जाएगा। पाँच-छह दिन बाद उसकी मुराद पूरी हो गई। फिरोजपुर सर्किल में उसे एडहॉक पर ओवरसियर रख लिया गया था। उसने मन ही मन पंडित पूरन चंद की दूरदर्शिता की दाद दी। उसने सोचा कि यही एडहॉक की नौकरी का अनुभव पक्की नौकरी के समय काम आएगा। उसकी नियुक्ति फिरोजपुर सर्किल के अबोहर डिवीजन में हुई थी। उसे अबोहर डिवीजन के दफ्तर जाकर हाज़िरी देनी थी। उसका भाई देबा उसे मुल्लांपुर से अबोहर वाली बस में चढ़ा गया। बस चली तो उसे अबोहर को लेकर पुरानी बातें याद आने लगीं। कभी इसी मुल्लांपुर के अड्डे तक वह, सत्ती और गुरलाभ इकट्ठे आए थे। कैसे वे उसे संग ले जाने के लिए ज़ोर डाल रहे थे। वे अबोहर शहर के बारे में कैसे उत्साहित होकर बातें किया करते थे। पता नहीं, किधर गए वे दिन। रम्मी विवाह करवाकर अमेरिका चली गई। दोबारा सत्ती का भी कोई पता नहीं चला और गुरलाभ तो...।
करीब दो बजे बस अबोहर अड्डे जा पहुँची। उसने फटाफट सामान रिक्शे पर रखा और नहरी कालोनी के लिए चल पड़ा। लगभग आधे घंटे के बाद उसे सात नंबर सब-डिवीजन में भेज दिया गया। इस सब-डिवीजन का एस.डी.ओ. भाग सिंह था। एस.डी.सी. ने काग़ज़ी कार्रवाई पूरी की और सुखचैन को चाय पिलाई।
''शाम में एम.डी.ओ.को मिलकर ही कहीं जाना।'' एस.डी.सी. हरजीत सिंह सुखचैन को समझा रहा था।
''पर एस.डी.ओ. साहिब यहाँ नहीं हैं ?'' सामने एस.डी.ओ. के दफ्तर की ओर देखते हुए सुखचैन ने पूछा।
''नहीं, बाहर काम पर गए हुए हैं। कंस्ट्रक्शन का काम पूरे ज़ोरों पर चल रहा है।''
''मेरा चाचा भी एस.डी.सी. है जी। पहले अखाड़ा कोठी में हुआ करता था, पर आजकल मुक्तसर में है।'' सुखचैन जान-पहचान बढ़ाने लगा।
''क्या नाम है ?''
''पंडित पूरन चंद। मलकपुर से।'' सुखचैन ने बताया।
''यार, पंडित के साथ तो मैं रहा हूँ। बहुत बढ़िया बंदा है। पर तेरा चाचा कैसे?''
''हमारे पड़ोसी हैं। बस, घरवाली बात ही है।''
''अच्छा अच्छा। फिर तो तू अपने घर का ही लड़का है।'' हरजीत की बातों से उसे अपनत्व-सा महसूस होने लगा।
''यहाँ कालोनी में रहने के लिए क्वार्टर मिल जाएगा जी कोई ?'' सुखचैन ने रिहाइश के विषय में सोचते हुए पूछा।
''ना ना, यह तो भूल जा। कालोनी है तो नहरी कर्मचारियों के लिए पर आधे से अधिक क्वार्टर दूसरे ही बाहर के महकमों वालें ने कब्ज़ा रखे हैं।''
''अच्छा जी।'' सुखचैन चिंतित-सा हो गया।
''रहने के लिए तो तेरा शहर में ही प्रबंध हो जाएगा। मैं चपरासी भेज दूँगा साथ।''
''यह तो बड़ी मेहरबानी होगी।''
''मेहरबानी वाली कौन सी बात है। वैसे मैं अभी सन्देशा भेज देता हूँ, धर्मशाला के मैनेजर को कि पाँच-सात दिनों के लिए एक कमरा चाहिए।'' हरजीत सिंह ने इतना कहते ही चपरासी को आवाज़ लगाई। उसे धर्मशाला की ओर भेजते हुए समझाया कि उसका नाम लेकर धर्मशाला के मैनेजर को एक कमरे के लिए कह आए। चपरासी चला गया तो सुनखैन ने बेचैनी-सी महसूस करते हुए हरजीत सिंह से पूछा, ''अगर कहो तो कल न मिल लूँ एस.डी.ओ. साहब को। मेरा मतलब है, मैं सवेरे का चला हुआ हूँ और बहुत थका हुआ हूँ। अब तो पाँच बजे दफ्तर भी बन्द होने वाला है।''
''नहीं, तू एस.डी.ओ. से मिले बग़ैर न जाना। इस महकमे में दफ्तर टाइम कोई नहीं। जब काम चल रहा होता है तो समझो कि चौबीस घंटे की ड्यूटी। फिर खाली। दफ्तर बन्द होने के बाद एस.डी.ओ. साहिब के घर जाकर इंतज़ार कर लेना।''
दफ्तर बन्द होने के बाद सुखचैन एस.डी.ओ. के घरवाले दफ्तर में जाकर बैठ गया। आठ बजे के करीब एस.डी.ओ. काम से वापस लौटा। सयानी-सी उम्र का सज्जन-सा एस.डी.ओ. घर आते ही पहले दफ्तर में बैठे सुखचैन से मिला।
''तेरी यह पहली नौकरी है ?'' एस.डी.ओ. भाग सिंह ने पूछा था।
''हाँ जी, नौकरी तो पहली ही है। मैंने कई महीने वर्क इंचार्ज का काम किया है। मुझे लेवल करने, बुर्जियाँ लगवाने, पलस्तर और चिनाई के सारे काम की जानकारी है। मैं यह सब कुछ करवाता रहा हूँ।''
