Sunday, July 18, 2010

धारावाहिक उपन्यास




बलि
हरमहिंदर चहल
(गतांक से आगे...)

चैप्टर- 15(प्रथम भाग)

लुधियाने की जमालपुर रोड पर अधिकतर दुकानें मिस्त्रियों की थीं। ये मिस्त्री खेती का सारा सामान बनाने वाले थे। हल, तवे, कराहे(पाटे) और ट्रालियाँ आदि। इन मिस्त्रियों का बना सामान हर तरफ मशहूर था। खास तौर पर यहाँ की बनी ट्रैक्टर से चलने वाली छोटी कंबाइन तो हरियाणा, राजस्थान की ओर दूर दूर तक प्रसिद्ध थी। लोग दूर दूर से आकर साई देकर यह कंबाइन बनवाते थे। गेहूँ और चावल निकालने के लिए यह कंबाइन बड़ी कामयाब थी। पिछली बार लुधियाना की ओर मुड़ते हुए गुरलाभ को उसके मामा जैलदार ने एक कंबाइन बनवाने के लिए कहा था। उसकी कंबाइन बनाकर मिस्त्री ने खड़ी की हुई थी। पैसे देने बाकी थे। उसने फोन करके मामा का ड्राइवर बुला लिया था। ड्राइवर हिन्दुस्तान ट्रैक्टर लेकर आ गया। इसी ट्रैक्टर के पीछे बांध कर कंबाइन को अबोहर ले जाना था। गुरलाभ मिस्त्री की दुकान पर आया। मिस्त्री को पूरे पैसे दिए। मिस्त्री उसे कंबाइन के काम करने के ढंग-तरीके समझाने लगा। कंबाइन की ओर देखते हुए चतुर गुरलाभ ने अपने मन में कुछ और ही योजनाएँ बनानी आरंभ कर दीं। इसे ट्रैक्टर के पीछे बांधकर अबोहर ले जाना था। खेतीबाड़ी का सामान होने के कारण इसे रास्ते में किसी ने चैक भी नहीं करना था। कंबाइन के अन्दर की खाली जगह में तो बहुत कुछ रखा जा सकता था। बेसमेंट में पड़े हथियार तो सारे ही इसमें फिट हो जाएँगे। 'क्यों न वे सारे हथियार कंबाइन में छिपाकर अबोहर ले जाऊँ, आगे काम आएँगे।' ऐसा सोचते हुए वह वापस पी.सी.ओ. पर जाकर मामा को फोन पर बताने लगा कि ट्रैक्टर को लौटने में अभी कुछ दिन लगेंगे। फोन करके वह मिस्त्री की दुकान पर लौट आया। दुकान की तरफ मुँह किए वह कंबाइन की जाँच-पड़ताल-सी कर रहा था कि पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसने स्वाभाविक ही पीछे मुड़कर देखा तो उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसके पीछे पुलिस का हवलदार खड़ा था। गुरलाभ ने एकदम पीछे मुड़ते हुए अपनी जेबों और कमर की ओर ध्यान घुमाया। अच्छी बात यह थी कि इस वक्त उसके पास कोई हथियार नहीं था। उसने इस बारे में सोचकर थोड़ा राहत की सांस ली, पर अगले ही पल जब उसने सड़क की तरफ नज़र दौड़ाई तो वह बिलकुल ही सुन्न हो गया। सामने पुलिस की कई गाड़ियाँ खड़ी थीं। भागने का कोई रास्ता नहीं था।
''तुझे साहब ने बुलाया है।''
हवलदार के बोलने पर गुरलाभ अपने आप में लौटा।
''क्यों ?'' गुरलाभ कांपती आवाज़ को सहज बनाता हुआ बोला।
''चल कर खुद पूछ लो।'' हवलदार सख्ती से बोला।
''कहाँ है साहब ?'' गुरलाभ घबराया हुआ-सा खड़ा था।
