Sunday, May 23, 2010

धारावाहिक उपन्यास



बलि
हरमहिंदर चहल
(गतांक से आगे...)

चैप्टर- 11(प्रथम भाग)

एस.एस.पी. जमना दास वाले एक्शन ने खाड़कुओं का हाथ फिर ऊपर कर दिया था। जमना दास के नित्य के झूठे मुकाबलों ने खाड़कुओं को निराश कर दिया था। इतने बड़े अफसर को उसके ही दफ्तर में खत्म करके खाड़कुओं ने अपनी धाक जमा दी थी। अब खाड़कुओं के एक्शन फिर बढ़ने लगे थे। गमदूर के संगठन 'कमांडो फोर्स' में नए लड़के धड़ाधड़ आ रहे थे। सब चढ़ती कला में थे। अब किसी चीज़ की फिक्र नहीं थी, पर हथियारों की कमी बहुत महसूस हो रही थी। पिछले चक्कर में कमांडो फोर्स हथियार नहीं खरीद सकी थी। कमांडो फोर्स के पास पूरे पैसे नहीं थे। लेकिन अगले चक्कर में गमदूर हर हालत में हथियार खरीदना चाहता था। पैसों के प्रबंध के लिए एक अलग किस्म का एक्शन उसके दिमाग में आ चुका था। उसे अभी तक यह पक्के तौर पर पता नहीं लग सका था कि अगली सप्लाई कब तक आ रही थी। वह उसी हिसाब से अपना एक्शन करना चाहता था। गमदूर ने महिंदर को किसी गुप्त स्थान पर भेज रखा था जहाँ उसने आने वाली हथियारों की सप्लाई के बारे में बात करनी थी। बाहर पदचाप सुनकर गमदूर सावधान हो गया। महिंदर आहिस्ता से दरवाजा खोल कर पास रखी कुर्सी पर आ बैठा। गमदूर महिंदर के मुँह से कुछ सुनने को उतावला था।
''कैसे ? कोई बात बनी ?'' गमदूर ने स्वयं ही पूछ लिया।
''हाँ, बात तो हो गई, पर साला रौब यूँ झाड़ता है जैसे कि हम उसके गुलाम हों।''
''किसकी बात करता है तू ?'' गमदूर थोड़ा हैरान हुआ।
''अरे, उसी साले कर्नल महिताब अली की...।''
''क्यों, क्या कहता है ?''
''कहता है, तुमने पिछली बार हथियार नहीं खरीदे। अब आगे मैं तुम्हारा एतबार कैसे करूँ।''
''एतबार तो उसका बाप भी करेगा।'' गमदूर का चेहरा थोड़ा सख्त हो गया।
''वह क्यों भई ?'' महिंदर हल्का-सा मुस्कराया।
''जैसे हथियार खरीदना हमारी ज़रूरत है, वैसे ही हथियार बेचना उनकी भी ज़रूरत है।''
''तेरा मतलब है पैसे कमाने के लिए ?''
''अरे नहीं, पैसा इतने बड़े पाकिस्तान के लिए क्या चीज़ है।''
''और फिर उनकी कौन सी ज़रूरत हुई ?'' महिंदर के चेहरे पर सवाल उतरा।
''दरअसल उनका भी एक एजेंडा है। अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए वह हमारी लहर को इस्तेमाल करना चाहते हैं।''
''तेरा मतलब है, वे हमारे सच्चे हमदर्द नहीं हैं ?''
''नहीं, दरअसल वह तो हिंदुस्तान की चीरफाड़ करके बंगलादेश वाला हिसाब चुकता करना चाहता है।''
''फिर...?''
''फिर क्या ! हमें इस वक्त किसी भी बाहरी शक्ति की बहुत ज्यादा ज़रूरत है। किसी के मन में जो चाहे हो, पर हमें हर किस्म की बाहरी मदद को अपनी लहर के लिए इस्तेमाल करना है। दूसरा कोई राह भी तो नहीं।''
''यह तो वह बात हो गई कि खरगोश अपने दाव को और कुत्ता अपने दाव को।'' महिंदर हँसा।
''इससे बड़ी सच्चाई क्या हो सकती है कि जिनके साथ अपना जन्म-जन्मांतरों का वैर है, वही आज दरियादिली दिखाते हुए हमें यह जता रहे हैं कि हम ही तुम्हारे सबसे बड़े हमदर्द हैं।'' गमदूर अपनी ही रौ में बोला।
''चल, वे जो चाहे समझें, पर हम तो सबकुछ जानते ही हैं न।'' महिंदर ने तसल्ली-सी में सिर हिलाया।
''यह कहा तो बहुत कहा, हम तो सवेर-शाम ऐलान करते हैं कि कोई किसी को राज नहीं देता या दिलाता, राज तो अपने हाथों लेना पड़ता है।''
''मैं कहता हूँ, बात ही कोई नहीं, राज तो हम छाती के ज़ोर पर ले लेंगे।'' महिंदर जोश में उठ खड़ा हुआ।
''ले, बात तो वहीं रह गई। फिर फैसला क्या हुआ ?'' गमदूर कर्नल महिताब अली की हथियार सप्लाई वाली बात पर लौट आया।
''उसने भाई अब टाइम दिया है तीन हफ्तों का। कहता है, पैसे जल्दी भेजो क्योंकि अगली सप्लाई तीन हफ्तों बाद आनी है।''
''तीन हफ्ते...।'' गमदूर ने मन में हिसाब-किताब-सा लगाया। उसे ख़याल आया कि तब तक तो उसका सोचा हुआ एक्शन पूरा हो जाएगा और उसे पैसे पहुँचा दिए जाएँगे।
''वह साला बौना है बड़ा तेज।'' महिंदर फिर बोला।
''कौन ?''
