Sunday, August 1, 2010

धारावाहिक उपन्यास



बलि
हरमहिंदर चहल
(गतांक से आगे...)

चैप्टर- 16
डिप्लोमा पूरा होते ही सुखचैन ने सुख का साँस लिया था। कालेज में तो आठों पहर सिर पर तलवार लटकती रहती थी कि पता नहीं किस वक्त, क्या हो जाए। कभी खाड़कू हड़ताल की धमकी देते थे, सरकार हड़ताल फेल करने का यत्न करती थी। कभी कहीं कोई कार्रवाई हो जाती, कभी कहीं। जब से वह हर रोज़ गाँव आने लगा था, तब से यही खतरा रहता था कि कभी शाम के समय अँधेरा होने पर कोई बस ही अगवा न हो जाए। गाँव से सुधार तक वह आता भी हर रोज़ साइकिल पर ही था। शाम को अँधेरा होने पर गाँव की ओर जाते हुए भय सताता रहता था कि पता नहीं कब कोई ए.के. सैंतालीस लेकर सामने आ खड़ा हो। वे कौन-सा दूर, बाहर से आए थे। वे तो उसके सहपाठी और उसके आसपास के गाँवों के ही लड़के थे। उसने देखा था कि डिप्लोमा खत्म होने तक उसकी कक्षा आधी रह गई थी। बाकी के सब लड़के खाड़कू दलों में जा मिले थे। इनमें से आधे के करीब मारे जा चुके थे। शेष बचे हुओं ने इधर उधर आतंक फैलाया हुआ था। उसके जैसे ज़रूरतमंद और दूर की सोचने वाले लड़के ही आखिर लगे थे। उसके घरवालों को उससे भी ज्यादा चिंता थी। वे कहाँ जानते थे कि कालेज में क्या हो रहा था। उन्हें तो सदैव यही खतरा रहता था कि ऐसे बुरे हालातों में कहीं लड़के का पैर किसी गलत दिशा की ओर न फिसल जाए। रब-रब करते उन्होंने भी तीन साल बड़ी मुश्किल से पूरे किए थे। डिप्लोमा समाप्त होते ही वह घर आ गया था। रिजल्ट अभी दो महीने बाद आना था। इतनी देर उसने खेत का कामधंधा संभाला। उसका छोटा भाई देबा भी सुधार कालेज में जाने लग पड़ा था। छोटे बहन-भाई भी ऊपर की कक्षाओं में पहुँच गए थे। घरवालों को अब यही था कि शीघ्र नतीजा निकले, उसे कहीं नौकरी मिले तो ज़रा हाथ खुला हो।
सुखचैन का पड़ोसी पंडितों का लड़का ही रिजल्ट का पता लेकर आया था। सुखचैन तो लौटकर कालेज गया ही नहीं था। फर्स्ट डिवीजन में पास होना उसके लिए बड़ी खुशी की बात थी। डिप्लोमा का सर्टिफिकेट तो मिल गया था, पर अब उसे आगे यह पता नहीं चल रहा था कि नौकरी कहाँ और कैसे खोजे। इस मसले का हल भी उसके पड़ोसी चाचा पंडित पूरन चंद ने किया। उसकी बदली मुक्तसर की हो गई थी। दो-चार हफ्तों बाद वह गाँव लौट आता था।
''सिफारिश की तो ज़रूरत शायद न ही पड़े। लड़के के नंबर अच्छे हैं और ऊपर से सिविल के ओवरसियरों की मांग भी है।''
''देख सुखचैन, पहले तो तू ऐसा कर कि हर बड़े शहर के रोज़गार दफ्तर में अपना नाम लिखा आ। जब भी कहीं कच्चे ओवरसियरों की ज़रूरत पड़ती है, वे लोकल रोज़गार दफ्तरों से ही ले लेते हैं। चार-पाँच महीने कहीं कच्ची नौकरी मिल जाएगी। फिर जब कहीं सरकार ने पक्की पोस्टें निकालीं, फिर वहाँ भर्ती भी हो जाएगा। और फिर यह कच्ची नौकरी तजुर्बे का काम भी करेगी।''
''एक रास्ता मैं और भी बताता हूँ।''
''सरकार ने एक नया प्रोजेक्ट शुरू किया है। वह है ये छोटी-बड़ी नहरें पक्की करने का। यह महकमा नहर विभाग का ही हिस्सा है। बहुत जगह काम शुरू भी हो गए हैं। हर एक काम पर एक वर्क-इंचार्ज की ज़रूरत होती है। वैसे तो दस पढ़ा कोई भी लड़का वर्क-इंचार्ज लग जाता है, पर तूने तो कोर्स किया हुआ है। यह साथ ही अपने गाँव के नज़दीक मेरा एक दोस्त ओवरसियर छोटी नहर पक्की करवा रहा है। अगर कहे तो तुझे वहाँ वर्क-इंचार्ज रखवा देता हूँ। चार पैसे भी मिलेंगे, और फिर तजुर्बा भी होगा।''
''चाचा जी, मैं तैयार हूँ।'' सुखचैन तुरन्त बोला।
''चल फिर कल को दसेक बजे ढोलण वाले पुल पर आ जाना। वो ओवरसियर वहीं होगा।''
नौकरी का पहला दिन सुखचैन को बहुत बढ़िया लगा। नौकरी वर्क-इंचार्ज की थी। उसकी नौकरी की शुरूआत ही थी। लेवल करने का सारा काम सुखचैन ने संभाल लिया। दिनोंदिन वह प्रोजेक्ट और अन्य कामों की ओर भी ध्यान देने लगा। वह हर रोज़ सवेरे आठ बजे गाँव से साइकिल पर जाता था। नौ बजे पहुँचकर काम शुरू कर देता था। पाँच बजे काम बन्द करवाकर वह घर को वापस लौट जाता था। ओवरसियर को मौज आ गई। पहले उसे खुद सवेरे नौ बजे काम पर पहुँचना पड़ता था। फिर सारा दिन वहाँ बिता कर वह पाँच बजे लौटता था। उसके अन्य कई काम भी सुखचैन ने संभाल लिए। जहाँ एक तरफ ओवरसियर को जिम्मेदारियों से छुटकारा मिला, वहीं सुखचैन को काम का अनुभव हो रहा था। महीना पूरा होने पर जब सुखचैन को पहली तनख्वाह मिली तो उसे अत्यंत खुशी हुई। उसके परिवार के लिए भी यह दिन खुशियों से भरा दिन था। अच्छे दिनों की शुरूआत होने लगी थी। लगता था कि इस घर में पक्के तौर पर पाँव जमाये बैठी गरीबी के यहाँ से रुखसत होने के दिन आ गए थे। बीच बीच में जब कभी काम बन्द होता तो वह कहीं न कहीं जाकर रोज़गार दफ्तर में नाम दर्ज क़रवा आता था।