''यह तो ठीक है। वैसे काम तो बहुत है। पर फिर भी मैं तुझे कुछ देर किसी के साथ अटैच कर देता हूँ। काम का और तजुर्बा हो जाएगा। उसके बाद तुझे एक इंडीपेंडेंट काम दे दूँगा।''
''ठीक है जी।''
''चल फिर सवेरे सात बजे आ जाना। मेरे साथ ही चलना, मैं तुझे सिद्धू ओवरसियर के पास छोड़ दूँगा।''
उसके बाद सुखचैन ने इजाज़त ली और पास वाली धर्मशाला में चला गया।
सफ़र का थका-टूटा सुखचैन सवेरे बमुश्किल सात बजे के करीब एस.डी.ओ. की कोठी पर पहुँचा। एस.डी.ओ. उसकी ही प्रतीक्षा कर रहा था। उसके बैठते ही सरकारी जीप चल पड़ी। राह में एस.डी.ओ. उसे काम के बारे में समझाता रहा। जैसे ही वे कार्यस्थल पर पहुँचे, वहाँ सिद्धू ओवरसियर पहले ही आया खड़ा था। यह रसूलपुर माइनर था जहाँ सिद्धू के काम का एरिया था। सिद्धू को सुखचैन के बारे में समझा कर एस.डी.ओ. अगले कार्यस्थलों की ओर बढ़ गया। सिद्धू भी नई उम्र का ही लड़का था।
सुखचैन ने रिहाइश अभी धर्मशाला में ही रखी हुई थी। बाहर ढाबे पर रोटी खाकर रात को वह कमरे में आ जाता था। फालतू समय तो अभी था भी नहीं। सवेरे जल्दी काम पर जाना, अँधेरा होने पर काम पर से लौटना, यह हर रोज़ का रूटीन था। एक बात उसके लिए अच्छी हुई। सिद्धू ओवरसियर जिसके साथ उसे लगाया गया था, धर्मशाला के समीप ही कहीं रहता था। वह सुखचैन को अपने संग ही मोटरसाइकिल पर ले जाता था। साथ ही वापस ले आता था। कई बार तो सवेरे काम पर सुखचैन को छोड़कर वह कहीं ओर निकल जाता था, फिर शाम को ही लौटता था। सुखचैन से सारा काम संभाल लिया था। ठेकेदार और सिद्धू अपनी पीने-पिलाने की महफ़िल जमा लिया करते थे। हर दूसरे-तीसरे दिन एस.डी.ओ. देखता था कि सुखचैन लेबर के सिर पर खड़ा होकर काम करवा रहा होता। उधर सिद्धू और ठेकेदार महफ़िल जमाये बैठे होते। इन बातों ने एस.डी.ओ. के दिल में सुखचैन के लिए अच्छी जगह बना दी। फिर एक महीने बाद ही इसी रसूलपुर माइनर पर आगे एक अन्य ठेकेदार को काम अलॉट करके एस.डी.ओ. ने सुखचैन को उस काम का फुल इंचार्ज बना दिया। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। अब वह भी सब-डिवीज़न के चार अन्य ओवरसियरों के बराबर था। वह जी तोड़ काम करने लगा। काम की तरफ से उसने कभी शिकायत नहीं आने दी। काम चलता गया। गुजरते समय के साथ उसके अन्दर आत्मविश्वास आता गया। नये ठेकेदार ने उसे बाहर एक अच्छा कमरा दिलवा दिया। वह ठेकेदार के साथ ही काम पर आता-जाता था। दूसरों की तरह उसकी भी तनख्वाह के अलावा ऊपरी कमाई होने लगी। वह घर पर पैसे भेजने लगा। एस.डी.ओ. की सलाह के अनुसार उसने सबसे पहले मोटरसाइकिल खरीदा। एस.डी.ओ. जानता था कि काम को तो निरंतर बढ़ते ही जाना था। इसलिए अपनी सवारी होना ज़रूरी था। सुखचैन शरीफ और सादा व्यक्ति होने के कारण एस.डी.ओ. का भरोसेमंद बन गया था। जहाँ पुराने ओवरसियर एस.डी.ओ. से चोरी ही सीमेंट और ईंटें वगैरह खपा देते थे, वहीं वह एस.डी.ओ. से किसी भी बात को छिपा कर नहीं रखता था। एस.डी.ओ. कहता था कि मैटीरियल न बेचा जाए क्योंकि कमाई के अन्य बहुत से साधन थे। सुखचैन उसके बताये अनुसार ही चलता था। फिर नहरी विभाग में सरकार ने ओवरसियरों के स्थायी पद निकाले। सुखचैन की सिलेक्शन इसी एस.डी.ओ. भाग सिंह ने अपनी सिफारिश से ही करवा ली थी। महकमें में भी उसकी अच्छी पोज़ीशन बन गई थी। अपने काम पर जाते समय वह एक नहरी कोठी के सामने से गुजरता था। वहाँ से गुजरते हुए उसे बचपन में देखे सपने याद आ जाते। बचपन में उसका सपना था कि किसी नहरी कोठी में वह ओवरसियर लगे। उसे अब कोई कमी नहीं थी, पर उसका मन किसी नहरी कोठी में लगने को मचलता था।