''अरे, वही कर्नल महिताब अली और कौन ।''
''तूने उसे कब देखा ?'' गमदूर अभी भी महिंदर की ओर हैरानी से देखे जा रहा था।
''वो लाहौर के पश्चिम की तरफ एक ट्रेनिंग कैम्प नहीं, क्या नाम है उसका। हाँ सच, कोटली कैम्प। मैं भी रहा हूँ वहाँ कुछ समय।'' इसके बाद दोनों में से कोई भी इस मसले पर नहीं बोला।
''अरे हाँ, आज तो मीटिंग है।'' गमदूर ने बात का रुख बदला।
''कहाँ ?''
''डिप्लोमा वाले हॉस्टल में।''
''चल फिर चलें। देर किस बात की।'' गमदूर और महिंदर ने बाहर आकर ऑटो लिया और डिप्लोमा वाले हॉस्टल की तरफ चल पड़े।
सभी उन्हीं की प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछेक इधर-उधर की बातों के बाद मीटिंग की कार्रवाई शुरू हो गई। मीटिंग आरंभ हुए बमुश्किल दसेक मिनट हुए होंगे कि नाहर बाहर से तेजी से अन्दर आया और उसने गमदूर के कान में कुछ कहा। गमदूर के चेहरे पर घबराहट आ गई।
''सभी ध्यान से सुनो।'' गमदूर ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा।
''अन्दर से ख़बर मिली है कि जानकी दास के केस के समय जो बसवाला एक्शन किया था, उसमें कुछ गड़बड़ हो गई। बस एक्शन वाली जगह से पुलिस को डिप्लोमा वाले इस हॉस्टल के बारे में कोई कागज-पत्र मिला है। अब समझो, पुलिस इस हॉस्टल को घेरेगी। तुम सब यहाँ से तितर-बितर हो जाओ। तीन दिन बाद एक नंबर कोठी में मिलूँगा।''
गमदूर की बात सुनते ही सभी लड़के पलछिन में हॉस्टल से निकल गए। दो-चार मिनट में ही सभी खाड़कू लड़के वहाँ से जा चुके थे।
सवेरे चार बजे हॉस्टलों पर पुलिस ने छापा मारा। डिप्लोमा वाला हॉस्टल और डिग्री के हॉस्टलों को पुलिस ने अच्छी तरह से घेर लिया। दिन चढ़े कालेज अथॉरिटी को संग लेकर हॉस्टलों की तलाशी शुरू हुई। किसी भी हॉस्टल में से कोई असला या हथियार नहीं मिला। जो लड़के हॉस्टलों में से गैर-हाज़िर थे, उनका क्या किया जाए। कमरों के अलॉटमेंट वाली लिस्ट लाई गई। उसके अनुसार जिस जिस कमरों के लड़के गैर हाज़िर मिले, पुलिस ने उनकी सूची बना ली। अधिक केस डिप्लोमा वाले हॉस्टल के ही थे। पुलिस ने कालेज अथॉरिटी से बात की तो कालेज अथॉरिटी ने इस बारे में कोई ठोस जवाब नहीं दिया। फिर पुलिस ने अपने ढंग से इन्कुआरी की तो हॉस्टल में से गुरमीत, मीता, गुरलाभ, तेजा पंडित और अजैब पुलिस के शक के घेरे में आ गए। इसके अलावा पुलिस ने शक के आधार पर अन्य कई लड़कों को उठा लिया जिनमें बाबा बसंत भी था। उनका कई दिन तक टार्चर होता रहा। पर उनमें से कोई भी खाड़कुओं से संबंधित नहीं था। धीरे-धीरे वे सभी छूट गए पर बाबा बसंत का पंगा पड़ गया। उसकी सचाई और उसका मुँहफट होना ही उसकी दुश्मन बन गई।
''तेरी तो शक्ल ही खाड़कुओं जैसी है। बता, एक्शन कैसे किया था।'' उसे टार्चर करने वाला कोई गैरसिख अफ़सर था।
''देखो, मैं अपने गुरू का पक्का अमृतधारी सिक्ख हूँ। न मैं झूठ बोलता हूँ, न मुझे झूठ बोलने की ज़रूरत है। एक अमृतधारी सिक्ख न किसी को तकलीफ देता है, न चोरियां-डाके और कत्लेआम करता है। मुझे तुम्हारी बातों की कोई जानकारी नहीं।''
उस पर बहुत जुल्मोसितम हुआ। लेकिन न तो उसका किसी गलत काम से वास्ता था, न ही वह गलत व्यक्तियों को जानता था। उसका पूर्ण सिक्खी स्वरूप ही अफ़सर को उसका खाड़कु होना लगता था। आठ-दस दिन के टार्चर से वह तो मर ही चला था यदि उसके घरवाले बड़ी सिफारिशें लगाकर उसे न छुड़वाते। पुलिस की मार ने उसे चारपाई से लगा दिया।
उधर कमांडो फोर्स ने अपने पहले एक्शन को अंजाम दिया। एक ही रात में इलाके के पंद्रह-बीस डाकखानों को आग लगा दी। पुलिस हलकों में खलबली मच गई। उससे अगले हफ्ते ज़िले के अनेक रेलवे स्टेशनों को आग लगा दी। अगले दिनों में किसी न किसी बस को अगवा करके एक ही सम्प्रदाय के लोगों को गोलियों से भून दिया गया। पुलिस ने दिन रात एक कर दिया लेकिन पल्ले कुछ नहीं पड़ा। इन एक्शनों के बाद फिर नई कोठी में बैठक हुई। हॉस्टल में जाने का तो अब प्रश्न ही नहीं रहा था। यह कोठी भी पिछले दिनों गुरलाभ ने किराये पर ली थी। जिन लड़कों को पुलिस ने हॉस्टल से उठाकर टार्चर किया था, उनमें से आधे लड़कों को समझा-बुझा कर कमांडो फोर्स में ले आया गया था। बाबा बसंत को भी सन्देश भेजा गया था पर उसने कोई जवाब नहीं दिया था। लड़कों की संख्या तो बढ़ रही थी पर हथियार अभी भी कम थे।
''अपने दोनों एक्शन बहुत कामयाब रहे हैं। एक काम खराब हो गया।''
''वह क्या ?''