तीन महीनों के बाद उसको पहली बार बठिंडे के रोज़गार दफ्तर से ओवरसियर की नौकरी के लिए चिट्ठी मिली। वह बड़े ज़ोशोखरोश से इंटरव्यू के लिए गया। उसकी इंटरव्यू तो हुई, पर नौकरी सिफारिशियों को ही मिली। उस दिन पहली बार उसे धक्का लगा। उसे लगा जैसे डिप्लोमा का सर्टिफिकेट सिर्फ़ कागज का टुकड़ा मात्र हो। टूटे हुए मन से उसने वापस जाकर वर्क-इंचार्ज की नौकरी शुरू कर दी। इस बीच सीवरेज बोर्ड में स्थायी नौकरियाँ निकलीं। बेउम्मीदी से उसने यहाँ भी अर्जी भेज दी। कुछ समय बाद वहाँ इंटरव्यू भी दे आया। चारेक महीने में दो तीन बार किसी न किसी रोज़गार दफ्तर की ओर से उसे इंटरव्यू की चिट्ठी आती थी। उसने देखा कि किराया खर्च करने के अलावा और कुछ नहीं होता था। वर्क-इंचार्ज की नौकरी करते हुए उसे छह-सात महीने हो गए थे। फिर उसे फरीदकोट के रोज़गार दफ्तर से ओवरसियर की नौकरी के लिए बुलाया आया। जहाँ जाना था, वह जगह बहुत दूर थी। वह सवेरे जल्दी ही चल पड़ा। फरीदकोट अड्डे पर पहुँचकर उसने ऑटो लिया। शहर से बाहर नहर कालोनी पहुँच गया। वहाँ उम्मीदवारों की लम्बी लाइन लगी हुई थी। दफ्तर बन्द होने तक बड़ी मुश्किल से उसकी बारी आई। जिन्हें नौकरी पर रखना था, उन्हें तो पहले ही रख लिया गया था। निराश सुखचैन वापस बस अड्डे पर पहुँचा। इधर उधर घूमते हुए उसने सामने सादिक की ओर जाने वाली बस खड़ी देखी। सादिक के करीब ही उसकी मौसी का गाँव था। वह सादिक वाली बस में बैठ गया। सादिक पहुँचते दिन छिप चुका था। उसे मौसी के गाँव को जाने वाला टैम्पू मिल गया। सादिक फाजिल्का रोड पर सादिक से सात-आठ किलोमीटर जाकर यह गाँव आता था- मल्ल सिंह वाला। वहीं सुखचैन की बड़ी मौसी ब्याही हुई थी।
गाँव के अड्डे पर उतरकर सुखचैन मौसी के खेत वाली राह पर पैदल ही चल पड़ा। थोड़ी दूर जाकर वह ड्रेन की पटरी पर हो लिया। रात उतर आई थी। आसपास बियाबान जंगल और सुनसान था। कहते थे कि इन गाँवों में तो दिन छिपते ही लोग घरों में ताले लगा लेते थे। गाँव के लोग भय और खौफ़ में रातें बिताते थे। इस इलाके में खाड़कुओं का पूरा ज़ोर था। दिन छिपते ही उनका राज शुरू हो जाता था। लोग डरते थे कि पता नहीं कब किसके घर का दरवाजा आ खटखटाएँगे और पता नहीं क्या मांग करेंगे। पुलिस तो इधर दिन के समय ही कहीं आती थी। वह भी लोगों को उठाकर पैसे उगाहने के लिए। एक तरह से ये सारा इलाका ही पुलिस और खाड़कुओं का बन्दी बना हुआ था। रात में खाड़कू और दिन में पुलिसवाले मनमर्जी करते थे। उसे आसपास से भय आया। ख़यालों में मग्न सुखचैन मौसी के घर के पास जा पहुँचा। उसे कुछ बेचैनी-सी हुई। घर अँधेरे में डूबा हुआ था। वह काफ़ी दूर ही था जब उसके कदमों की आहट सुनकर कुत्ता भौंकने लगा। फिर उसने घर की तरफ से कोई आता हुआ देखा। सुखचैन जहाँ था, वहीं खड़ा हो गया। ''कौन है ?'' घर की ओर से आने वाले ने दूर से ही पूछा। सुखचैन ने आवाज़ पहचान ली थी। यह उसकी मौसी का छोटा लड़का दीपा था। ''मैं सुखचैन हूँ, मलकपुर से।'' सुखचैन प्रत्युत्तर में बोला। ''अच्छा, सुख। पर तू इस वक्त किधर से ?'' मौसी का बेटा करीब आते हुए बोला।
फिर दोनों ने एक दूजे से मिलते हुए हाथ मिलाया। मौसी के बेटे दीपे ने वहीं से ऊँचे स्वर में बोलकर घरवालों को बताया, ''सब ठीक है, यह तो सुख है।'' दीपा उसे घर से बाहरवाली बैठक की ओर ले चला। ''इधर किधर, घर नहीं जाना ?'' सुखचैन ने हैरानी में पूछा। ''नहीं, हम इधर ही सो जाएँगे। उधर ठीक नहीं।'' आगे आगे जाते हुए दीपा बोला।
''ठीक नहीं। क्या मतलब ?'' सुखचैन उसके व्यवहार से हैरान था।
''बाकी सबकुछ बाद में बताऊँगा। अभी इतना ही बहुत है कि उधर कुछ रिश्तेदार आए हुए हैं।'' इसके बाद दीपा ने चुप्पी धारण कर ली। सुखचैन को चुपचाप बाहरवाली बैठक में बिठाकर वापस घर लौट आया। कुछ देर बाद दीपा दूध का गिलास लेकर आया। सुखचैन अभी भी अचम्भे में बैठा था।
''चाय का अब कौन सा टाइम है ? रोटी ले आता।''
''नहीं, यह तो दूध है। रोटी भी खा लेना, थोड़ी देर ठहर जा।'' मौसी का बेटा बोला।