इधर से काम खत्म करते ही एस.डी.ओ. भाग सिंह के सब-डिवीज़न को सूलर माइनर की कंस्ट्रक्शन का काम अलॉट हो गया। यह माइनर काफी बड़ा था। यहाँ काम भी बहुत था। यह अबोहर शहर से काफी दूर पड़ता था। इस नये माइनर पर एस.डी.ओ. ने सबसे अधिक काम सुखचैन को दिया। उसका ठेकेदार भी पुराना ही था। दोनों की जोड़ी बनी भी बहुत बढ़िया थी। पूरी चढ़ाई के साथ उन्होंने नया काम आरंभ किया। उनका काम सबसे अधिक रफ्तार से चल रहा था। इस काम पर जाते हुए काफी दूर एक नहरी कोठी पड़ती थी- रतनगढ़। यह बिलकुल उजाड़ इलाका था। सुखचैन जब कभी उधर जाता तो उसका बड़ा मन होता कि वह इस कोठी का ओवरसियर लगे, पर अभी ऐसा होना आसान नहीं था क्योंकि जो ओवरसियर इस समय रतनगढ़ का इंचार्ज था, वह एक्सीयन का खास आदमी था। सुखचैन जब कभी भी कोठी की तरफ से गुजरता तो वह ललचाई नज़रों से उस कोठी की ओर देखता। अगले छह महीने बहुत ज़ोरों का काम चला। सुखचैन ने सूलर माइनर का काम भी खत्म कर दिया। अब तक वह चार पैसे कमा चुका था। उसकी घरेलू स्थिति भी ठीक थी। उसके हाथ में भी चार पैसे थे। अच्छा बैंक-बैलेंस भी बन गया था। फिर अचानक सीमेंट का अभाव हो गया। पीछे से सीमेंट आना बन्द हो गया। सब चलते काम रुक गए। ठेकेदार और मकहमे वाले सब खाली हो गए। ओवरसियर सारा दिन दफ्तर में बैठे गप्पें मारते। शाम को इकट्ठे होकर महफ़िलें जमाते। वह हालांकि इतना पियक्कड़ तो नहीं बना था पर वह भी इन महफ़िलों में लुत्फ़ उठाता। कई बार वह शहर में यूँ ही घूमता-फिरता रहता। अपने महकमे को छोड़कर स्थानीय तौर पर उसकी अन्य कोई जान पहचान नहीं बनी थी। शहर में घूमता कई बार वह सत्ती के विषय में सोचता। वह तो सत्ती का गाँव भी नहीं जानता था। गुरलाभ के ननिहाल वाले गाँव का अवश्य पता था। वह सीतो गुन्नों रोड पर जाते हुए अक्सर ही अमरगढ़ गाँव में से गुजरता था। यहाँ से निकलते हुए हमेशा ही उसका मन उचाट-सा हो जाता, 'गुरलाभ को क्या ज़रूरत पड़ी थी इस राह पर पड़ने की। यूँ ही भंग के भाणे ज़िन्दगी गवां ली।' वह मन में सोचता। जो हो गया था, वह तो हो गया था। अब उसके सोचने से क्या बनने वाला था। कई बार वह शहर में यूँ ही घूमता रहता। शायद कहीं सत्ती ही मिल जाए। उसे लोगों के इतने बड़े समूह में भी कोई परिचित चेहरा न मिलता। बस, वह व्यर्थ ही इधर-उधर चला फिरता। खाली बैठे का वक्त कहाँ बीतता था।
फिर सरकार ने नहरी विभाग के दो अलग अगल विभाग बना दिए। नए कंस्ट्र्क्शन विभाग को इरीगेशन कंस्ट्रक्शन बना कर इसका सबकुछ पृथक कर दिया। चलती हुई नहरों को संभालने वाला दूसरा विभाग इरीगेशन रनिंग बना दिया। पुराने एक्सीअन की बदली हो गई। वह अपने खास आदमी को रतनगढ़ कोठी से तबादला करवा कर अपने संग ही ले गया। फिर सुखचैन ने भाग सिंह, एस.डी.ओ. की मिन्नत करके उसकी सिफारिश से इरीगेशन रनिंग के आदेश करवा लिए और रतनगढ़ कोठी में पोस्टिंग करवा ली। यह उसके लिए सबसे अधिक खुशी का दिन था। उसका बचपन का सपना पूरा हुआ था। अब वह रतनगढ़ सैक्शन का इंचार्ज था। उसका हैड-क्वार्टर नहरी कोठी, रतनगढ़ था। उसने कंस्ट्रक्शन के कामों का चार्ज किसी दूसरे ओवरसियर को दे दिया। इधर से मुक्त हो गया। फिर उसने नए आदेशों के अनुसार एक्सीअन रनिंग के दफ्तर में उपस्थित होने की रिपोर्ट की। नए एस.डी.ओ. से मिलकर उसी दिन अपनी नई नियुक्ति अर्थात रनिंग सैक्शन, रतनगढ़ की ओर चल दिया।
अबोहर - बठिंडा हाईवे पर जाते हुए मलोट से थोड़ा आगे जा कर रतनगढ़ डिस्ट्रीब्यूटरी आ गई। यहाँ से उसने मोटरसाइकिल नहर की पटरी पर चढ़ा लिया। यहाँ करीब तीन मील के फासले पर कलेरां की झाल थी। यहीं से उसका एरिया रतनगढ़ सैक्शन शुरू होता था। झाल के पुल पर थोड़ी देर रुककर उसने गेज पर दृष्टि डाली। पानी का लेवल पूरा था। वह आगे बढ़ गया। अक्तूबर का महीना था। नहर के दोनों ओर नरमा और कपास के खेत सफेद चादर की तरह बिछे हुए थे। दोपहर ढलकर दिन का पिछला पहर हो चुका था। पिछले पहर की गुनगुनी धूप में धीमे-धीमे आसपास का मुआयना