''यह जो बसों में से उतारकर यात्रियों को मारा गया है, यह एक्शन गलत है। मुश्किल यह है कि यह पता नहीं चल रहा कि यह काम कौन सी जत्थेबन्दी कर रही है।'' गमदूर ने सभी की ओर देखा। सभी एक दूसरे का मुँह देखते रहे पर गुरलाभ की तरफ किसी ने नहीं देखा। वह अन्दर ही अन्दर संतुष्ट-सा हो गया।
''एक और ख़बर है जिसे मैं तुम्हारे संग साझा करना चाहता हूँ कि अपनी जो सुपर बाडी है, वह दो-फाड़ हो गई है। कोई उसूलों के मतभेद थे। चलो, हमें इस बात से क्या लेना है। हम अब मत्तेवाला ग्रुप के साथ हैं। अपनी हैड अथॉरिटी मत्तेवाला कमेटी है।''
''फिर तो हो सकता है, दूसरी पार्टी वाले हमें बदनाम करने के लिए ये कत्लेआम कर रहे हों।'' गुरलाभ को नुक्ता मिल गया था।
''अभी कुछ कह नहीं सकते। खोजबीन कर रहे हैं। बाकी, बड़ा एक्शन नज़दीक आ रहा है। तैयारियाँ मुकम्मल हैं। उस एक्शन के बाद अपनी पावर बढ़ जाएगी। फिर मंजिल दूर नहीं रहेगी।''
बाबा बसंत ने अपने तौर पर ही हथियारों का प्रबंध किया। दो लड़के भी साथ मिला लिए। पहले हल्ले में ही उसने उस थाने पर हमला किया जहाँ उसे उत्पीड़ित किया गया था। थाने के गेट में से निकलते चार जने -एक इंस्पेक्टर, दो सिपाही और एक हवलदार वहीं ढेरी हो गए। हमला इतना जबरदस्त था कि जवाब देने के बजाय पुलिस वाले थाने का गेट बन्द करके अन्दर जा छिपे। जिसके लिए वह आया था, वह इंस्पेक्टर मुंकदी लाल उस दिन छुट्टी पर था। बाबा बसंत को बहुत अफ़सोस हुआ कि उसका हमला बेकार गया। उसे पता चला कि वह दो-तीन दिन की छुट्टी पर था। उसने एक योजना और बनाई। रात के अंधेरे में उसने उसके घर पर जाकर हमला बोला। यहाँ भी बाजी मिस हो गई। मुकंदी की जगह उसका भाई मारा गया। बाबा बसंत का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसने तो सोचा था कि चुपचाप मुकंदी का मामला खत्म करके फिर से कालेज जाना आरंभ कर देगा। आसपास खाड़कुओं के एक्शन हुए जाते थे, उसका एक्शन भी बीच में मिल जाएगा। किसी को क्या पता चलेगा कि मुकंदी को बाबा बसंत ने मारा है। पहली बार उससे गलत स्थान पर गोली चल गई। दूसरी बार गलत आदमी मारा गया। तीसरे हमले तक तो उसका ग्रुप भी बन चुका था। उसे खुद को पता नहीं चल रहा था कि वह किधर किस दिशा में जा रहा था। एक्शन करते समय उसे गुस्सा घेर लेता था। उस दिन थाने के बाहर वह और उसके साथी घात लगाकर मुकंदी की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसे भ्रम हुआ और बग़ैर कुछ सोचे-विचारे दूसरे ही चार पुलिस वाले मार गिराये। मुकंदी के गाँव गया। गलती से उसका भाई मारा गया। मुकंदी तो हत्थे नहीं चढ़ा था पर बाबा बसंत को हालात ने पूरी तरह खाड़कू बना दिया था।
मुकंदी भी भाई के क़त्ल के बाद पागल हाथी की तरह घूमता-फिरता था। उसने बसंत के घर छापा मारा। और कोई नहीं मिला तो उसने बसंत की माँ और बहन को ही उठा लिया।
''डाल लो ओए बूढ़ी को लम्बा।'' मुकंदी लाल चिंघाड़ा पर सिपाही बुजुर्ग़ औरत को कुछ कहने से झिझक रहे थे। वह दीवार का आसरा लेकर नीचे जमीन पर बैठ गई। फिर मुकंदी का ध्यान लड़की की ओर गया। जवान लड़की थर्र-थर्र काँप रही थी।
''इसे ले आओ ओए यहाँ।'' वह गरजा।
''इसे नंगा करो हराम की जायी को...।'' कोई आगे न बढ़ा।
मुकंदी लाल यहाँ भी नहीं रुका। उसने आगे बढ़कर लड़की की कमर के पास से सलवार पकड़कर खींची। नाड़ा टूट गया। सलवार लड़की के पैरों में आ गिरी। लड़की ने झुककर सलवार ऊपर उठाकर दोनों हाथों से कसकर पकड़ ली। फिर मुकंदी ने लड़की की कमीज पकड़कर खींची। बायीं बगल से उधड़ती कमीज कंधे से जा लगी। अन्दर से मुंशी देसराज शर्मा दौड़ता हुआ आया। उसने मुकंदी लाल के घुटने पकड़ लिए।