''वो सबसे आगे वाली गाड़ी में। चल बढ़।'' हवलदार ने गुरलाभ को अपने आगे लगा लिया। अपने आप को खुर्रांट समझते गुरलाभ का दिल, सामने पुलिस को देखकर पत्ते की भांति कांपे जा रहा था। उसको लगता था कि उसकी जान निकली कि निकली। वह कांपता हुआ-सा सबसे आगे वाली जीप तक गया और इंस्पेक्टर को दोनों हाथ जोड़कर फतह बुलाई। इंस्पेक्टर का चेहरा उसे जाना-पहचाना-सा लगा। ध्यान से देखने पर उसने ज्यों ही इंस्पेक्टर को पहचाना तो उसका डर जाता रहा। सामने पुलिस की वर्दी में रणदीप बैठा था। उसका शरीर भर गया था। उसकी आँखें लाल थीं। चेहरा कठोर बन गया था। मासूम-सा लगने वाला रणदीप सामने बैठा पूरा खुर्रांट पुलिस अफ़सर लगता था।
''कैसे ? पहचाना नही ?'' रणदीप ने डरे-सहमे गुरलाभ से पूछा।
''पहचाना क्यों नहीं। लो, अब मैं आपको भी न पहचानूँगा ?'' गुरलाभ के मुँह से खुद ब खुद तू की जगह 'आपको' निकल गया।
''अच्छा, बैठ जा मेरे साथ ही।'' एक तरफ खिसकते हुए रणदीप ने गुरलाभ को अपने संग ही बिठा लिया। गुरलाभ की जान फिर पिंजरे में फंस गई।
''साहब, कोठी जाना है कि थाने ?'' ड्राइवर ने रणदीप से पूछा।
''अब तू ऐसा कर, हमें कोठी ले चल। पिछली गाड़ियों को थाने जाने के लिए कह दो। उनसे कहो, वहाँ इंतज़ार करें। हम थोड़ी देर बाद थाने ही चलेंगे।'' इंस्पेक्टर रणदीप के इतना कहने पर पीछे बैठे वाकी-टाकी वाले सिपाही ने पिछली गाड़ियों को थाने जाने की हिदायत कर दी। रणदीप वाली गाड़ी कोठी जा खड़ी हुई। कोठी भी थाने के नज़दीक ही थी। कोई बहुत दूर नहीं थी।
थोड़ी देर बाद कोठी में दोनों बैठकर चाय पी रहे थे।
''तू इधर किधर घूमता फिरता है ?'' रणदीप ने सरसरी तौर पर पूछा।
''यहाँ कुछ खेती के औजार बनवाये थे, वे गाँव में ले जाने हैं।''
''डिप्लोमा का क्या हुआ ?'' रणदीप को अचानक कालेज याद हो आया।
''डिप्लोमा तो पूरा कर लिया। बस, अब कहीं नौकरी ढूँढ़ रहा हूँ।''
''तुझे नौकरी की क्या कमी है। तू तो जब चाहे नौकरी ले सकता है।'' रणदीप ने उसकी घरेलू राजनीतिक पहुँच याद दिलाते हुए स्वाभाविक ही बात की।
''आप यहाँ अभी बदल कर आए हो। मेरा मतलब है, पहले तो कभी आपको देखा नहीं।'' गुरलाभ ने डरते हुए पूछा।
''पहली बात गुरलाभ यह कि ये आप, आपका और जी वगैरह कहना छोड़। हम पहले की तरह ही दोस्त हैं। तू मुझे नाम लेकर बुला। जी वगैरह भी कुछ नहीं कहना।'' रणदीप अपनापन-सा दिखलाता हुआ बोला, ''तू संकोच-से में क्यों बैठा है। खुलकर बैठ न। मैं तो तुझे यार दोस्त होने के नाते घर ले आया। तू यूँ ही डरे जाता है।'' रणदीप उसके चेहरे की तरफ देखता हुआ बोला।
''यार रणदीप, तेरा तो रौब ही इतना है कि तेरे सामने तो मुँह से बोल भी मुश्किल से निकलते हैं। सच पूछता है तो वर्दी तेरे ऊपर खूब फबती है। पूरा खुर्रांट थानेदार लगता है।''
''हाँ, यह बनी बात। यूँ ही जी-जी और आप-आप किए जाता था। हम मिले हैं तो अब पहले की तरह यारों की भांति ही रहेंगे।'' रणदीप ने देखा कि गुरलाभ नार्मल होता जा रहा था। कुछ अन्य बातें करते हुए दोनों पूरी तरह खुल गए। गुरलाभ को भी लग रहा था कि उसकी प्रायवेट ज़िन्दगी की शायद रणदीप को कोई जानकारी नहीं है।
''ले गुरलाभ, मैं तुझे बताता हूँ कि मेरे साथ अब क्या घटित हुआ है।'' चाय खत्म करके रणदीप कप एक ओर करते हुए असली बात की ओर आया।