करता हुआ वह शाम होते तक रतनगढ़ कोठी पहुँच गया। कोठी का सारा स्टाफ उसी की प्रतीक्षा कर रहा था। उसकी आमद का तार-घर में सन्देश पहुँच गया था। मोटरसाइकिल रैस्ट हाउस के बरामदे में लगा कर वह चबूतरे पर रखी कुर्सी की ओर आ गया। स्टाफ में से सबसे पहले मेट ने उसे फौजी ढंग से ऐड़ियाँ जोड़कर सलूट मारा। उसके चलने-फिरने और बोलने के तरीके से लगता था कि वह रिटायर्ड फौजी था। सलूट मारते ही मेट ने अपना नाम राम चंद बताया। फिर वह बाकी कर्मचारियों के विषय में बताने लगा। ज्यादातर बेलदार थे। बेलदारों के अलावा एक चौकीदार, माली, रसोइया और एक तार बाबू था। माली ने फूल बूटों की कटाई-छंटाई करके और पानी का छिड़काव करके नहरी कोठी दुल्हन की तरह सजा रखी थी। तार बाबू जगदीश चंद पढ़ा लिखा और समझदार व्यक्ति था। कोठी के कर्मचारियों से मिलने के बाद वह कोठी में इधर-उधर चहल-कदमी सी करता कोठी के गेट पर आ गया। गेट पर बोर्ड लगा हुआ था, ''नहरी कोठी, रतनगढ़''। उसे ख़याल आया, 'यही उसका सपना था, किसी नहरी कोठी में ओवरसियर लगने का।' गेट से उसने पश्चिम की ओर निगाह दौड़ाई। न कोई फसल, न ही कोई पेड़। बस, सब तरफ टीले ही टीले दिखाई देते थे। सूरज छिपने की तैयारी में था। वह डूबते सूरज की ओर चलता हुआ डिफेंस रोड के पुल पर जा पहुँचा। यहीं डिफेंस रोड नहर को काटती थी। उसने दायीं ओर दृष्टि घुमाई। सड़क की काली लकीर दूर तक दिखती दायें हाथ की ओर मोड़ मुड़ जाती थी। बायें हाथ पर डिफेंस रोड ऊपर की ओर चढ़ती टीले के ऊपर से गुजरती थी। वह बायीं ओर चल पड़ा। काफी दूर चढ़ाई चढ़कर वह टीले के बिलकुल ऊपर पहुँच गया। कुछ देर पहले जहाँ उसे सूरज का लाल रंग का गोला दिखाई दे रहा था, वहाँ वह अब स्वयं खड़ा था। टीले के शिखर पर खड़े होकर उसने आसपास नज़र दौड़ाई। उजाड़ जंगल बिलकुल शांत पड़ा था। दूर टीले की जड़ों में नहरी कोठी एक दरख्तों का झुंड-सा ही लगती थी। अस्ताचल की ओर हल्की सी लाली ही रह गई थी। चारों तरफ कालिमा-सी फैलने लग पड़ी थी। अँधेरा उतरने लगा था। वह टीले के बीच वाली पगडंडी से होता हुआ वापस कोठी पहुँच गया। अच्छा-खासा अँधेरा हो गया था। रसोइया ठंडी चाय लिए बैठा था। उसे आता देख वह शीघ्रता से ताजी चाय बना लाया। वह चबूतरे पर बिछी कुर्सी पर बैठ चाय पीने लगा। कोठी के सभी कर्मचारी अभी भी वहाँ इकट्ठे हुए बैठे थे। उसने सभी को जाने के लिए कह दिया। इतने में तार बाबू रजिस्टर लेकर आया।
''आप बाबू जी, नए हो न ?'' उसने नई-सी उम्र के सुखचैन को देखकर पूछा।
''हाँ, नहर मकहमे में किसी सैक्शन में पहली नियुक्ति है।''
''लो फिर अपनी पहुँच की एंट्री कर दो ताकि मैं आपकी पहुँचने की रिपोर्ट एक्सीअन दफ्तर को भेज दूँ।'' तार बाबू अनुभवी लगता था।
''तू खुद ही लिख ले, जो लिखना है। मैं दस्तख़त कर देता हूँ।'' सुखचैन के कहने पर तार बाबू ने रजिस्टर उसके आगे कर दिया। सुखचैन से दस्तख़त करवा कर वह तार घर की ओर मुड़ गया।
अगले दिन पंछियों के मधुर संगीत ने सुखचैन को तड़के ही जगा दिया। सुबह की ठंडी और ताजी हवा उसे बहुत भली लगी। उसने चौबारे पर से चारों ओर निगाह मारी। लगता था जैसे शांत बियाबान सूरज की किरणों की प्रतीक्षा कर रहा हो। कुछ देर बाद रात वाला सूरज का गोला पूर्व दिशा के टीले के शिखर पर से झांकता हुआ दिखाई दिया। वह उठकर नीचे आ गया। कुछ देर उसने सैर की। फिर नहा-धोकर तैयार हो गया। चाय-नाश्ता करके वह चबूतरे पर कुर्सी डालकर बैठ गया। इतने में तार बाबू जगदीश आ गया। उसने खुला रजिस्टर उसके सामने किया। रूटीन काम था, गेजें सब ठीक थीं। ऊपर से पानी ठीक आ रहा था। नहर के अन्तिम छोर पर पानी सही पहुँच रहा था।
(जारी…)
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Sunday, August 1, 2010

धारावाहिक उपन्यास



बलि
हरमहिंदर चहल
(गतांक से आगे...)