''साहब जी, रब का वास्ता। आपकी मैं मिन्नत करता हूँ। रहम करो।'' देसराज से निर्दोष जवान लड़की की बेइज्ज़ती सहन न हुई। मुकंदी ने जलती आँखों से देसराज शर्मा की तरफ देखा। हाथवाला डंडा दीवार पर दे मारा। ''कह दो बाबा बसंत को, आज रात उसकी बहन के साथ मुकंदी सुहागरात मनाएगा।'' पता नहीं उसने यह किसे सुना कर कहा। मुंशी ने अन्दर से चादर लाकर धीरे से लड़की के ऊपर डाल दी। उधर बाबे ने मुकंदी लाल के रिश्तेदार उठा लिए। दबाव में आकर मुकंदी को बाबा बसंत की माँ और बहन को छोड़ना पड़ा। मुकंदी बाबा को खोज रहा था और बाबा मुकंदी को। दोनों एक दूजे के खून के प्यासे थे। दोनों के दिलों में नफरत की लपटें उठ रही थीं। पर उनकी नफ़रत का खामयाजा भुगत रहे थे - दोनों के रिश्तेदार। इन्हीं दिनों में मुकंदी से डरते-छिपते बाबा बसंत के भाई और पिता मुकंदी लाल के हाथ लग गए। कई दिनों के अत्याचार के बाद उन दोनों को एक मुकाबला बनाकर खत्म कर दिया। बाबा का गुस्सा शिखरों को छूने लगा। उसे पकड़ने के लिए पुलिस ने जगह-जगह जाल बिछा रखे थे। लेकिन बाबा किसी के हाथ नहीं आ रहा था। बाबे का परिवार मुकंदी ने खत्म कर दिया था। उसकी माँ और बहन ही बाकी बची थीं। उनकी थाने में हुई बेइज्ज़ती का भी बाबा बसंत को पता था। वह यह भी जानता था कि मुकंदी अवसर मिलते ही फिर उन्हें उठा लेगा। उनकी इज्जत पर हाथ डालेगा। बाबा जल्द से जल्द मुकंदी का अन्त करना चाहता था। अगर पुलिस ने बाबा के लिए जगह-जगह जाल बिछा रखा था तो बाबा ने भी मुकंदी को उड़ाने के लिए पूरा ज़ोर लगा रखा था। अहमदगढ़ मंडी के थाने में से पुलिस की सुरक्षा टुकड़ी निकली। मुकंदी लाल के साथ सिक्युरिटी बहुत ज्यादा रहती थी। बेगुनाह या गुनाहगारों के झूठे पुलिस मुकाबले बनाने वालों में उसका नंबर सबसे ऊपर था। पुलिस की भरी एक गाड़ी उसके आगे थी और एक पीछे। बीच की गाड़ी में मुकंदी सबके बीचोबीच बैठा था। अगली गाड़ी सायरन बजाती हवा से बातें करती जा रही थी। जैसे ही गाड़ियाँ अड्डे से बाहर निकलीं तो पीछे किसी चौबारे पर से दो हवाई फायर हुए। बाबा बसंत और उसके साथियों ने हथियार उठा लिए। अड्डे से कुछ दूर वे ईख के खेत में बैठे थे। यहाँ चारों तरफ सुनसान था। सड़क के दोनों तरफ ईख के खेत थे। एक ओर के ईख के खेत में बाबा अपने साथियों के संग बहुत देर से बैठा था। दो फायरों की आवाज़ सुनते ही बाबा और उसके साथी समझ गए कि मुकंदी दूसरी गाड़ी में था। वे भागते हुए सड़क के बिलकुल साथ आ बैठे। दूर से आती गाड़ियाँ उन्होंने देख लीं। बाबा की हिदायत थी कि हमला दूसरी गाड़ी पर ही किया जाए। दूसरी गाड़ी सामने आई तो सभी ने हाथों में पकड़े हथगोले गाड़ी पर फेंके और पीछे की ओर दौड़ पड़े। अगले पल धमाकों ने धरती हिला दी। पिछली गाड़ी रुकने में कामयाब हो गई। उन्होंने गाड़ी को बैक किया और थाने की तरफ दौड़ा ली। अगली गाड़ी तेज होने के कारण आगे निकल गई थी। मुकंदी वाली गाड़ी के परखचे उड़ गए। भरी गाड़ी में से एक भी न बचा। मुकंदी का खातमा करके बाबा बसंत नाचता-कूदता अपने अड्डे की ओर लौट गया।
(जारी…)
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Sunday, May 16, 2010

धारावाहिक उपन्यास



बलि
हरमहिंदर चहल
(गतांक से आगे...)

चैप्टर- 10

पहले तय किए गए प्रोग्रोम के अनुसार कालेज लगने से अगले दिन मीता के कमरे में मीटिंग हुई। पीछे से गुरलाभ ने क्या किया, इस बारे में मीता को कोई पता नहीं था। उसने जो दो अन्य कोठियाँ बाहर ले ली थीं, उसका यह काम मीता को भी पसंद आया। इस मीटिंग में लगभग पन्द्रह लड़कों ने भाग लिया। प्रधानगी गमदूर ने की। काफी समय विचार-विमर्श करने के बाद कुछ अहम फैसले हुए। सबसे पहली बात यह थी कि नई भर्ती बढ़ाई जाए। गमदूर का कहना था कि यहाँ हर लड़का अपना अपना ग्रुप तैयार करे जिसके लिए हर कोई तीन-तीन नए लड़के तलाश करे। ग्रुप चार लोगों का होना चाहिए। कमांडर-इन-चीफ़ गमदूर को बनाया गया। बाकी सभी को जनरलों के ओहदे दिए गए। अब हर एक जनरल ने अपना ग्रुप बनाना था। इस तरह भर्ती बढ़ा कर फिर एक्शन तेज किए जाएँ।
''भाई जी, इतने बन्दों के लिए हथियार कहाँ से आएँगे ?'' गुरलाभ का सवाल था।
''तुम जितने भी नये आदमी तैयार कर सकते हो, करो। मैं ऐसे एक्शन की रूपरेखा बना रहा हूँ जिससे हथियारों की खरीद का काम हो।''
''पर तब तक खाली बैठे रहें ?''