''क्या हो गया ? कोई परेशानी ?'' गुरलाभ ने रणदीप की ओर देखते हुए पूछा।
''सबसे बड़ी परेशानी तो आजकल ये कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ रहे अतवादी हैं। मुझे यहाँ आए को अभी हफ्ता भी नहीं हुआ कि इन्होंने गाँव से मेरे भाई को अगवा कर लिया है।'' रणदीप ने असली बात सुनाई।
''तेरे से किसी की क्या दुश्मनी है ?'' गुरलाभ ने हैरान से पूछा।
''मेरे साथ तो कोई दुश्मनी नहीं, पर इन भैण.... का कोई लड़का है नाहर जिसे रायकोट पुलिस ने पकड़ा है। उसे छुड़ाने के वास्ते उन्होंने मेरे भाई को अगवा कर लिया।''
सुबह के समय गमदूर की ओर से बताई गई योजना को स्मरण करते हुए गुरलाभ के कानों में 'शांय-शांय' होने लगी। 'तो नाहर को छुड़वाने के लिए गमदूर ने रणदीप के भाई को अगवा करवाया है।' यह सोचते ही गुरलाभ को बेचैनी-सी हुई।
'उन्होंने इसके भाई को अगवा किया है, मैं इसके घर बैठा हूँ। मैं ये किस आग में फंसता जा रहा हूँ।'
''देख गुरलाभ, कालेज के समय हम बहुत लड़ाई-झगड़े करते रहे हैं। अपने लिंक भी कई किस्म के लोगों के संग रहे हैं। मेरा मतलब है, तू तो यहाँ लुधियाने ही रहा है। तू कोई सुराग निकाल न। कहीं यूँ ही न कोई अनहोनी हो जाए। इन कुड़ी के.... कोई उसूल नहीं।'' रणदीप ने गुरलाभ को टटोलना आरंभ किया।
''वह तो ठीक है। मैं अपने तौर पर कोशिश करके देख लेता हूँ। पर एक बात मैं कहना चाहता हूँ कि रायकोट थाने वालों को हिदायत कर दे कि वे उस पकड़े गए अतिवादी पर अभी कोई सख्त कार्रवाई न करें। इसी के साथ तेरे भाई की सेफ्टी रह सकती है।'' गुरलाभ ने सावधानी से सुझाव दिया। बात रणदीप के भी जंच गई। उसने ज़िले के पुलिस मुखिया को फोन मिलाया। यह एहतियात बरतने की विनती की। रणदीप नये आए पुलिस मुखिया का खास आदमी था।
इधर गुरलाभ रणदीप से उसका खास फोन नंबर लेकर कोठी के पिछले गेट से बाहर निकल गया। वह ऑटो लेकर गमदूर की तरफ जा रहा था। उसके मस्तिष्क में बहुत से नये-नये विचार चल रहे थे। पहला तो यही था कि रणदीप के भाई को बचाने के लिए नाहर को छुड़वाना पड़ेगा। बड़ी मुश्किल से तो उसका भोग पड़ने चला था, पर बाहर निकलते ही वह उसके कारनामों की खोज करना शुरू कर देगा। दूसरी चिंता उसको यह हो रही थी कि इधर उसे रणदीप से भी मेलजोल रखना पड़ेगा। इस बात का यदि गमदूर वगैरह को पता चला तो उसको लेकर फिर संशय खड़े होने लगेंगे। बुरी तरह फंस गए अब तो। परेशान हुआ गुरलाभ ऑटो से उतरकर गमदूर की तरफ चल पड़ा। आगे कमरे में अकेला अरजन बैठा था। उसके बताये अनुसार गमदूर बाहर फोन करने गया हुआ था। उसे अभी एक घंटे तक लौटना था। गुरलाभ उसकी प्रतीक्षा करता बैड पर लेट गया। अरजन ने उसे बुलाना चाहा तो गुरलाभ ने उसे हाथ के इशारे से रोक दिया। आँखें मूंदे पड़ा गुरलाभ स्कीमें लड़ा रहा था। यह तो वह जानता था कि वह गमदूर को कहकर रणदीप का भाई छुड़वा लेगा। इसके साथ ही नाहर को भी छूट जाना था। वह कुछ ऐसा सोच रहा था कि नाहर अब बाहर ही न निकले तो अच्छा था। अपनी योजनाओं को किसी फैसले पर ले जाकर वह उठा। पी.सी.ओ. की तरफ चल पड़ा। उसने पी.सी.ओ. के बन्द कैबिन में से रणदीप को फोन मिलाया।