''पर यार यह क्या चक्कर है। चारों तरफ घुप्प अँधेरा कर रखा है। अन्दर कौन रिश्तेदार आए हुए हैं।'' दूध का घूंट भरते हुए सुखचैन ने पूछा।
''यार क्या बताऊँ। अन्दर खाड़कू सिंह ठहरे हुए हैं।'' दीपा धीमे स्वर में बोला।
''हैं ! खाड़कू !'' सुखचैन के हाथ से गिलास गिरता-गिरता बचा। ''तुमने यार इनसे क्या लेना था।'' सुखचैन ने अफ़सोस सा प्रकट करते हुए कहा।
''हम कौन सा इन्हें बुलाने गए थे। खेत में रहने का यही तो पंगा है।'' दीपा आहिस्ता-आहिस्ता बातें कर रहा था।
''फिर ये यहाँ कैसे आ गए ?'' दूध खत्म कर सुखचैन ने गिलास एक तरफ रख दिया। फिर कम्बल ओढ़कर बैठ गया।
''असल में, सच पूछता है तो खेतों में रहने वाले तो सूली पर टंगे पड़े हैं। ये हरेक खेत में डेरा लगाए बैठे हैं।''
रोटी खाने के बाद धीमे-धीमे बातें करते हुए वे सो गए। सवेरे मुँह-अँधेरे उठकर सुखचैन तैयार होने लगा। तैयार होने के बाद चाय का कप पीकर वह चलने ही लगा था कि दीपा हाँफता हुआ उसके पास आ खड़ा हुआ। सुखचैन ने प्रश्नभरी नज़रों से उसकी तरफ देखा।
''तुझे यार उनमें से एक मिलना चाहता है।'' दीपा ने घबराहट -सी में कहा। सुखचैन का ऊपर का साँस ऊपर और नीचे का नीचे ही रह गया। वह दीपा के पीछे-पीछे घर के अन्दर एक छोटी-सी कोठरी में चला गया। अन्दर कोई आदमी कम्बल ओढ़े बैठा था। दीपा सुखचैन को कोठरी के दरवाजे तक छोड़ कर बाहर से ही लौट गया। उसे हिदायत भी यही मिली थी। कोठरी के अन्दर घुसते ही सुखचैन की आँखें फटी की फटी रह गईं। सामने बाबा बसंत बैठा था। दोनों एक-दूसरे से पूरे जोश से जफ्फी डालकर मिले।
''बाबा तू ? नहीं सॉरी, बाबा जी तुम ?'' सुखचैन पीछे हटता हैरानी में बोला।
''अरे यार, मैं कोई बहुत बड़ी हस्ती तो नहीं बन गया। तू मुझे बाबा ही कह। मुद्दत के बाद कोई अपना मिला है।'' बाबा ने दुबारा सुखचैन को बांहों में भर लिया।
''बाबा शुक्र है। बड़ी खुशी हुई तुझे देखकर। उस समय तो कुछ और ही बात उड़ी थी।'' आगे सुखचैन चुप हो गया।
''कौन सी ?'' बाबा अनजान बना बोला।
''कहते थे, लुधियाना में मीटिंग के दौरान ही सारे लड़के...।'' सुखचैन कहते कहते पुन: चुप हो गया।
''बस ! कुछ बढ़ी हुई थी कि मैं वहाँ से बच निकला या फिर शायद उस गद्दार को सबक सिखाने के लिए बच गया था। सारे पंजाब की खाक छान मारी, पर वह मुझे नहीं मिला। पता नहीं, किस पाताल में जा छिपा है।'' बाबा गहरी सोच में डूबा हुआ बोला।
''यार, सभी दोस्त-मित्र चले गए। गुरलाभ का भी कोई पता नहीं किधर गया। कहते हैं, वह भी उसी मीटिंग में था। किस्मत का कैसा खेल है।'' सुखचैन सहज ही बोला। जिस गद्दार की बात बाबा बसंत ने कही थी, सुखचैन को लगा वह किसी पुलिस वाले को लेकर है जो पार्टी में दाख़िल होकर सबको फंसा गया होगा।
बाबा ने सुखचैन को अन्दर बुलाया ही इसलिए था कि उसे शायद गुरलाभ के बारे में कुछ पता हो। बाबा बसंत ही जानता था कि रेड हाउस वाला भयानक कांड गुरलाभ की गद्दारी के कारण ही घटित हुआ था। बाद में उसे पुलिस इंस्पेक्टर रणदीप और गुरलाभ की मिली-भगत का भी पता लग गया था। लुधियाना छोड़ने के बाद वह लगातार गुरलाभ की तलाश में घूम रहा था। गद्दारी की सजा देने के अलावा बाबा बसंत यह भी सोचता था कि जो आतंक गुरलाभ ने लुधियाना में फैलाया था, वैसा ही वह जगह-जगह फैला रहा होगा। इसीलिए गुरलाभ को खत्म करना ज़रूरी था। जैसे ही उसने सुखचैन के मुँह से सुना कि गुरलाभ का भी कोई पता नहीं तो उसने आगे की पूछताछ अपने अन्दर ही दबा ली।
''बाबा, लहर अब किधर को जा रही है ?'' सुखचैन ने न चाहते हुए भी व्यर्थ-सा प्रश्न पूछ लिया।
''सुखचैन, मेरा तो लहर से कोई लेना-देना नहीं था। मैं तो उस वक्त हॉस्टल में पड़े छापे के दौरान पकड़ा गया था। मैं निर्दोष था पर पुलिस ने मेरे पर अंधा अत्याचार किया। मेरे घरवालों को बेइज्ज़त करने में पुलिस ने कोई कसर नहीं छोड़ी। मेरे भाई और पिता को पुलिस ने मुठभेड़ दिखा कर मार दिया। फिर तू ही बता, मेरे पास कौन सा राह बचा था। बाहर रहते को पुलिस मार देती, इसलिए मैं भूमिगत हो गया। मैं अभी तक सिर्फ़ पुलिस वालों के साथ ही लड़ रहा हूँ। जितनी भी ज़िन्दगी शेष बची है, बस इसी काम पर लगानी है। जहाँ तक तेरा सवाल है कि लहर किधर जा रही है, वह तो यह है कि जिन लड़कों ने लहर शुरू की थी, वे सब मारे जा चुके हैं। अब तो दूसरी-तीसरी कतार के लड़के लहर को चला रहे हैं जिनका कोई लक्ष्य नहीं है। ज्यादातर जरायमपेशा लोग लहर में आ घुसे हैं जिनका मकसद लहर के नाम पर सिर्फ़ पैसा कमाना है। पुलिस भी ऊपर होती जा रही है। पुलिस ने अपने आदमी जिन्हें कैट कहते हैं, लहर में उतार दिए हैं। मुझे लगता है कि लहर अपनी समाप्ति की ओर बढ़ रही है।''