चैप्टर- 16
डिप्लोमा पूरा होते ही सुखचैन ने सुख का साँस लिया था। कालेज में तो आठों पहर सिर पर तलवार लटकती रहती थी कि पता नहीं किस वक्त, क्या हो जाए। कभी खाड़कू हड़ताल की धमकी देते थे, सरकार हड़ताल फेल करने का यत्न करती थी। कभी कहीं कोई कार्रवाई हो जाती, कभी कहीं। जब से वह हर रोज़ गाँव आने लगा था, तब से यही खतरा रहता था कि कभी शाम के समय अँधेरा होने पर कोई बस ही अगवा न हो जाए। गाँव से सुधार तक वह आता भी हर रोज़ साइकिल पर ही था। शाम को अँधेरा होने पर गाँव की ओर जाते हुए भय सताता रहता था कि पता नहीं कब कोई ए.के. सैंतालीस लेकर सामने आ खड़ा हो। वे कौन-सा दूर, बाहर से आए थे। वे तो उसके सहपाठी और उसके आसपास के गाँवों के ही लड़के थे। उसने देखा था कि डिप्लोमा खत्म होने तक उसकी कक्षा आधी रह गई थी। बाकी के सब लड़के खाड़कू दलों में जा मिले थे। इनमें से आधे के करीब मारे जा चुके थे। शेष बचे हुओं ने इधर उधर आतंक फैलाया हुआ था। उसके जैसे ज़रूरतमंद और दूर की सोचने वाले लड़के ही आखिर लगे थे। उसके घरवालों को उससे भी ज्यादा चिंता थी। वे कहाँ जानते थे कि कालेज में क्या हो रहा था। उन्हें तो सदैव यही खतरा रहता था कि ऐसे बुरे हालातों में कहीं लड़के का पैर किसी गलत दिशा की ओर न फिसल जाए। रब-रब करते उन्होंने भी तीन साल बड़ी मुश्किल से पूरे किए थे। डिप्लोमा समाप्त होते ही वह घर आ गया था। रिजल्ट अभी दो महीने बाद आना था। इतनी देर उसने खेत का कामधंधा संभाला। उसका छोटा भाई देबा भी सुधार कालेज में जाने लग पड़ा था। छोटे बहन-भाई भी ऊपर की कक्षाओं में पहुँच गए थे। घरवालों को अब यही था कि शीघ्र नतीजा निकले, उसे कहीं नौकरी मिले तो ज़रा हाथ खुला हो।
सुखचैन का पड़ोसी पंडितों का लड़का ही रिजल्ट का पता लेकर आया था। सुखचैन तो लौटकर कालेज गया ही नहीं था। फर्स्ट डिवीजन में पास होना उसके लिए बड़ी खुशी की बात थी। डिप्लोमा का सर्टिफिकेट तो मिल गया था, पर अब उसे आगे यह पता नहीं चल रहा था कि नौकरी कहाँ और कैसे खोजे। इस मसले का हल भी उसके पड़ोसी चाचा पंडित पूरन चंद ने किया। उसकी बदली मुक्तसर की हो गई थी। दो-चार हफ्तों बाद वह गाँव लौट आता था।
''सिफारिश की तो ज़रूरत शायद न ही पड़े। लड़के के नंबर अच्छे हैं और ऊपर से सिविल के ओवरसियरों की मांग भी है।''
''देख सुखचैन, पहले तो तू ऐसा कर कि हर बड़े शहर के रोज़गार दफ्तर में अपना नाम लिखा आ। जब भी कहीं कच्चे ओवरसियरों की ज़रूरत पड़ती है, वे लोकल रोज़गार दफ्तरों से ही ले लेते हैं। चार-पाँच महीने कहीं कच्ची नौकरी मिल जाएगी। फिर जब कहीं सरकार ने पक्की पोस्टें निकालीं, फिर वहाँ भर्ती भी हो जाएगा। और फिर यह कच्ची नौकरी तजुर्बे का काम भी करेगी।''
''एक रास्ता मैं और भी बताता हूँ।''
''सरकार ने एक नया प्रोजेक्ट शुरू किया है। वह है ये छोटी-बड़ी नहरें पक्की करने का। यह महकमा नहर विभाग का ही हिस्सा है। बहुत जगह काम शुरू भी हो गए हैं। हर एक काम पर एक वर्क-इंचार्ज की ज़रूरत होती है। वैसे तो दस पढ़ा कोई भी लड़का वर्क-इंचार्ज लग जाता है, पर तूने तो कोर्स किया हुआ है। यह साथ ही अपने गाँव के नज़दीक मेरा एक दोस्त ओवरसियर छोटी नहर पक्की करवा रहा है। अगर कहे तो तुझे वहाँ वर्क-इंचार्ज रखवा देता हूँ। चार पैसे भी मिलेंगे, और फिर तजुर्बा भी होगा।''
''चाचा जी, मैं तैयार हूँ।'' सुखचैन तुरन्त बोला।
''चल फिर कल को दसेक बजे ढोलण वाले पुल पर आ जाना। वो ओवरसियर वहीं होगा।''
नौकरी का पहला दिन सुखचैन को बहुत बढ़िया लगा। नौकरी वर्क-इंचार्ज की थी। उसकी नौकरी की शुरूआत ही थी। लेवल करने का सारा काम सुखचैन ने संभाल लिया। दिनोंदिन वह प्रोजेक्ट और अन्य कामों की ओर भी ध्यान देने लगा। वह हर रोज़ सवेरे आठ बजे गाँव से साइकिल पर जाता था। नौ बजे पहुँचकर काम शुरू कर देता था। पाँच बजे काम बन्द करवाकर वह घर को वापस लौट जाता था। ओवरसियर को मौज आ गई। पहले उसे खुद सवेरे नौ बजे काम पर पहुँचना पड़ता था। फिर सारा दिन वहाँ बिता कर वह पाँच बजे लौटता था। उसके अन्य कई काम भी सुखचैन ने संभाल लिए। जहाँ एक तरफ ओवरसियर को जिम्मेदारियों से छुटकारा मिला, वहीं सुखचैन को काम का अनुभव हो रहा था। महीना पूरा होने पर जब सुखचैन को पहली तनख्वाह मिली तो उसे अत्यंत खुशी हुई। उसके परिवार के लिए भी यह दिन खुशियों से भरा दिन था। अच्छे दिनों की शुरूआत होने लगी थी। लगता था कि इस घर में पक्के तौर पर पाँव जमाये बैठी गरीबी के यहाँ से रुखसत होने के दिन आ गए थे। बीच बीच में जब कभी काम बन्द होता तो वह कहीं न कहीं जाकर रोज़गार दफ्तर में नाम दर्ज क़रवा आता था।