''नहीं, खाली तो नहीं बैठ सकते।''
''देखो न, सारी छुट्टियों में पहले ही एक्शन बन्द रहे। अब भी काम ढीला ही है। मेरी सलाह यह है कि भाई, अपनी पार्टी का लोगों पर दबदबा बना रहना चाहिए। वह काम एक्शन से ही होगा।''
''चलो, उसके बारे में भी करते हैं विचार। पर एक बात मैं सभी सिंहों को कहना चाहता हूँ कि हमने कोई ऐसा एक्शन नहीं करना जिससे लोग खाड़कुओं से टूटने लगें। हम कामयाबी लोक लहर बना कर ही हासिल कर सकते हैं। हमने लोगों को अपने संग जोड़ना है, न कि तोड़ना।''
''गलत काम करने वाले की सज़ा ही भाई जी गोली रखो। जो गोली दुश्मन के लिए, वही गोली गलत काम करने वाले अपने बन्दों के लिए।'' यह सलाह जब गुरलाभ ने दी तो जीता फौजी ने घूर कर उसकी तरफ देखा।
''चलो इस पर भी विचार कर लेंगे। फिलहाल, अपना-अपना ग्रुप और अपने-अपने अड्डे बनाओ। अगले हफ्ते बहुत ज़रूरी काम आ रहा है।''
''वह क्या ?''
''उसके बारे में अवसर आने पर ही बताया जाएगा। सभी तैयार रहें।''
गुरलाभ ने जो एक्शन कुम्हार मंडी में से लोगों को उठाकर किया था, उस बारे में पुलिस अभी कुछ नहीं कर सकी थी। इतना बड़ा कांड हो जाए और पुलिस चुप होकर बैठी रही ! इस केस ने केन्द्र सरकार तक की तारें हिला दी थीं। मौजूदा एस.एस.पी. को बदलकर उसके स्थान पर नया एस.एस.पी. लगाया गया। नाम उसका जमना दास था पर लोग उसे जमना कसाई के तौर पर जानते थे। उसने अपने हाथों सैकड़ों दोषी-निर्दोषी लड़के झूठे पुलिस मुकाबलों में मारे थे। उसने आते ही लुधियाना शहर की सड़कों को कंपा दिया था। जहाँ पर वह कांड हुआ था, वे खेत हड़म्बा रोड पर पड़ते गाँव मणसपुरे के थे। लुधियाना आने के दो दिन बाद ही उसने भारी पुलिस फोर्स लेकर गाँव मणसपुर को घेर लिया। स्पीकर पर बोलकर सारे गाँव को स्कूल में इकट्ठा किया गया। क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या बूढ़ी स्त्रियाँ, किसी को भी घर में रहने का हुक्म नहीं था। जमना दास का हुक्म था कि खाड़कू इनके घरों में छिपा करते थे, इसलिए सारे घरों की तलाशी ली जाए। खाली पड़े घरों की सी.आर.पी. और स्थानीय पुलिस ने तलाशी ली। खाड़कू तो कोई नहीं मिला पर जो कुछ नगदी या जेवरात मिला, सब पुलिस की जेब में चला गया। जमना दास यू.पी. का रहने वाला था। वह सी.आर.पी. फोर्स में से इधर पंजाब पुलिस में डेपुटेशन पर आया था। उसे न मौजूदा हालातों का पता था, न पंजाबी कल्चर के बारे में कोई जानकारी थी। अपनी जानकारी के मुताबिक वह पंजाब के सारे सिखों को खाड़कू समझता था। उसे ऐसे खराब हालातों पर नियंत्रण करने का कोई ढंग-तरीका नहीं आता था। यदि कुछ आता था तो वह था अत्याचार, पुलिस टार्चर। गाँव की तलाशी होते दस बज गए थे। गाँव वाले स्कूल में भूखे-प्यासे बन्द किए हुए थे। तलाशी से फुर्सत पाकर वह गाँववालों पर गरजा-
''सालो बताओ, उन माँ के यारों को कहाँ छिपा रखा है ?''