''और जो कहते थे कि यह जद्दो-जहद कौम का अलग घर बनाने के लिए चल रही है ?'' सुखचैन ने एक और सरसरी-सा सवाल किया।

''कोई भी लहर या संघर्ष चलता है लोगों के साथ मिलकर चलने से। तू देख ले कि इस लहर के साथ कितने भर लोग हैं। पुलिस और खाड़कुओं से तंग आए आम लोगों का जीना दूभर हुआ पड़ा है। जब लोग ही इस लहर के हक में नहीं तो लहर चलेगी कैसे। सच पूछे तो यदि लोग एकजुट हो जाएँ तो फिर ए.के. सैंतालीस की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। इस वक्त लोगों की इस लहर से कोई हमदर्दी नहीं। मतलब साफ़ है कि जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह लहर चल रही है, लोगों को वो लक्ष्य नहीं चाहिए। लहर का बिखर जाना और लोगों का इससे दूर भागना इस बात की गवाही है कि लोग जैसे रह रहे हैं, वैसे ही खुश हैं। लोग नहीं चाहते कोई पृथक कौमी घर। यह मैं नहीं, हालात कह रहे हैं।'' बाबा बसंत ने अपना पक्ष स्पष्ट किया।
''यार, फिर क्या फायदा हुआ इतनी मारा-मारी का ?'' सुखचैन निराश-सा बोला।
''फायदा ! फायदा तो बहुत हुआ, पर यह फायदा हुआ कुछ खास लोगों को ही। वैसे तो सब पुलिस वाले भी बुरे नहीं। पुलिस में भी बहुत अच्छे और ईमानदार आदमी हैं। ऐसे ही खाड़कुओं में भी बहुत से लड़के अपने काम के प्रति वफ़ादार और ईमानदार हैं। इस वक्त कुछ मौकापरस्त लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने इस लहर के चलते पैदा हुए हालातों का जी भरकर फायदा उठाया है और उठा रहे हैं। पुलिस में कुछ व्यक्ति हवलदारों से एस.एस.पी. बने बैठे हैं। ऐसे मौकापरस्त पुलिस अफ़सरों ने पता नहीं कितने लड़कों की लाशों के ढेर लगाकर ये स्टार हासिल किए हैं। ऐसे ही कुछ खाड़कुओं ने लूट-खसोटों और फिरौतियों से अंधा पैसा बनाया है। कई पुलिस के मुख्बिरों ने मौके का बहुत लाभ उठाया है। कई गाँवों में भी बड़े लोगों ने लड़कों को पकड़वा कर बहुत ईनाम लिए हैं। लड़कों के मारे जाने पर उनका रुपया-पैसा भी ऐसे लोगों के पास ही रह जाता है। तू ही देख ले कि अगर खाड़कू मरते हैं तो भी सिक्ख ही मरते हैं, और अगर आम पुलिस वाले मरते हैं तो वे भी सिक्ख ही हैं। सिक्खों के हाथों सिक्खों को मरवाकर अवसरवादी सरकार दोनों हाथों लड्डू खा रही है।'' बाबा क्रोध में था। वह चुप हो गया।
''चल छोड़ यार लहर को। तू अपना सुना, क्या हाल है ?'' बाबा ने बात का रुख मोड़ा।
''मेरा तो ठीक ही है। डिप्लोमा पूरा हो गया था। अब इधर-उधर इंटरव्यू के लिए घूमता फिरता हूँ। कल फरीदकोट इंटरव्यू में ही गया था। एक काम पर वर्क-इंचार्ज लगा हुआ हूँ।'' सुखचैन ने बताया।
''चल अच्छा है। तू तो लग किसी कोठी में ओवरसियर।''
''देखते हैं, क्या होता है।'' सुखचैन उठते हुए बोला, ''अच्छा बाबा, फिर मिलेंगे कभी, अब मैं चलता हूँ।''
''किस्मत वाला है जो इस राह से बचा रहा। एक-दो बातें मेरी ध्यान से सुन ले। एक तो दुबारा यहाँ मत आना। तुझे नहीं पता, अपने कालेज के हर लड़के के पीछे सी.आई.डी. लगी रहती है। दूसरा, मुझे तो मिल लिया, पर आगे किसी दूसरे खाड़कू के करीब से भी न गुजरना। अपनी यह मुलाकात का यहीं भोग डाल देना। अच्छा, रब राखा।''
उठकर चलता हुआ सुखचैन एक पल के लिए रुका। उसके मन में आया कि बाबा इतनी अच्छी बातें कर रहा था, इसे कहकर देखूँ कि भाई उसकी मौसी का घर छोड़कर कहीं और ठिकाना बना ले।
''बाबा, एक बात और करनी है।''
''हाँ, बता।''
''यह यार, मेरी मौसी का घर है। ये बड़े शरीफ से बन्दे हैं...।''
''हाँ सुखचैन, यह बहुत शरीफ परिवार है। माता तो हमें बेटों की तरह समझती है। अब तेरे आने के कारण तो हमारा यहाँ रहना और भी आसान हो गया।'' सुखचैन की बात बीच में ही पकड़कर बाबा बसंत ने उसका कुछ और ही मतलब निकाल लिया। 'ये नहीं हिलते अब यहाँ से' मन में सोचते हुए सुखचैन कोठरी से बाहर निकल गया था।
(जारी…)
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Sunday, July 25, 2010

धारावाहिक उपन्यास



बलि
हरमहिंदर चहल
(गतांक से आगे...)