''हाँ गुरलाभ, लगा कुछ पता ?'' परेशान रणदीप ने पूछा।
''पता तो लग गया। भाई साहब भी छूट जाएँगे। इनकी तानी काफ़ी उलझी हुई है।'' गुरलाभ ने स्कीम के अनुसार बात की।
''वह कैसे ?''
''बात यह है कि नाहर को इनकी पार्टी के अन्दर के ही किसी आदमी ने पकड़वाया है। मतलब पार्टी में कोई धड़ेबाजी है। इस कारण तेरा भाई एक बार तो छूट जाएगा। पर उधर नाहर को पकड़वाने वाले नाहर के बच निकलने के बाद कहीं दोबारा भाई साहब पर हाथ न डाल बैठें।''
''यह तो बहुत उलझी हुई बात है यार। इसका फिर कोई हल। नाहर को छोड़े बिना वे भाई को रिहा नहीं करेंगे।'' रणदीप परेशान था।
''तू ऐसा कर।'' गुरलाभ ने रणदीप की परेशानी भांप ली थी।
''हाँ-हाँ, बता।''
''एक बार नाहर को रायकोट थाने से छुड़वा दे। उसके बाद अपने आदमी सादे कपड़ों में उसके पीछे लगा देना। एक दो दिन बाद उसे दुबारा उठा लेना और...।'' आगे वह चुप लगा गया।
''चलो ठीक है। तू आगे बता कि भाई घर कब आ जाएगा।'' इस वक्त रणदीप को भाई की अधिक चिंता थी। फिर भी उसने नाहर को दुबारा पकड़ने का प्रबंध करने के लिए सोच लिया था।
''तुम ऐसा करो। आज शाम छह बजे तक नाहर को छोड़ दो। तेरा भाई भी जल्दी ही घर आ जाएगा।'' इतना कहकर गुरलाभ ने फोन काट दिया। वह वापस कमरे की तरफ लौट गया। आगे गमदूर उदास बैठा चिंता में डूबा हुआ था।
''क्यों, बनी कोई बात ?'' गुरलाभ ने सहानुभूति दिखलाते हुए गमदूर से पूछा।
''नहीं यार, लगता नहीं कि वे नाहर को छोड़ेंगे। अगली कतार का पुराना खाड़कू है।'' गमदूर परेशान था।
''भाई, अगर तू मेरी बात पर ज्यादा किन्तु-परन्तु न करे तो मुझे एक साझे आदमी का पता चला है। नाहर छूट सकता है।'' गुरलाभ ने गमदूर के चेहरे की तरफ देखा।
''तू यार कुछ भी कर। एक बार बस नाहर छूट जाए। तुझे खुली इजाज़त है, जो मर्जी कर, पर नाहर को छुड़वा।'' गमदूर आशा में भरकर गुरलाभ की ओर देखता हुआ बोला।
''ठीक है फिर तुम उस पुलिस वाले के भाई को अभी छोड़ दो। शाम को थाने के आगे जाकर नाहर को पिकअप कर लो। आओ, पी.सी.ओ. चलें।'' गुरलाभ गमदूर को संग लेकर बाहर निकल गया। अलग अलग पी.सी.ओ. से दोनों ने अपने अपने सोर्सों को फोन किए और अपनी अपनी राह चल दिए।
दिन छिपते को रणदीप के भाई ने घर पहुँचकर रणदीप को अपने वापस लौट आने की जानकारी दी। इधर शाम के अँधेरे में रायकोट पुलिस नाहर को बाजार के भीड़भाड़ वाली जगह पर उतार गई। बाजार की तंग गलियों में से निकलता नाहर अपने पीछे लगे रणदीप के सादे कपड़ों में पुलिस वालों को चकमा देकर कहीं लुप्त हो गया। जब रणदीप को पता चला कि नाहर उसके आदमियों से बचकर निकल गया तो उसे कुछ परेशानी तो हुई, पर उसने अपने गाँव वाले घर पर सिक्युरिटी बढ़ा दी। रात में जब गुरलाभ वापस ठिकाने पर पहुँचा तो वहाँ गमदूर के पास नाहर बैठा था। जब गमदूर ने नाहर को बताया कि उसे छुड़वाने का और पुलिस के टार्चर से बचाने का ऐक्शन गुरलाभ ने किया है तो नाहर ने आश्चर्य में आँखें फैलाकर गुरलाभ की ओर देखा। उसे जीते फौजी द्वारा गुरलाभ के विषय में बताई गई बातें याद आईं।