''अरे पंचायत कहाँ है ?'' क्रोध में उसके मुँह से थूक निकल रही थी। सरपंच हाथ बांधकर पंचायत के आगे खड़ा था।
''धी के यार, तू क्या सरपंची करता है रे।'' उसने डंडा सरपंच के कंधे पर मारा।
''जनाब, हम सौगंध खाते हैं, हमें उनके बारे में कुछ पता नहीं है और न ही वे हमारे गाँव के हैं।'' एक बुजुर्ग व्यक्ति आगे बढ़ा।
''तेरे धी के खसम और कहाँ के थे।'' उसने आगे बढ़कर बुजुर्ग आदमी को गिरा लिया। उसके कपड़े फाड़ दिए। दाढ़ी नोंच ली। केस पकड़कर घसीटा। पैर की ठोकरें मारीं। मुँह पर बूट का ठुड्डा मारकर सारे दाँत तोड़ दिए। बुजुर्ग का मुँह लहुलूहान हो गया। जो भी थोड़ा-बहुत बोलता था, उसकी वह बुरी हालत करता था।
''अरे, ये ऐसे नहीं मानेंगे। इनकी लड़कियों के कपड़े उतारो।''
एक बड़ी उम्र के सरदार एस.पी. ने आगे बढ़कर मिन्नत की, “सर, प्लीज़ यह मत करो।”
जमना दास ने एस.पी. की ओर घूरा, पर जो कुछ करने जा रहा था, उसे रोक दिया।
''जितने भी नौजवान हैं, सभी को पकड़ लो।''
सी.आर.पी. वाले लड़कों को धक्के मार कर ट्रकों पर चढ़ाने लगे।
''इन सबको मैं गोलियों से उड़ाऊँगा। फिर मैं सी.आर.पी. के जवानों को तुम्हारी औरतों पर चढ़ाऊँगा। सिख पैदा होने बन्द कर दूँगा। तुम्हारी नस्ल नहीं बदल दी तो मेरा नाम जमना दास नहीं।''
दिन भर पुलिस के अत्याचार गाँव पर होते रहे। पचास के करीब लड़कों को यातनागृहों में ले जाकर मछली की तरह तड़फाया गया। यूनिवर्सिटी के जिन दस-बारह लड़कों को पकड़ा हुआ था, उन सभी को जमना दास ने झूठे मुकाबले में मार दिया। नए पकड़े गए लड़कों में से कुछ तो पुलिस की यातनाओं को न सह पाने के कारण प्राण त्याग गए। कुछ को पुलिस ने गोलियों से उड़ा दिया। शेष पर पुलिस-अत्याचार जारी था। यह थी जमना दास, एस.एस.पी. की इन्कुवारी जो कि फिरोजपुर से तबादला होकर इधर आया था।
जमना दास के कारनामों के कारण एक स्पेशल मीटिंग एक नंबर कोठी में बुलाई गई थी। सभी लड़के रोष में थे।
''अगर ऐसे ही जुल्म-सितम होता रहा, तो हम क्या कर रहे हैं ?''
''हमारी बहन-बेटियों को वे नंगा किए किए जा रहा है, हम बैठे देखे जा रहे हैं।''
''ओए, वो तो कहता है, मैं सिख पैदा होने ही बन्द कर दूँगा।''
हर एक अपना-अपना गुस्सा उगल रहा था। गमदूर सभी को शान्त करवाते हुए बोला, ''देखो, मैं चुप नहीं बैठा। जिस दिन से उसने जुल्मों की आंधी शुरू की है, मैं भी उसके पीछे ही घूम रहा हूँ। किसी खास काम के लिए नाहर की डयूटी लगाई थी। यह अपना काम पूरा करके आज पूरी रिपोर्ट ले आया है। सभी भाई शान्त रहो। आज उसका प्रबंध करके ही हिलेंगे किसी तरफ।''
''प्लैन क्या है ?''
गमदूर आसपास देखता हुआ बोला, ''पहली कतार के सभी नेता यहाँ मौजूद हैं। इसलिए हमें प्लैन बताने में कोई झिझक नहीं। जब यह जमना दास फिरोजपुर में था तो वहाँ इसका एक ही खास यार था। वह है जिउणखेड़े का सरपंच। यह गाँव फिरोजपुर के साथ ही पड़ता है। नाहर की इन्कुआरी के अनुसार उस सरपंच की बड़ी बेटी मुलांपुर के नज़दीक राजाआली ब्याही हुई है। उसका काफी बड़ा परिवार है। अपने प्लैन की पहली चाल यह है कि उस सारे परिवार को उठाकर यहाँ अपने अड्डे पर लाना है। अगली कार्रवाई मैं उसके बाद बताऊँगा।''
''यह परिवार उठाने का काम मैं करूँगा।'' गुरलाभ उठकर खड़ा हो गया।
गमदूर ने पलभर गुरलाभ की तरफ देखा। फिर सहमति दे दी। रात के ग्यारह बजे गुरलाभ ने उस परिवार को लाकर तीन नंबर कोठी में ठूँस दिया। लेकिन गुरलाभ की मनोकामना पूरी न हुई। जो कुछ उस परिवार में से मिलने की उसने उम्मीद लगाई थी, वह नहीं मिला था, पर एक्शन उसने सही कर दिखाया था। उधर दूसरा ग्रुप रात के करीब दो बजे जिउणखेड़े के सरपंच को लेकर पहुँचा। उसकी आँखों पर से जब पट्टी उतारी गई तो उसके होश उड़ गए। सभी लड़कों ने अपने-अपने मुँह पर कपड़ा बांध रखा था, ''ये तेरे रिश्तेदार सभी सही-सलामत बैठे हैं। अगर तूने हमारा हुक्म न माना तो सभी की लाशें मिलेंगी।'' उन्होंने सरपंच की फिर आँखें बांध दी। यूनिवर्सिटी के पीछे किसी कोठी में ले जाकर गमदूर के सामने पेश किया। बेटी का परिवार बचाने के लिए वह खाड़कुओं का हुक्म मानने को तैयार हो गया। गमदूर ने उसे प्लैन समझाया। उसकी जमना दास के साथ गहरी दोस्ती थी। वे हर उल्टे-सीधे काम के साझी थे।
''देखो, वह एतिहात बहुत बरतता है। सारा दिन दफ्तर में से नहीं निकलता। दफ्तर में फोर्स से घिरा रहता है।'' सरपंच उसके भेद बताने लगा।
''तू उसके दफ्तर में किसी भी वक्त जा सकता है ?'' गमदूर मन में योजना बना रहा था।
''हाँ, इसमें कोई शक नहीं। वह हो या न हो, मुझे उसके दफ्तर में जाने से कोई नहीं रोकता। सभी मुझे जानते हैं।''
''तुम मौज मस्ती के लिए आमतौर पर किस वक्त बैठा करते हो ?''