तीन महीनों के बाद उसको पहली बार बठिंडे के रोज़गार दफ्तर से ओवरसियर की नौकरी के लिए चिट्ठी मिली। वह बड़े ज़ोशोखरोश से इंटरव्यू के लिए गया। उसकी इंटरव्यू तो हुई, पर नौकरी सिफारिशियों को ही मिली। उस दिन पहली बार उसे धक्का लगा। उसे लगा जैसे डिप्लोमा का सर्टिफिकेट सिर्फ़ कागज का टुकड़ा मात्र हो। टूटे हुए मन से उसने वापस जाकर वर्क-इंचार्ज की नौकरी शुरू कर दी। इस बीच सीवरेज बोर्ड में स्थायी नौकरियाँ निकलीं। बेउम्मीदी से उसने यहाँ भी अर्जी भेज दी। कुछ समय बाद वहाँ इंटरव्यू भी दे आया। चारेक महीने में दो तीन बार किसी न किसी रोज़गार दफ्तर की ओर से उसे इंटरव्यू की चिट्ठी आती थी। उसने देखा कि किराया खर्च करने के अलावा और कुछ नहीं होता था। वर्क-इंचार्ज की नौकरी करते हुए उसे छह-सात महीने हो गए थे। फिर उसे फरीदकोट के रोज़गार दफ्तर से ओवरसियर की नौकरी के लिए बुलाया आया। जहाँ जाना था, वह जगह बहुत दूर थी। वह सवेरे जल्दी ही चल पड़ा। फरीदकोट अड्डे पर पहुँचकर उसने ऑटो लिया। शहर से बाहर नहर कालोनी पहुँच गया। वहाँ उम्मीदवारों की लम्बी लाइन लगी हुई थी। दफ्तर बन्द होने तक बड़ी मुश्किल से उसकी बारी आई। जिन्हें नौकरी पर रखना था, उन्हें तो पहले ही रख लिया गया था। निराश सुखचैन वापस बस अड्डे पर पहुँचा। इधर उधर घूमते हुए उसने सामने सादिक की ओर जाने वाली बस खड़ी देखी। सादिक के करीब ही उसकी मौसी का गाँव था। वह सादिक वाली बस में बैठ गया। सादिक पहुँचते दिन छिप चुका था। उसे मौसी के गाँव को जाने वाला टैम्पू मिल गया। सादिक फाजिल्का रोड पर सादिक से सात-आठ किलोमीटर जाकर यह गाँव आता था- मल्ल सिंह वाला। वहीं सुखचैन की बड़ी मौसी ब्याही हुई थी।
गाँव के अड्डे पर उतरकर सुखचैन मौसी के खेत वाली राह पर पैदल ही चल पड़ा। थोड़ी दूर जाकर वह ड्रेन की पटरी पर हो लिया। रात उतर आई थी। आसपास बियाबान जंगल और सुनसान था। कहते थे कि इन गाँवों में तो दिन छिपते ही लोग घरों में ताले लगा लेते थे। गाँव के लोग भय और खौफ़ में रातें बिताते थे। इस इलाके में खाड़कुओं का पूरा ज़ोर था। दिन छिपते ही उनका राज शुरू हो जाता था। लोग डरते थे कि पता नहीं कब किसके घर का दरवाजा आ खटखटाएँगे और पता नहीं क्या मांग करेंगे। पुलिस तो इधर दिन के समय ही कहीं आती थी। वह भी लोगों को उठाकर पैसे उगाहने के लिए। एक तरह से ये सारा इलाका ही पुलिस और खाड़कुओं का बन्दी बना हुआ था। रात में खाड़कू और दिन में पुलिसवाले मनमर्जी करते थे। उसे आसपास से भय आया। ख़यालों में मग्न सुखचैन मौसी के घर के पास जा पहुँचा। उसे कुछ बेचैनी-सी हुई। घर अँधेरे में डूबा हुआ था। वह काफ़ी दूर ही था जब उसके कदमों की आहट सुनकर कुत्ता भौंकने लगा। फिर उसने घर की तरफ से कोई आता हुआ देखा। सुखचैन जहाँ था, वहीं खड़ा हो गया। ''कौन है ?'' घर की ओर से आने वाले ने दूर से ही पूछा। सुखचैन ने आवाज़ पहचान ली थी। यह उसकी मौसी का छोटा लड़का दीपा था। ''मैं सुखचैन हूँ, मलकपुर से।'' सुखचैन प्रत्युत्तर में बोला। ''अच्छा, सुख। पर तू इस वक्त किधर से ?'' मौसी का बेटा करीब आते हुए बोला।
फिर दोनों ने एक दूजे से मिलते हुए हाथ मिलाया। मौसी के बेटे दीपे ने वहीं से ऊँचे स्वर में बोलकर घरवालों को बताया, ''सब ठीक है, यह तो सुख है।'' दीपा उसे घर से बाहरवाली बैठक की ओर ले चला। ''इधर किधर, घर नहीं जाना ?'' सुखचैन ने हैरानी में पूछा। ''नहीं, हम इधर ही सो जाएँगे। उधर ठीक नहीं।'' आगे आगे जाते हुए दीपा बोला।
''ठीक नहीं। क्या मतलब ?'' सुखचैन उसके व्यवहार से हैरान था।
''बाकी सबकुछ बाद में बताऊँगा। अभी इतना ही बहुत है कि उधर कुछ रिश्तेदार आए हुए हैं।'' इसके बाद दीपा ने चुप्पी धारण कर ली। सुखचैन को चुपचाप बाहरवाली बैठक में बिठाकर वापस घर लौट आया। कुछ देर बाद दीपा दूध का गिलास लेकर आया। सुखचैन अभी भी अचम्भे में बैठा था।
''चाय का अब कौन सा टाइम है ? रोटी ले आता।''
''नहीं, यह तो दूध है। रोटी भी खा लेना, थोड़ी देर ठहर जा।'' मौसी का बेटा बोला।