चैप्टर- 15(शेष भाग)

गुरलाभ दो दिनों से नाहर का पीछा कर रहा था। वह इस ताक में था कि कब वह अकेला हो। आज जब नाहर गमदूर को भेज कर अकेला ही रोटे खाने ग्रीन ढाबे में घुसा तो गुरलाभ ने उचित अवसर समझ कर रणदीप को कॉल कर दी। फिर दस मिनट बाद रणदीप की सिविल पार्टी ने नाहर को ग्रीन ढाबे में से उठा लिया। पाँच सात मिनट में हुए इस ऐक्शन का किसी को पता तक न चला। सिवाय गुरलाभ के।
गुरलाभ कमांडो फोर्स में रहते हुए अब तक बड़े गलत काम करता आया था। यह पहली बार हुआ था कि उसने अपना कोई साथी धोखे से पुलिस को पकड़वा दिया था। उधर थाने में बैठा रणदीप सोच में डूबा था। उसका सारा ध्यान गुरलाभ की गतिविधियों पर ही था। कैसे उस दिन कुछ ही घंटों में उसके भाई की रिहाई हो गई। किस तरह नाहर को दुबारा पकड़ने की स्कीम गुरलाभ ने ही बताई। फिर स्वयं ही आवाज़ बदलकर नाहर को पकड़वा दिया। कहीं गुरलाभ ही तो नहीं....।
इतना सोचते ही रणदीप ने मुख्बिरों का जाल बिछा दिया। शाम को गुरलाभ की सारी रिपोर्ट उसके सामने थी। गुरलाभ कमांडो फोर्स का पहली कतार का लीडर था। कमांडो फोर्स का लीडर होते हुए उसके गलत कारनामों की रिपोर्ट भी उसके सामने थी। सारी स्थिति परखते हुए रणदीप की बांछें खिल उठीं। उसने अपने आप को डी.एस.पी., फिर एस.एस.पी. और आगे डी.आई.जी. बना हुआ देखा।
उधर नाहर को पकड़वा कर गुरलाभ अपने आप को हल्का महसूस कर रहा था। 'गए सारे भेद उसके साथ ही, अब नहीं कोई मेरी हवा की तरफ झांक सकता।' वह अपने आप से बातें कर रहा था। पर वह नहीं जानता था कि वह अपने बुने मकड़जाल में स्वयं ही फंस गया था। इंस्पेक्टर रणदीप के आदमी ने उसे खोजकर, उसे अपने संग लेकर रणदीप की कोठी में जा बिठाया। अब तक रणदीप से अच्छी तरह खुल चुका गुरलाभ घबराया नहीं था। शाम के समय रणदीप ने गहरा प्यार दिखाते हुए उसे संग बिठाकर दो-दो पैग लगाये। कुछ देर पुरानी बातें होती रहीं। फिर जब रणदीप ने देखा कि गुरलाभ भी सुरूर में हो गया था तो उसने बात का रुख एकदम बदल दिया।
''गुरलाभ, सच सच बता भाई, आजकल तू क्या करता है ?'' रणदीप ने एकाएक चोट की।
''मैं ! मैंने क्या करना है। बस, यूँ ही इधर-उधर फिरता नौकरी तलाश रहा हूँ।'' थुथलाता हुआ सा गुरलाभ पहली चोट में ही धराशायी हो गया।
''हम गहरे यार-दोस्त हैं। मुझसे कुछ छिपाना नहीं।'' रणदीप ने उसके चेहरे पर आँखें गड़ा दीं।
''ले, मैंने क्या छिपाना है।'' नज़रें बचाता हुआ गुरलाभ बोला।
''भाई मेरे, अगर मैं यहाँ न होता तो तेरा तो कब का भोग पड़ गया होता। तुझे पता नहीं कि लुधियाने की पूरी सी.आई.डी. तेरे पीछे घूमती है। ये देख रिपोर्टें...'' रणदीप ने सी.आई.डी. की दबिश मारते हुए पेपरों के बंडल उसके सामने फेंक दिए।
गुरलाभ खोई हुई गाय की भाँति पेपरों पर दृष्टि घूमाते हुए मरी-सी आवाज़ में बोला, ''किसकी रिपोर्ट है ये ?''
रणदीप ने कागज उठा कर वे सारे किस्से सुना दिए जिनमें गुरलाभ द्वारा बसों में से उतारकर लोगों का क़त्ल करना, माणसपुर क़त्ले आम और बलात्कारों के साथ-साथ लोगों को अगवा कर लेने के किस्से शामिल थे। ये सब कुछ सुनकर गुरलाभ को पसीना आ गया। उससे बोला नहीं जा रहा था। उसने जेब में से रूमाल निकालकर पसीना पोंछा। फिर पानी का गिलास पीते हुए धीरे-धीरे बोला, ''मैंने तो आगे बढ़कर रणदीप तेरे भाई की रिहाई करवाई, तू तो मेरे पीछे ही लग गया।''
''ओ नहीं भाई मेरे, सी.आई.डी. तो कब से तेरे पीछे लगी है। यह तो तू शुक्र मना भाई कि सी.आई.डी. से यह रिपोर्ट मेरे पास आई है। वैसे तू फिक्र न कर। अगर तूने यारी निबाही है तो मैं भी यारी निभाऊँगा। मैंने तो तुझे यही दिखाया है कि पुलिस को सब पता है।'' रणदीप ने पूरी तरह गुरलाभ को जाल में फंसा लिया।
कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे। फिर रणदीप ही बोला, ''अच्छा, अब एक बात साफ़ बता दे कि तुझे इस लहर से हमदर्दी है ?''
''ना, ऐसी कोई बात नहीं। ना मुझे लहर से और ना ही इन तथाकथित खाड़कुओं से कोई हमदर्दी है। शुरू शुरू में शुगल के तौर पर साथ चलते रहे। फिर गरम-ठंडा खाने का स्वाद पड़ गया। पुलिस के बारे में तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था। मैं तो हमेशा सोचा करता था कि अगर कोई बात हो भी गई तो चंडीगढ़ में मंत्री जी बैठे हैं। खुद संभाल लेंगे।''
''संभालने वाली तो कोई बात नहीं। इस बात को तो तेरा यार रणदीप ही संभाल लेगा। मंत्री जी तक जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।'' रणदीप ने आगे बढ़कर गुरलाभ को आलिंगन में भर लिया। डरे हुए गुरलाभ को कुछ सुकून-सा मिला।
''तुझे लहर से हमदर्दी नहीं। ना ही इसके लीडरों से। तो फिर इन काग़ज़ों को मैं यहीं जला देता हूँ। तू चुपचाप अबोहर चला जा।'' काग़ज़ फाड़ता रणदीप उसे दिलासा देता हुआ बोला।
''मैं तो पहले ही जाने के लिए तैयार बैठा हूँ। तू कहे तो अभी चला जाता हूँ।'' गुरलाभ भी निश्चिंत होता हुआ बोला।
''ऐसी तो कोई बात नहीं। कुछ दिन ठहर। मैं तुझे बताऊँगा भी कि आगे क्या करना है।'' रणदीप उस पर हर तरफ से शिकंजा कसना चाहता था।
''जैसा तू कहे। चल, घूंट भर डाल अब। पहले वाला नशा तो उड़ गया।'' दो दो पैग और पीकर वे फिर झूमने-से लग पड़े।
''देख गुरलाभ, हमारी लड़ाई इन आतंकवादियों से है। हम जानें हथेली पर रखकर, अपने परिवारों का नुकसान करवाकर इनके साथ लड़ाई लड़ रहे हैं। हम कौन हैं ? किसके कहे पर कर रहे हैं यह सब ? हम गवर्नमेंट का एक हिस्सा हैं। गवर्नमेंट के आर्डर पर ही सब कुछ कर रहे हैं, यह तो ठीक है न।''