''शाम को चार बजे के बाद। फिर चाहे जो भी टाइम हो जाए, वहीं रहते हैं क्योंकि उसकी कोठी भी पीछे की तरफ साथ ही है। दफ्तर से उठकर दूसरी तरफ का दरवाजा पार कर वह कोठी के अन्दर चला जाता है।''
''बात यह है कि चार बजे से पहले उसे दो घंटों के लिए दफ्तर से बाहर निकालना है। उसकी गैर-हाज़िरी में तुझे एक आदमी को अन्दर लेकर जाना है।''
सरपंच ने ऊपर की ओर देखते हुए मुँह बनाया। उसकी समझ में कुछ नहीं आया कि यह क्या करना चाहता है। कुछ सोचते हुए उसने सुझाव दिया, ''तुम ही उसे बाहर निकाल सकते हो।''
''वह कैसे ?''
''बाहर नज़दीक ही कोई वारदात कर दो। वह मौका देखने के लिए जाएगा। फिर लौट आएगा।'' सरपंच को जमना दास की आदत का पता था। गमदूर कुछ देर बैठा सोचता रहा। ''इसे उड़ाने के लिए कुछ मोल तो देना ही पड़ेगा।'' गमदूर मन ही मन प्लैन बनाने लगा। कुछ देर तक गमदूर ध्यानमग्न बैठा सोचता रहा। फिर उसने अपना प्लैन सरपंच को समझा दिया। ''हमारी तेरे परिवार से कोई दुश्मनी नहीं। ना ही तेरे से है। जैसे ही इसका घोड़ा चित्त हो गया, सभी को घर पहुँचा देंगे।'' सरपंच भी समझे बैठा था कि यह जो कुएँ में ईंट गिरी है, वह सूखी नहीं निकलने वाली। दूसरी ओर बेटी का सारा परिवार सूली पर चढ़ा हुआ था। उधर टाइम देखकर गुरलाभ ने कार स्टार्ट कर दी। नहर की पटरी उतरकर जी.टी. रोड पर चढ़ गया। इस एक्शन को करने का जिम्मा भी उसने ही लिया था। ऐसा एक्शन करने को तो वह कब से उतावला था। टूटी हुई लोकल बस उसके आगे-आगे जा रही थी। कुछ दूर जाकर बस लिंक रोड पर हो गई। गुरलाभ ने भी कार उस तरफ मोड़ ली। आगे जैसे ही ड्रेन का पुल आया, कार को आगे लगाकर उन्होंने बस रुकवा ली। अर्जन उछलकर ड्राइवर की बगल में बैठ गया। बस को ड्रेन की पटरी पर उतार लिया। थोड़ा आगे उजाड़-सी जगह पर जाकर कार भी रुक गई। बस को भी रोक लिया।
गुरलाभ ए.के. 47 लेकर बस में सामने वाली खिड़की से चढ़ा।
''हाँ, सारे मोने नीचे उतरो। बाकी घुटनों में सिर देकर झुक जाओ।'' बस में कौओं की कांय-कांय-सी मच गई।
दो और जने राइफलें लिए बस में चढ़े गए। गुरलाभ ने धमकाया तो किस्मत के मारे नीचे उतरने लगे। देखते-देखते सात-आठ लोग नीचे उतर गए। समय कम था। बग़ैर देखे-परखे गुरलाभ ने गोलियों की बौछार की। सभी ढेरी हो गए। एक्शन करने के बाद उन्होंने भागने की सोची।
सरपंच दो बजे के करीब ही एस.एस.पी. जमना दास के पास आकर बैठ गया था। एक बार चाय भी आ चुकी थी। वे करीब बैठकर बातें कर रहे थे। कभी वे किसी बात पर खुलकर हँसते और कभी घुसुर-फुसुर सी करने लगते। साहब बीच में उठकर कोठी की तरफ चला गया। उसकी अनुपस्थिति में सरपंच ने कूलर की तारें काट दीं। जब जमना दास अन्दर का चक्कर लगाकर लौटा तो ठंडक की जगह आग बरस रही थी।
''यह क्या हुआ ?'' उसने हैरान होकर कूलर की तरफ देखा।
''पता नहीं जी, चलते-चलते एकदम गरम हवा फेंकने लग पड़ा। मुझे लगता है, मोटर जल गई।''
''इसे भी अभी जलना था।'' उसके माथे पर पसीना उतर आया।
''आप कहो तो अभी ठीक करवा दूँ। यहीं नज़दीक ही है, मैं जानता हूँ एक मैकेनिक को।''
''यार यह तो करना ही पड़ेगा।''
तभी, फोन की घंटी बजी। जमना दास के फोन सुनते ही माथे पर त्यौरियाँ उभर आईं। वह टोपी सिर पर रखकर उठने लगा।
''क्यों जी, क्या हुआ ?''