''पर यार यह क्या चक्कर है। चारों तरफ घुप्प अँधेरा कर रखा है। अन्दर कौन रिश्तेदार आए हुए हैं।'' दूध का घूंट भरते हुए सुखचैन ने पूछा।
''यार क्या बताऊँ। अन्दर खाड़कू सिंह ठहरे हुए हैं।'' दीपा धीमे स्वर में बोला।
''हैं ! खाड़कू !'' सुखचैन के हाथ से गिलास गिरता-गिरता बचा। ''तुमने यार इनसे क्या लेना था।'' सुखचैन ने अफ़सोस सा प्रकट करते हुए कहा।
''हम कौन सा इन्हें बुलाने गए थे। खेत में रहने का यही तो पंगा है।'' दीपा आहिस्ता-आहिस्ता बातें कर रहा था।
''फिर ये यहाँ कैसे आ गए ?'' दूध खत्म कर सुखचैन ने गिलास एक तरफ रख दिया। फिर कम्बल ओढ़कर बैठ गया।
''असल में, सच पूछता है तो खेतों में रहने वाले तो सूली पर टंगे पड़े हैं। ये हरेक खेत में डेरा लगाए बैठे हैं।''
रोटी खाने के बाद धीमे-धीमे बातें करते हुए वे सो गए। सवेरे मुँह-अँधेरे उठकर सुखचैन तैयार होने लगा। तैयार होने के बाद चाय का कप पीकर वह चलने ही लगा था कि दीपा हाँफता हुआ उसके पास आ खड़ा हुआ। सुखचैन ने प्रश्नभरी नज़रों से उसकी तरफ देखा।
''तुझे यार उनमें से एक मिलना चाहता है।'' दीपा ने घबराहट -सी में कहा। सुखचैन का ऊपर का साँस ऊपर और नीचे का नीचे ही रह गया। वह दीपा के पीछे-पीछे घर के अन्दर एक छोटी-सी कोठरी में चला गया। अन्दर कोई आदमी कम्बल ओढ़े बैठा था। दीपा सुखचैन को कोठरी के दरवाजे तक छोड़ कर बाहर से ही लौट गया। उसे हिदायत भी यही मिली थी। कोठरी के अन्दर घुसते ही सुखचैन की आँखें फटी की फटी रह गईं। सामने बाबा बसंत बैठा था। दोनों एक-दूसरे से पूरे जोश से जफ्फी डालकर मिले।
''बाबा तू ? नहीं सॉरी, बाबा जी तुम ?'' सुखचैन पीछे हटता हैरानी में बोला।
''अरे यार, मैं कोई बहुत बड़ी हस्ती तो नहीं बन गया। तू मुझे बाबा ही कह। मुद्दत के बाद कोई अपना मिला है।'' बाबा ने दुबारा सुखचैन को बांहों में भर लिया।
''बाबा शुक्र है। बड़ी खुशी हुई तुझे देखकर। उस समय तो कुछ और ही बात उड़ी थी।'' आगे सुखचैन चुप हो गया।
''कौन सी ?'' बाबा अनजान बना बोला।
''कहते थे, लुधियाना में मीटिंग के दौरान ही सारे लड़के...।'' सुखचैन कहते कहते पुन: चुप हो गया।
''बस ! कुछ बढ़ी हुई थी कि मैं वहाँ से बच निकला या फिर शायद उस गद्दार को सबक सिखाने के लिए बच गया था। सारे पंजाब की खाक छान मारी, पर वह मुझे नहीं मिला। पता नहीं, किस पाताल में जा छिपा है।'' बाबा गहरी सोच में डूबा हुआ बोला।
''यार, सभी दोस्त-मित्र चले गए। गुरलाभ का भी कोई पता नहीं किधर गया। कहते हैं, वह भी उसी मीटिंग में था। किस्मत का कैसा खेल है।'' सुखचैन सहज ही बोला। जिस गद्दार की बात बाबा बसंत ने कही थी, सुखचैन को लगा वह किसी पुलिस वाले को लेकर है जो पार्टी में दाख़िल होकर सबको फंसा गया होगा।
बाबा ने सुखचैन को अन्दर बुलाया ही इसलिए था कि उसे शायद गुरलाभ के बारे में कुछ पता हो। बाबा बसंत ही जानता था कि रेड हाउस वाला भयानक कांड गुरलाभ की गद्दारी के कारण ही घटित हुआ था। बाद में उसे पुलिस इंस्पेक्टर रणदीप और गुरलाभ की मिली-भगत का भी पता लग गया था। लुधियाना छोड़ने के बाद वह लगातार गुरलाभ की तलाश में घूम रहा था। गद्दारी की सजा देने के अलावा बाबा बसंत यह भी सोचता था कि जो आतंक गुरलाभ ने लुधियाना में फैलाया था, वैसा ही वह जगह-जगह फैला रहा होगा। इसीलिए गुरलाभ को खत्म करना ज़रूरी था। जैसे ही उसने सुखचैन के मुँह से सुना कि गुरलाभ का भी कोई पता नहीं तो उसने आगे की पूछताछ अपने अन्दर ही दबा ली।
''बाबा, लहर अब किधर को जा रही है ?'' सुखचैन ने न चाहते हुए भी व्यर्थ-सा प्रश्न पूछ लिया।
''सुखचैन, मेरा तो लहर से कोई लेना-देना नहीं था। मैं तो उस वक्त हॉस्टल में पड़े छापे के दौरान पकड़ा गया था। मैं निर्दोष था पर पुलिस ने मेरे पर अंधा अत्याचार किया। मेरे घरवालों को बेइज्ज़त करने में पुलिस ने कोई कसर नहीं छोड़ी। मेरे भाई और पिता को पुलिस ने मुठभेड़ दिखा कर मार दिया। फिर तू ही बता, मेरे पास कौन सा राह बचा था। बाहर रहते को पुलिस मार देती, इसलिए मैं भूमिगत हो गया। मैं अभी तक सिर्फ़ पुलिस वालों के साथ ही लड़ रहा हूँ। जितनी भी ज़िन्दगी शेष बची है, बस इसी काम पर लगानी है। जहाँ तक तेरा सवाल है कि लहर किधर जा रही है, वह तो यह है कि जिन लड़कों ने लहर शुरू की थी, वे सब मारे जा चुके हैं। अब तो दूसरी-तीसरी कतार के लड़के लहर को चला रहे हैं जिनका कोई लक्ष्य नहीं है। ज्यादातर जरायमपेशा लोग लहर में आ घुसे हैं जिनका मकसद लहर के नाम पर सिर्फ़ पैसा कमाना है। पुलिस भी ऊपर होती जा रही है। पुलिस ने अपने आदमी जिन्हें कैट कहते हैं, लहर में उतार दिए हैं। मुझे लगता है कि लहर अपनी समाप्ति की ओर बढ़ रही है।''