'हैं ! ये क्या माजरा है ?' नाहर ने मन में सोचा, पर उसने चेहरे पर कोई भाव न आने दिया। उसकी तरफ देखकर गुरलाभ निश्चिंत हो गया कि इसे उसकी कार्रवाइयों की अभी तक कोई भनक नहीं लगी। परेशान भी हो गया कि रणदीप के जाल में से बच कैसे गया। तीन चार दिन बीत गए। जब दुबारा गुरलाभ इधर आया तो नाहर फिर सामने बैठा था। वह हैरान था कि रणदीप ने इसे खुला कैसे छोड़ रखा है। अवसर पाकर उसने रणदीप के गुप्त फोन पर कॉल मिलाई।
''यार रणदीप, यह क्या बात हुई। वे तो मेरे पीछे पड़ गए।'' उसने थोड़ा रोष दिखलाया।
''कौन ?'' रणदीप गुरलाभ की बात के बारे में सोचता हुआ बोला।
''देख, उस दिन मैंने बताया था कि वे लोग चाहते हैं कि नाहर को एक बार पुलिस छोड़ दे, पर दुबारा फिर पकड़ ले। इसीलिए वे तेरे भाई को छोड़ने के लिए राजी हुए थे।''
''गुरलाभ, आदमी तो मैंने पीछे लगाये थे, पर वह साला चकमा देकर छिप निकला।'' रणदीप ने उस दिन की कहानी सुनाई।
''यह तो फिर काम खराब है। अगर नाहर दुबारा न पकड़ा गया तो वे फिर मेरा या तेरा नुकसान करेंगे। जामन तो मैं ही बना था।''
''तू बता तो सही, वह है कहाँ पर। मैं पाँच मिनट में पकड़ लूँगा।'' रणदीप ने पुलसिया पत्ता खेला।
''यह तो अब वही बता सकते हैं कि नाहर कहाँ है। मैं तुझे उनका कोड वर्ड बता देता हूँ। वे इसी नंबर पर कॉल कर लेंगे।'' अपनी तरफ से गुरलाभ ने चतुराई बरती, पर रणदीप के पुलसिये दिमाग की तारें हरकत में आने लगीं।
फिर अगले दिन गुरलाभ ने अपनी आवाज़ बदल कर रणदीप को कॉल की। पहले बताये कोड वर्ड के अनुसार उसने रणदीप को जानकारी दी।
''मैं अलफ़ा बोल रहा हूँ। तुम्हारा ज़ैबरा टारगैट गिल्ल चौंक ग्रीन ढाबे पर रोटी खा रहा है।'' इधर से गुरलाभ ने फोन काटा। उधर रणदीप ने उसकी बदली आवाज पहचान ली थी, पर वह तेजी से टारगैट की ओर बढ़ा।
(जारी…)
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3 comments:

उमेश महादोषी said...

उपन्यास बहुत रुचिकर लग रहा है

डा.सुभाष राय said...

हर्मिन्दर जी और सुभाष नीरव दोनो को ही धन्यवाद देना चाहूंगा कि बलि का एक अंश पढने का अवसर दिया। इसकी पहले की कडियां नही पढ सका हूं फिर भी जितनी सहजता से यह कहानी आतंकवाद के दिनों के पंजाब की कथा बयां करती आगे बढ रही है, वह बेशक एक बेहतरीन औपन्यासिक रचना को जन्म देगी। बधाई। आगे के अंश भी उपलब्ध करायें तो प्रसन्नता होगी।

Sanjeet Tripathi said...

chnki mai shuru se padhta aa raha hu isliye is upanyaas ki har kisht ki pratiksha rahti hai, ye kisht bhi apne aap ne ek naya adhyaay khol rahi hai,
shukriya padhwane ke liye