''उन माँ के यारों ने बस में से निकालकर लोगों को मार दिया। आओ, अभी आ जाएंगे। मौका तो देखना ही पड़ेगा।''
''आप ऐसा करो, मौका अकेले देख आओ। मैं आपके लौटते तक कूलर ठीक करवा लेता हूँ।''
''यह भी ठीक रहेगा।''
''इन सिक्युरिटी वालों को कह दो, मेरे साथ मैकेनिक अन्दर आएगा। कहीं उसे बाहर ही न रोके रखें।''
''अरे कोई बात नहीं।'' वह चलते-चलते सिक्युरिटी वालों से बोला, ''ये सरपंच साहब किसी मिस्त्री को लाएंगे कूलर ठीक करने के लिए, उसे जाने देना।''
गाडियाँ सायरन बजातीं पास से गुजरीं तो गमदूर स्कूटर स्टार्ट करके सरपंच को लेकर पहले से तय की गई जगह पर पहुँच गया। वहाँ से उन्होंने बक्सा और औजार उठाये और लौटकर एस.एस.पी. के दफ्तर आ गए। सिक्युरिटी वाले बातों में लगे हुए थे। सरपंच के साथ कौन था और उसके पास क्या था, किसी ने ध्यान भी नहीं दिया। कारण, सरपंच सारा दिन तो वहाँ साहब के पास घूमता रहता था। और अब जाते समय, साहब कह गया था कि कोई कूलर ठीक करने आ रहा है।
एस.एस.पी. के कमरे में जाकर गमदूर फटाफट अपने काम में लग गया। सरपंच का कलेजा ज़ोरों से ऊपर-नीचे हो रहा था। पता नहीं आज क्या होगा। लोग ठीक ही कहते हैं कि पुलिस वालों के संग यारी बुरी होती है। वह अपने मन में ताने-बाने बुने जा रहा था। गमदूर ने बीसेक मिनट में सब कुछ तैयार कर दिया। सामान तो पहले ही डिब्बे में तैयार था। बस, कूलर में फिट ही करना था। उसने कूलर का स्विच उखाड़कर अपने डिब्बे का स्विच वहाँ लगा दिया।
''ले भई सरपंचा, काम हो गया। अब जैसे ही जमना कसाई अन्दर आए तो तू इस स्विच से कूलर ऑन कर देना।'' स्विच की तरफ इशारा करता गमदूर उसे समझा रहा था। सरपंच यूँ झांक रहा था मानो अपनी मौत के यम की तरफ देख रहा हो।
''अब, एक दो बातों का विशेष ख़याल रखना। एक तो जब तक वह अन्दर न आ जाए, स्विच ऑन न करना। दूसरा, स्विच ऑन करके तू किसी न किसी बहाने दफ्तर से बाहर निकल जाना। बाद में ऐसा कुछ होगा कि किसी को पता ही नही चलेगा कि जमना दास को क्या हो गया।''
गमदूर बहका कर सरपंच का मन किसी दूसरी तरफ मोड़ रहा था। वैसे तो स्विच दबाने की ही देर थी कि...
बाहर निकलते समय सरपंच ने दफ्तर को ताला लगा कर चाबी जेब में डाल ली जैसा कि वह अक्सर किया करता था। वे दोनों बाहर निकले। गेट पर आकर सरपंच ने गमदूर को भेज दिया। वह स्वयं वहाँ खड़े होकर पुलिस वालों से बातें करने लगा। इतने में सायरन की आवाज़ सुनी। साहब वापस लौट रहे थे। गाड़ी में से उतरता साहब सरपंच की ओर चल पड़ा।
''क्या कूलर ठीक हुआ ?''
''हाँ जी, थोड़ा सा नुक्स था। अब तो ठीक काम करता है।''
''तो चलो आओ, दफ्तर में चलते हैं।''
''सालों ने बड़ी बेरहमी से मारा लोगों को। तुम देखना, मैं कैसी आंधी लाता हूँ कल। सभी को आग लगा दूँगा। लोग यूँ ही तो नहीं मुझे जमना कसाई कहते।'' वह गुस्से में बोले जा रहा था।
सरपंच ने आगे बढ़कर दफ्तर का ताला खोला। दरवाजा खोलकर दोनों अन्दर चले गए। साहब ने टोपी उतारकर मेज पर रख दी। ''चलो, अब जल्दी स्विच ऑन करो।'' इतना कहकर साहब भी कूलर के समीप आ खड़ा हुआ। वह चाहता था कि कूलर चलने पर करीब होने से ठंडी हवा उसे जल्दी लगे। सरपंच सोच रहा था कि स्विच ऑन करूँ और बाथरूम जाने का बहाना बनाकर बाहर निकलूँ। उसने ज्यों ही स्विच को हाथ लगाकर थोड़ा-सा हिलाया तो इतना जबरदस्त धमाका हुआ कि धरती हिल गई। कमरे की छत उनके ऊपर आ गिरी। हर तरफ गर्दोगुबार छा गया। बाहर वाले पुलिस वालों को कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि यह क्या हुआ था। सब तरफ हफरा-तफरी मच गई। डरे-सहमे पुलिस वाले इधर-उधर भाग रहे थे। काफी देर बाद उन्हें पता चला कि बम्ब धमाका हुआ था। धीरे-धीरे जब धूल-गर्दा कम हुआ तो मानवी अंग छोटे-छोटे टुकड़ों में कटे हुए दूर-दूर तक बिखरे पड़े थे। कहीं सरपंच की उंगली पड़ी थी तो कहीं साहब का हाथ पड़ा था। मिनट-सेकेंड में सबकुछ मिट्टी हो गया था। उधर सरपंच की बेटी के परिवार को उसके घर ठीक ठाक पहुँचा दिया गया। उन्हें बताया गया कि सरपंच गलती से लपेट में आ गया। साथ ही समझाया गया कि वे होंठ सी लें। इधर पुलिस सोच-विचार में लगी थी पर उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि सरपंच ने जानबूझ कर मरने की क्यों ठानी। क्योंकि यह तो साबित हो गया था कि जो आदमी कूलर ठीक करने आया था, उसने ही बम्ब फिट किया था। सरपंच उसे जानता था इसलिए सरपंच को बम्ब के बारे में पता था। लेकिन यह पता नहीं चल रहा था कि सरपंच ने यह आत्महत्या वाला कदम क्यों उठाया। कुछ दिन बाद यह घटना पुरानी हो गई। अब हर रोज़ इससे भी बड़ी-बड़ी घटनाएँ हो रही थीं।
(जारी…)
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