''और जो कहते थे कि यह जद्दो-जहद कौम का अलग घर बनाने के लिए चल रही है ?'' सुखचैन ने एक और सरसरी-सा सवाल किया।

''कोई भी लहर या संघर्ष चलता है लोगों के साथ मिलकर चलने से। तू देख ले कि इस लहर के साथ कितने भर लोग हैं। पुलिस और खाड़कुओं से तंग आए आम लोगों का जीना दूभर हुआ पड़ा है। जब लोग ही इस लहर के हक में नहीं तो लहर चलेगी कैसे। सच पूछे तो यदि लोग एकजुट हो जाएँ तो फिर ए.के. सैंतालीस की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। इस वक्त लोगों की इस लहर से कोई हमदर्दी नहीं। मतलब साफ़ है कि जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह लहर चल रही है, लोगों को वो लक्ष्य नहीं चाहिए। लहर का बिखर जाना और लोगों का इससे दूर भागना इस बात की गवाही है कि लोग जैसे रह रहे हैं, वैसे ही खुश हैं। लोग नहीं चाहते कोई पृथक कौमी घर। यह मैं नहीं, हालात कह रहे हैं।'' बाबा बसंत ने अपना पक्ष स्पष्ट किया।
''यार, फिर क्या फायदा हुआ इतनी मारा-मारी का ?'' सुखचैन निराश-सा बोला।
''फायदा ! फायदा तो बहुत हुआ, पर यह फायदा हुआ कुछ खास लोगों को ही। वैसे तो सब पुलिस वाले भी बुरे नहीं। पुलिस में भी बहुत अच्छे और ईमानदार आदमी हैं। ऐसे ही खाड़कुओं में भी बहुत से लड़के अपने काम के प्रति वफ़ादार और ईमानदार हैं। इस वक्त कुछ मौकापरस्त लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने इस लहर के चलते पैदा हुए हालातों का जी भरकर फायदा उठाया है और उठा रहे हैं। पुलिस में कुछ व्यक्ति हवलदारों से एस.एस.पी. बने बैठे हैं। ऐसे मौकापरस्त पुलिस अफ़सरों ने पता नहीं कितने लड़कों की लाशों के ढेर लगाकर ये स्टार हासिल किए हैं। ऐसे ही कुछ खाड़कुओं ने लूट-खसोटों और फिरौतियों से अंधा पैसा बनाया है। कई पुलिस के मुख्बिरों ने मौके का बहुत लाभ उठाया है। कई गाँवों में भी बड़े लोगों ने लड़कों को पकड़वा कर बहुत ईनाम लिए हैं। लड़कों के मारे जाने पर उनका रुपया-पैसा भी ऐसे लोगों के पास ही रह जाता है। तू ही देख ले कि अगर खाड़कू मरते हैं तो भी सिक्ख ही मरते हैं, और अगर आम पुलिस वाले मरते हैं तो वे भी सिक्ख ही हैं। सिक्खों के हाथों सिक्खों को मरवाकर अवसरवादी सरकार दोनों हाथों लड्डू खा रही है।'' बाबा क्रोध में था। वह चुप हो गया।
''चल छोड़ यार लहर को। तू अपना सुना, क्या हाल है ?'' बाबा ने बात का रुख मोड़ा।
''मेरा तो ठीक ही है। डिप्लोमा पूरा हो गया था। अब इधर-उधर इंटरव्यू के लिए घूमता फिरता हूँ। कल फरीदकोट इंटरव्यू में ही गया था। एक काम पर वर्क-इंचार्ज लगा हुआ हूँ।'' सुखचैन ने बताया।
''चल अच्छा है। तू तो लग किसी कोठी में ओवरसियर।''
''देखते हैं, क्या होता है।'' सुखचैन उठते हुए बोला, ''अच्छा बाबा, फिर मिलेंगे कभी, अब मैं चलता हूँ।''
''किस्मत वाला है जो इस राह से बचा रहा। एक-दो बातें मेरी ध्यान से सुन ले। एक तो दुबारा यहाँ मत आना। तुझे नहीं पता, अपने कालेज के हर लड़के के पीछे सी.आई.डी. लगी रहती है। दूसरा, मुझे तो मिल लिया, पर आगे किसी दूसरे खाड़कू के करीब से भी न गुजरना। अपनी यह मुलाकात का यहीं भोग डाल देना। अच्छा, रब राखा।''
उठकर चलता हुआ सुखचैन एक पल के लिए रुका। उसके मन में आया कि बाबा इतनी अच्छी बातें कर रहा था, इसे कहकर देखूँ कि भाई उसकी मौसी का घर छोड़कर कहीं और ठिकाना बना ले।
''बाबा, एक बात और करनी है।''
''हाँ, बता।''
''यह यार, मेरी मौसी का घर है। ये बड़े शरीफ से बन्दे हैं...।''
''हाँ सुखचैन, यह बहुत शरीफ परिवार है। माता तो हमें बेटों की तरह समझती है। अब तेरे आने के कारण तो हमारा यहाँ रहना और भी आसान हो गया।'' सुखचैन की बात बीच में ही पकड़कर बाबा बसंत ने उसका कुछ और ही मतलब निकाल लिया। 'ये नहीं हिलते अब यहाँ से' मन में सोचते हुए सुखचैन कोठरी से बाहर निकल गया था।
(जारी…)
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