''हाँ, यह तो मैं भी मानता हूँ।'' गुरलाभ ने सहमति प्रकट की।
''फिर यह गवर्नमेंट कौन है ? गवर्नमेंट है तेरे मंत्री जी। हमारा तो महकमा भी उनके अंडर ही है। एक किस्म का यह सारा आपरेशन मंत्री जी के हुक्म से हो रहा है। तू भी मंत्री जी की पार्टी का आदमी है। बल्कि तू तो मंत्री जी का खास आदमी है। फिर यह लड़ाई तेरी भी हुई न।''
''हाँ, यह भी ठीक है।'' गुरलाभ सिर हिलाता बोला।
''मेरे दोस्त तुझे पुलिस के साथ होना चाहिए न कि मंत्री जी के दुश्मनों के साथ।'' रणजीत ने गुरलाभ की दुखती रग पर हाथ रखा।
गुरलाभ खामोश होकर कुछ सोचने लगा। ''चल आ, भोजन करते हैं। बाकी बातें अगली मुलाकात के वक्त करेंगे। आसपास बच कर रहना।''
दोनों भोजन करके विदा हो गए।
रणदीप ने तो गुरलाभ को आसमान के बीच उल्टा लटका दिया था। उससे वह अब कहीं नहीं भाग सकता था। यद्यपि उसे लहर से कोई हमदर्दी नहीं थी, पर इतना तो वह भी देखता ही आ रहा था कि ये मीते जैसे लोग घरबार छोड़कर पौह-माघ की रातों में खेतों में साँपों के फन कुचलते फिरते थे। ये किसलिए करते थे सब कुछ। यद्यपि इनका कोई ठोस लक्ष्य नहीं, पर ये अपने काम के प्रति वफ़ादार तो थे ही। उनमें से अधिकांश को वह बेशक पसंद नहीं करता था, फिर भी मीते जैसे कुछ लोगों के साथ उसे सहानुभूति थी। वह लहर के नाम पर बुल्ले ही उड़ाता आ रहा था, पर फिर भी जिनके साथ वह चला आ रहा था, उनके साथ उसे कुछ लगाव ज़रूर था। उसने सोचा था कि कुछ हथियार साथ लेकर वह अबोहर चलता बनेगा, पीछे ये जानें और इनका काम जाने। लेकिन पुलिस इंस्पेक्टर रणदीप के बीच में आ जाने से सब कुछ गड़बड़ हो गया।
पिछले कुछ दिनों से नाहर फिर लापता था। गमदूर उसे खोजता परेशान हो चुका था। आखिर उसने नाहर को खोजने के लिए गुरलाभ की ही डयूटी लगाई। गुरलाभ सारा दिन इधर-उधर घूमता रहा। फिर शाम को उसने गमदूर से सम्पर्क किया।
''गमदूर, नाहर के बारे में रिपोर्ट तो बुरी ही है।''
''वह कैसे ?'' गमदूर ने फोन कसकर कान से लगा लिया।
''उसे पुलिस ने पकड़ कर खत्म कर दिया है।''
गमदूर सुनकर सुन्न हो गया। नाहर उसका लम्बे समय से साथी था। उसे लगा जैसे उसकी एक बांह ही न रही हो। 'पिछले हफ्ते उसे काउंटर ऐक्शन करके बड़ी मुश्किल से छुड़वाया था। ऐसा कौन है जो उसके पीछे लगा हुआ था। पहले रायकोट के पास पकड़वाया, अब शहर के अन्दर ही।' गमदूर सोच के घोड़े दौड़ा रहा था, पर उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।
''गमदूर, जो हो गया, सो हो गया। पर मैंने बदला लेना है।'' गुरलाभ पुन: बोला।
''वह कैसे ?'' गमदूर की मद्धम-सी आवाज़ आई।
''उसको मारने वाले इंस्पेक्टर का मैंने पता लगा लिया है। आज शाम पाँच बजे उसे उड़ा देना है।'' इतना कहकर गुरलाभ ने फोन काट दिया।
''गुरलाभ, मीटिंग तक कोई ऐक्शन नहीं करना।'' गमदूर बोलकर हटा तो उधर से कोई जवाब नहीं आया।
''हैलो गुरलाभ... हैलो... हैलो...।'' गमदूर को खीझ चढ़ी कि उससे आर्डर लिए बिना ही फोन काट दिया। 'यह भी यार कुछ ज्यादा ही गरम है। ऐक्शन करते समय कुछ नहीं सोचता।' उसे गुरलाभ पर गुस्सा आया। फिर नाहर को याद करते हुए उसका गुस्सा ढीला पड़ने लगा।
'चलो, जाने दो इंस्पेक्टर को भी साथ ही। मेरा भाइयों जैसा साथी निहत्था मार दिया।''
शाम के घुसमुसे -से में जीप पर राउंड लेते एक इंस्पेक्टर पर गुरलाभ के बन्दों - निम्मे और हरी ने ग्रिनेडों से हमला किया। इंस्पेक्टर सहित चार अन्य पुलिस वाले मारे गए। गुरलाभ ने यह हमला इंस्पेक्टर रणदीप के कहने पर किया था। ऐक्शन के बाद गुरलाभ गमदूर के पास जा पहुँचा। गमदूर ने कहा भी कि पार्टी मीटिंग से पहले ऐसा ऐक्शन करना ठीक नहीं था। पर गुरलाभ के ड्रामे ने गमदूर का मन जीत लिया। गुरलाभ का कहना था कि वह नाहर जैसे साथी के हत्यारे को एक पल के लिए भी माफ़ नहीं कर सकता बेशक उसकी जान क्यों न चली जाए।
''चलो, ठीक है। मीटिंग तक बच कर रहो। अब पुलिस का ज़ोर बढ़ेगा और हम मीटिंग के बाद इस इलाके को ही छोड़ देंगे।'' गमदूर ने दुखी- सा होकर गुरलाभ को हिदायत दी थी।
वह शाम गुरलाभ ने शिमलापुरी में कहीं गुजारी। रात पड़ने पर करीब दस बजे वह मीता के अड्डे पर जा पहुँचा। मीता पहरे की ड्यूटी भुगता कर अपने काम पर जाने की तैयारी कर रहा था।
गुरलाभ के आने का किसी को पता नहीं चला था। वह मुँह-सिर लपेटकर पड़ गया था। थोड़ी देर बाद ही महिंदर, जीता फौजी और बाबा बसंत भी आ गए। इन्हें भी नाहर के विषय में राह में ही पता चला था। तीनों आँगन में बैठकर रोटी खाते हुए बातें करने लगे। उनकी बातों का विषय नाहर ही था। फिर जीते फौजी ने बताया कि पिछले हफ्ते ही जब महिंदर, नाहर और वह खुद इकट्ठे हुए थे तो नाहर ने बताया था कि उसने ब्लाइंड ऐक्शनों वाली गुत्थी सुलझा ली थी। उसने तो ये ऐक्शन करने वाले व्यक्ति का नाम भी बताया था। ''कौन है वो बन्दा ?'' बाबा बसंत की रोटी की बुरकी हाथ में ही रह गई।
''वह बन्दा गुरलाभ है।'' जीते ने भी बात का खुलासा कर दिया। ''गुरलाभ ! ओ मेरे रब्बा !... इसने तो बेड़ा ही गर्क कर दिया।'' बाबा ने माथा पीटा। उन्हें नहीं पता था कि गुरलाभ तो अन्दर लेटा उनकी बातें सुन रहा था। ''अब ऐसा है...'' बाबा कुछ सोचने लगा।
''एक बात है। अब वह समझता है कि नाहर को खत्म करके उसने बात ही खत्म कर दी। उसे यह नहीं पता होगा कि तुम दोनों भी इस भेद को जानते हो। हमें बड़े सोच-विचार से प्लैनिंग करनी होगी।'' बाबा बसंत ने अपना विचार रखा।
''वह कैसे ?''
''अब हम तीनों के अलावा यह बात किसी को नहीं मालूम। मैं कहता हूँ, हम ऐसा करें। मीटिंग तक यह बात हम अपने तक ही रखें। बिलकुल भेद बाहर न निकलने दें। फिर मीटिंग में जीता बात का खुलासा कर देगा। उसके माथे में गोली मैं मारूँगा।'' बाबा बसंत बहुत गुस्से में था।
''यह बात तो बिलकुल सही है कि अगर इस बात की ज़रा-सी भनक भी किसी को लग गई तो गुरलाभ साफ़ बच निकलेगा। बहुत चुस्त है वो। यह बात अब यहीं बन्द। मीटिंग तक फिर से यह बात नहीं करनी।''
बाबा बसंत ने दोनों को सावधान किया।
उनकी बातें सुनकर गुरलाभ को पसीना आ गया था। उसे इस बात की चिंता थी कि उनमें से कोई अन्दर आकर उसे देख ही न ले। फिर तो यहीं राम नाम सत्य हो जाएगा। लेकिन जैसे ही वे रोटी खाकर बाहर निकले, गुरलाभ ने राहत की साँस ली। उसने देख लिया था कि उसकी मौत उसके सिर पर मंडराती घूम रही थी। वह वहाँ से चुपके से छिपकर निकल गया।
अगले दिन उसने मामा के ड्राइवर की मदद से कंबाइन को ट्रैक्टर के पीछे लगाकर तीन नंबर कोठी में ले गया। अगली रात उसने कंबाइन के एक तरफ से प्लेटें उतार कर बेसमेंट वाली सारी राइफ़लें, बाकी असला और कैश कंबाइन के अन्दर रखा और फिर से प्लेटें जड़ दीं। बाहर से देखने पर पता ही नहीं लगता था कि कंबाइन के अन्दर कितनी मौतों का सामान भरा पड़ा है। उसने कंबाइन ट्रैक्टर के साथ जोड़कर उसे किसी नये गुप्त ठिकाने पर जा खड़ा किया।
'अब सवेरे ही निकल पड़ूँगा। पीछे खोजते रहना गुरलाभ को।' वह निश्चिंत हो गया।
फिर रात में लेटे हुए उसे तरह-तरह के ख़याल आने लगे। उसके अन्दर का शैतान करवटें लेने लगा। धीरे धीरे शैतानियत ने गुरलाभ के ख़याल बदल दिए। उसने सुबह चलने का ख़याल बदल दिया। 'जब जाना ही है तो इन्हें सबक सिखा कर ही जाऊँ। और फिर मेरे भेद भी अन्दर ही दबकर रह जाएँगे। नहीं तो फिर ये मेरे पीछे लगे रहेंगे।' रातोंरात गुरलाभ ने दूसरी ही योजना बना ली। दिन चढ़ते ही वह रणदीप के पास पहुँच गया।
''ओए यार इतना बड़ा खजाना हाथ लग गया।'' गुरलाभ की बातें सुनकर रणदीप ने गुरलाभ को बांहों में कस लिया।
''तू यारी निबाहने का वायदा कर, खजाने तुझे बहुत मिलेंगे।'' गुरलाभ ने हाथ आगे बढ़ाया। रणदीप ने अपने दोनों हाथों में गुरलाभ का हाथ कस लिया। एक पुलिस अफ़सर और एक तथाकथित खाड़कू लीडर की गहरी यारी और भी मजबूत हो गई। उसके बाद 'रेड हाउस' के बारे में, मीटिंग के बारे में और वहाँ किसी फैमिली को ठहरा कर अखंडपाठ शुरू करने के बारे में गमदूर की सारी स्कीम गुरलाभ ने इंस्पेक्टर रणदीप को बता दी। आस पास से बचता हुआ गुरलाभ फिर शहर की भीड़ में गुम हो गया।
'रेड हाउस' में दूसरी मंजिल के हाल में अखंडपाठ शुरू था। दंगा पीड़ित कालोनी में से गुरलाभ ने एक बड़े परिवार को लाकर इस कोठी में रहने के लिए जगह दे दी थी। नये घर में मूव होने की खुशी में उन्होंने यह अखंडपाठ रखवाया था। गमदूर ने सभी को इस दिल्ली के दंगा पीड़ित परिवार को यहाँ ठहराने के बारे में और अखंडपाठ की प्लैनिंग के बारे में बता दिया था। वैसे भी अधिकतर लड़कों ने भोग वाले दिन ही आना था। इस परिवार में दो-तीन बूढ़ी स्त्रियाँ, एक बुजुर्ग जोड़ा और तीन जवान लड़के थे। भोग वाले दिन इस परिवार के और भी रिश्तेदार आ गए। भोग का समय होने तक अन्य लड़के भी पहुँचना शुरू हो गए। जीता फौजी और महिंदर गुरलाभ के साथ आम साधारण व्यवहार कर रहे थे। वे नहीं चाहते थे कि उनके किसी व्यवहार से गुरलाभ को उनके बारे में शक पैदा हो। उधर गुरलाभ भी सभी से यूँ हँस-हँस कर मिल रहा था मानो कुछ हुआ ही न हो। बाबा बसंत ने अपनी कार से आना था। उसे छोड़कर सभी लड़के आ गए थे। वह शायद कहीं ट्रैफिक में फंस गया था। गुरलाभ सहित सभी खाड़कू लड़के नीचे चाय पी रहे थे। उन्हें ऊपर से सन्देशा मिला, ''अरदास शुरू होने वाली है, ऊपर आ जाओ।'' सबसे पहले गुरलाभ ने खेसी के नीचे से ए.के. 47 निकाल कर सामने दीवार के साथ लगा दी। उसने अरजन वगैरह को भी हथियार यहीं रखने का इशारा करते हुए कहा, ''महाराज की हजूरी में हथियार नहीं ले जाने। हथियार यहाँ दीवार के साथ लगा दो।'' उनकी देखादेखी सभी लड़कों ने अपने अपने हथियार यहीं अन्दर रख दिए। सबसे पीछे गमदूर था। ''चलो, मीटिंग भी भोग के बाद ऊपर ही कर लेंगे।'' इतना कहकर सभी के बाहर निकल जाने के बाद गमदूर ने हाल का दरवाजा बन्द कर दिया। उसने देखा था कि मीटिंग के दौरान यदि लड़कों के पास हथियार हों तो कार्रवाई में विघ्न पड़ता था। ज़रा-ज़रा भी बात पर एक दूसरे की तरफ बन्दूकें तान लेते थे। दूसरा, महाराज की हजूरी में हर कोई झूठ बोलने से थोड़ा परहेज ही करता था। इस कारण हथियार इसी हाल में छोड़ जाने का ख़याल गमदूर को दुरस्त लगा। लेकिन महिंदर और जीते फौजी ने जेबों में से पिस्तौल नहीं निकाले। उन्होंने गुरलाभ को सजा जो देनी थी। उनकी योजना को उनके अलावा सिर्फ बाबा बसंत जानता था। वह अभी तक आया नहीं था। पहले वह पीछे ट्रैफिक में फंस गया। बाद में यह कोठी के नज़दीक वाला रेलवे फाटक बन्द था। फाटक के दूसरी ओर कार में बैठा बाबा बसंत सामने कोठी में अखंडपाठ की चहल-पहल देख रहा था। गमदूर के बताये अनुसार इस कोठी में रहने वाला परिवार कोई दिल्ली का दंगा पीड़ित परिवार था। बाकी लोग उनके रिश्तेदार थे। वे अखंडपाठ के कारण आए थे। सिर्फ़ गुरलाभ को ही पता था कि ये सभी लोग पुलिस के कमांडो थे। इंस्पेक्टर रणदीप ने गुरलाभ की मदद से इन्हें इस घर में फिट कर दिया था। गमदूर खुश था कि इस तरह भीड़ भाड़ में उनके इकट्ठा होने पर किसी को शक नहीं होगा। यह मीटिंग बहुत ज़रूरी थी। आगे का प्रोग्राम बनाकर उन्होंने आज लुधियाना शहर छोड़ देना था। उधर गुरलाभ खुश था कि सारा कार्यक्रम इंस्पेक्टर रणदीप की हिदायतों के मुताबिक चल रहा था। यह सफल ऐक्शन करवाकर गुरलाभ ने भी लुधियाना शहर को अलविदा कह देना था। अरदास होने के बाद देग बरताई गई। उसके बाद एक बुजुर्ग उम्र का सेवादार आगे बढ़कर बोला, ''मेरा ख़याल है, लंगर भी यहीं छक लेते हैं।''
''हाँ जी, यह भी ठीक है।'' कोई दूसरा बोला।
''फिर इन जवानों को पहले लंगर छकाएँ। लंगर छक कर ये अपने काम धंधे लगें।'' वह गमदूर वगैरह की तरफ देखता हुआ बोला।
''बिलकुल ठीक है बुजुर्गो।'' गमदूर भी यही चाहता था।
सेवादार नीचे की ओर जाते हुए गुरलाभ से संबोधित हुआ, ''आ काका, नीचे से सामान उठवा कर ला।'' गुरलाभ उनके पीछे नीचे उतर गया।
नीचे आते ही गुरलाभ ने किचन के साथ लगते स्टोर में घुसकर अन्दर से दरवाजा बन्द किया। पिछली खिड़की में से कूद कर गली में उतर गया। नीचे खड़ा स्कूटर स्टार्ट कर वह अपने नये गुप्त ठिकाने की ओर निकल पड़ा। बाकी दोनों सेवादार देगचे लेकर ऊपर पहुँचे। देगचे रखकर वे फिर नीचे चले गए। गुरलाभ नहीं लौटा, यह तो किसी के ख़याल में ही नहीं आया। सभी खाड़कू लड़के पंक्ति में बैठ गए। उसके साथ साथ घर के कुछ अन्य रिश्तेदार भी बैठ गए। इतने में लंगर बरताया जाने लगा। फिर किसी ने जैकारा बुलाया। सभी ने जैकारे के जवाब में 'सतिश्री अकाल' कहकर लंगर छकना शुरू कर दिया। किसी किसी ने ही बुरकी मुँह में डाली थी कि कमांडो ऐक्शन शुरू हो गया। दस सेकेंड में सभी लड़के काबू में कर लिए गए। फिर कुछ ही क्षणों में सभी के हाथ पीछे की ओर बांध कर टांगें-बांहें बांध दीं। बकरियों की भांति बंधे लड़कों की बेबस नज़रें गुरलाभ को ढूँढ़ रही थीं। अकेले गुरलाभ को छोड़कर सभी वहाँ बंधे पड़े थे। इसी भागम भाग में जीता ने जेब में से पिस्तौल निकाल कर गोली चलाई। एक कमांडो ने फुर्ती के साथ उससे पिस्तौल छीन लिया, पर चली हुई गोली ऊपर छत में लगी। सिवाय इस गोली के वहाँ और कोई फायर नहीं हुआ। नीचे फाटक पार करके कार पॉर्क करते हुए बाबा बसंत ने ऊपर हुए फायर की आवाज़ सुन ली थी। किसी खतरे को भांपते हुए बाबा बसंत ने कार पीछे लौटा ली। अड़ोस-पड़ोस वालों को पुलिस की मौजूदगी का कुछ पता नहीं था। सारी पुलिस फोर्स सिविल कपड़ों में थी। ट्रक बैक करके कोठी के गेट के साथ लगाया गया। इंस्पेक्टर रणदीप अन्दर आया। लड़कों को बंधा देखकर उसने इंचार्ज कमांडों की ओर गुस्से में देखा। ''मैं किसी के भागने का खतरा मोल नहीं ले सकता। इन्हें डिसएबल करो। ट्रक में फेंको।'' इंचार्ज के इशारे पर कुछ कमांडो आगे आए। बंधे हुए लड़कों की घुटनों के पास से टांगे तोड़ तोड़कर उन सभी लड़कों को ट्रक में फेंकने लगे। न किसी ने 'चूँ' की, न ही उन पर किसी को तरस आया। गुरलाभ को याद करते हुए अरजन की ज़रूर आँखें भर आईं। जिसे जान से प्यारा दोस्त समझता था, उसने इतना बड़ा धोखा किया। आपरेशन खत्म करके रणदीप ने चंडीगढ़ पुलिस मुखिया को रिपोर्ट दी।
पकड़े गए आदमी सी.आई.डी. वालों को सौंपने का आदेश हुआ। इतना बड़ा सफल आपरेशन करके रणदीप पुलिस मुखिया का चहेता बन गया था।
(जारी…)
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